[Deewan] सार-रूप

Brajesh Kumar Jha brajesh_1974 at rediffmail.com
Sat Feb 25 00:55:20 IST 2006


  
शोद्ध के जुड़ी दो बातें—– 'बोल पहिया कि रात-दिन धकेलते रहो'(फिल्म-यहां)जैसे गीत आने तक 
                    हि्न्दी सिनेमाई गानेअपने पचहत्तर साल का सफर पूरा कर चुका है। 
यकीनन,इस दरमियान वक्‍त तेज रफ्तार से बदलता रहा और उसके तेवर भी।ऐसे में सिनेमाई गीत 
अपनी भाषा व मुहावरों को गढने-बदलनेका आदी ओर अभ्यस्त होता गया। ढेरों प्रयोग हुए। 
समय, परिवेश व नाजुक रिश्ते की संवेदनात्मकअभिव्यक्ति के, शब्दों को गढने ओर गुनने के। 
और हां, ये सफल भी रहे। तभी तो 'कजरारे कजरारेतेरे कारे कारे नैनां' 
गायकी के कई अंदाजों के साथ भाषा के स्तर पर पंचमेल खिचडी का रूप लिए सामने आई
 और दम भर चली।यानी, प्रयोग का एक मुकम्मल रूप हमारे नजीर आया।
 बात एसी है कि यहं गीत को जितना तवज्जह मिला, उतना संसार के किसी भी अन्य फिल्मोद्योग
 में नहीं मिल पाया। फिल्में आती हैं,चली जाती हैं। सितारे भी पीछे रह जाते हैं। बस रह जाते हैं
 तो कुल अच्छे-भले गीत जो 'दुनिया,ये दुनिया तुफान मेल' व  'अफसाना लिख रही हूं तेरे
इंतजार का' की तरह युगों तक बजता रहेगा। पचहत्तर साल लम्बे सफर के इन्हीं प्रयोगात्मक
पहलुओं पर शोध टिका रहेगा।
धन्यवाद
ब्रजेश कुमार क्षा
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