[Deewan] Re: ब्लॉग सूचना
Ravikant
ravikant at sarai.net
Thu Dec 8 13:06:51 IST 2005
शुक्रिया विजेन्द्र,
अच्छे रचनाकारों को ब्लॉग रचते देखना सुखद अहसास है. लाल्टू के ब्लॉग से दो कविताएँ अपनी पसंद
की, चुन रहा हूँ. पहली कंप्यूटर पर है, दूसरी शहर पर.
रविकान्त
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कंप्यूटर
स्मृति
का एक टुकड़ा इस कार्ड में है
दूसरा उसमें
एक टुकड़ा यह विकल्प देता है
कि स्मृति को हम
बचपन जवानी या बुढ़ापे में बाँटें
या बाँटें लिखने और पढ़ने के कौशल में
या देखने सूँघने या चखने की आदत में
बाँटने के अलग अलग विकल्पों की उलझन से
हमें उबारता है एक और टुकड़ा
हम बटनों पर बैठे हैं
निर्जीव स्मृतियाँ अब चमत्कार नहीं
हमारी उँगलियों के स्पर्श से पैदा करती हैं
स्पर्धाएँ
स्पर्धाओं में हार जीत
अहं, रक्तचाप
एक टुकड़ा
बुझते ही
बुझता है
एक टुकड़ा प्यार
चेतना और कंप्यूटर
में तुलना
चलती लगातार।
१९९५ (उत्तर प्रदेश(पत्रिका)-मार्च १९९७)
वो आईं गाड़ियाँ
वो आईं गाड़ियाँ !
वो आईं गाड़ियाँ !
बत्ती जो हो गई हरी
वो आईं गाड़ियाँ ! वो आईं गाड़ियाँ !
पुलकी खिड़की पे खड़ी
वो आईं गाड़ियाँ ! वो आईं गाड़ियाँ !
पुलकी बदमाश बड़ी
खींच लाई कुर्सी
खिड़की पे जा चढ़ी
ओ हो हू हा
ऊँची मंज़िल से चीखे
पुलकी बार बार
नीचे हल्ला गुल्ला
दौड़ें खुल्लम खुल्ला
रंग रंग की कार
बहुत कहा मत करो शोर
पुलकी न मानी न मानी
रही अड़ी की अड़ी
वो आईं गाड़ियाँ ! वो आईं गाड़ियाँ !
अब बत्ती हो गई लाल
कैसा हुआ कमाल
छोटी गाड़ी बड़ी गाड़ी
लाल गाड़ी पीली गाड़ी
हल्की गाड़ी ट्रक भारी
रुक गईं सारी सारी की सारी
मन मसोस पुलकी ने की उतरने की तैयारी
कुर्सी पर उतारे पैर, फिर छलाँग मारी
तब तक हुई बत्ती हरी फिर से
और फिर ....
वो आईं गाड़ियाँ ! वो आईं गाड़ियाँ !
***********************************************१९९२ (चकमक १९९३)
On Wednesday 07 Dec 2005 11:17 pm, Vijender chauhan wrote:
> नमस्कार,
> हिन्दी की दुनिया के लिए शुभ और हिन्दी ब्लॉगजगत के लिए तो वाकई अहम
> खबर कवि लाल्टू का अब हिन्दी ब्लॉग है। तबियत खुश करता है। विचरें
> तसल्ली की गारंटी
> http://laltu.blogspot.com/
> विजेंद्र
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