Re: [Deewan] ख़बरिया चैन लों का सत्यकथाकर ण
khadeeja at sarai.net
khadeeja at sarai.net
Thu Mar 2 21:16:14 IST 2006
Dear Piyush
Thanks for your posting!!! Is it possible for you to bring out a complete
story of the entire production of one crime program (From pre production to
till it goes on air)?
OR, to follow some of the questions mentioned below:
As far as I know there are interesting terminology used in TV while
deciding for a particular crime story.. lets say, for example, a cold
blooded murder story from a small town in UP will never be preferred over a
rape story in South Delhi, as they say, in TV, they need an 'up market'
story and a not a 'down market' story... how this class association with a
simple news story works in a TV channel? (Remember, this term is not just
used for news stories, but even used for anchors/reporters, etc)
What are the pressures on a TV journalist who HAS to get a story before
Tuesday (in the case of weekly crime programs)... Or, how the boss keep
saying, “we need to get flesh and blood on screen.. It sells man..?
How a video editor has to make a normal crime story look like an awfully
dreadful one?
How only few selected senior editors get to edit special crime shows??
How all the crime journalists/producers/editors are the most valued people
for the company, as they are the one who helping getting the channel more
and more sponsors..?
How the anchor for the crime program has to be more an actor than a
journalist?
And, of course, the real tension that the production people have to go
through while producing the most sought after crime shows??
Many thanks
Look forward to read more stuff
Khadeeja
n March 2, 2:40 pm Ravikant <ravikant at sarai.net> wrote:
> पीयूष पांडेय - pandeypiyush07 at yahoo.com की
> पस्टिंग जो मुझ तक भ्रष्ट
> रूप में आई, आप सब के लिए
> विचारार्थ.
>
> रविकान्त
>
>
> सराय के सभी मित्रों को
> नमस्कार, दोस्तों, पहली
> पोस्टिंग में मैंने आपको
> अपने शोध के विषय में बताया
> था। मेरे शोध का विषय है-
न्यूज़ चैनलों का सत्यकथाकर
> ण। सामान्य तौर पर ये शोध हिन
> ्दी
> समाचार चैनलों के परिप्रेक
> ्ष्य में है। दरअसल, शोध से प�
> �ले मुझे समाचार चैनलों पर आन
> े वाले तमाम
> अपराध आधारित कार्यक्रमों
> और समाचारों में सनसनी पैदा
> करने के प्रयोग ने इतना
> उत्तेजित किया कि मैंने
> इसी विषय को शोध के लिए
> चुना। शोध पर काम शुरु हुए
> करीब दो महीने हो चुके हैं।
> कई अहम दस्तावेज, लेख वगैरह
> मैंने जमा किए हैं। लेकिन,
> अभी तक के अध्ययन, चिंतन,
> साक्षात्कार और दर्शकों की
> प्रतिक्रिया की बात की जाए
> तो कुछ खास बातें सामने आयी
> हैं। इन लघु निष्कर्षों को
> मैं आपके साथ भी बांटना
> चाहूंगा। शोध के दौरान अभी
> तक मैंने देखा है कि हिन्दी
> समाचार चैनलों पर करीब 15
> क्राइम शो (सनसनी, वारदात,
> जुर्म, काल-कपाल, क्राइम
> रिपोर्टर, क्राइम फाइल,
> हत्यारा कौन, रेड एलर्ट,
> गिरफ्तार, एफआईआर, डायल 100,
> इंसाफ का तराजू आदि) इन
> दिनों प्रसारित हो रहे
> हैं। कुछ नए कार्यक्रम शुरु
> होने जा रहे हैं। इसके
> अलावा, दूसरे मनोरंजन
> चैनलों पर भी कुछ ऐसे
> कार्यक्रम प्रसारित हो रहे
> हैं। तकरीबन ये सभी क्राइम
> शो 24 घंटे में दो से तीन बार
> दिखाए जाते हैं यानि मूल
> एपिसोड का एक या दो बार पुन:
> प्रसारण किया जाता है।
>
> लेकिन,दिलचस्प बात यह है कि
> इन कार्यक्रमों के अलावा
> समाचारों में भी सनसनीखेज
> समाचार खासी जगह पा रहे
> हैं। देश के दो प्रमुख न्यूज
> चैनलों में दो ट्रेंड यह बन
> गया है कि ऐसी सनसनीखेज
> खबरों को आधार बनाकर
> आनन-फानन में आधे घंटे का
> कार्यक्रम बना दिया जाए।
> उदाहरण के लिए-यदि दोपहर 12
> बजे किसी शहर से बलात्कार या
हत्या (कुछ हद तक हाई प्रोफाइ
> ल) की खबर आती है,
> तो उस पर कुछ वक्त बाद पूरे
> आधे घंटे का कार्यक्रम बना
> दिया जाए-नाम दिया जा सकता
> है- बलात्कार का बम वगैरह
> वगैरह। इसके अलावा, समाचार
> चैनलों पर वो खबरें खासतौर
> पर जगह पा रही हैं, जिन्हें
> पत्रकारिता की पुरानी
> पीढ़ी समाचार मानने से ही
> इंकार कर सकती है। मसलन- 150
> फीट ऊंचे टॉवर पर चढ़ा एक
> उन्मादी प्रेमी। पिछले छह
> महीने का ही जिक्र करें तो
> कुंजी लाल (जिसने अपनी मौत
> का ही ऐलान कर डाला), गजराज से
> मिला यमराज (जिसमें एक शख्स
> ने मरने के बाद यमराज से
मिलने का दावा किया), फरीदाबा
> द मंदिर कांड (जिसमें एक दंप�
> �्ति कुछ बच्चों
> को मंदिर में रखते हैं),
> सांप का भगवत प्रेम (आगरा के
> गांव में एक सांप रोजाना
> रामायण पाठ सुनता था),
> नौकरानी के बच्चे को पीटने
> की खबर, इंदौर के खंभे पर
> चढ़ा नौजवान, दाऊद की
> पार्टी, ऑपरेशन दुर्योधन
> और ऑपरेशन चक्रव्यू, ऑपरेशन
> घूसमहल, छोटे-मोटे कई स्टिंग
> ऑपरेशन मुख्य हैं। इनमें
> ऑपरेशन दुर्योधन,ऑपरेशन
> चक्रव्यू और ऑपरेशन घूसमहल
> को छोड़ दिया जाए तो बाकी को
> गंभीर पत्रकारिता की
> श्रेणी में नहीं रखा जा सकता
> है। हालांकि, कई दर्शकों का
> यह भी मानना है कि इन तीनों
> ऑपरेशनों की खबर दिखाते
> वक्त भी टीवी चैनलों ने खबर
> को जरुरत से ज्यादा खींचा
> यानि इन खबरों में भी सननसी
> पैदा की।
>
>
> मैंने इन तमाम खबरों को
> लेकर कुछ चैनलों के अहम
> पदों पर बैठे लोगों से बात
> की तो उन्होंने तीन प्रमुख
> तर्क दिए। 1-क्राइम और सनसनी
> बिकती है 2-सारा मामला
> टीआरपी का है 3-ऐसी खबरें
> मिलती भी बहुत हैं अब, इन
> तीन तर्कों पर मेरा अध्ययन
> जारी है। क्राइम और सनसनी
> बिकती है, यह कहां तक सच
है,कहना मुश्किल है। लेकिन,ट�
> ��आरपी यानि
> टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट्�
> � के आंकडे कहते हैं कि क्राइ�
> �� आधारित कार्यक्रम और खबरें
> बिकती हैं। खबरे
> बिकती हैं तो उन्हें
> विज्ञापन मिलते हैं और
> विज्ञापन मिलते हैं तो और
> कार्यक्रम, और सनसनी पैदा
की जाती है। क्राइम प्रोग्र�
> ��म दर्शकों को कितने पसंद
> आत�
> � हैं, इस सिलसिले में मैं अपन�
> �� सर्वेक्षण
> भी कर रहा हूं लेकिन फिलहाल
> टीआरपी को लेकर कुछ नए तथ्य
> पता चले हैं। दिलचस्प बात यह
> कि ये तथ्य न केवल टीआरपी
> पर शक पैदा करते हैं बल्कि
> सनसनी बेचने की पूरी थ्योरी
> पर ही सवालिया निशान लगाते
> हैं। टीआरपी के बारे में ये
> पांच प्वाइंट गौर फरमाने
> लायक हैं। इस बार मैं इनकी
चर्चा भर कर रहा हूं-विश्लेष�
> �� अगली पोस्टिंग में करुंगा।
> दरअसल, ये पांच प्वाइंट हैं-
> 1-
> टीआरपी नापने के लिए मीटर
> देशभर में केवल 5500 घरों में
> लगाए गए हैं। 2- टीआरपी मीटर
> भी चैनल के आधार पर नहीं
> बल्कि फ्रीक्वेन्सी के
> आधार पर गणना करता है। यानि
> टीवी सैट में दो नंबर,तीन
> नंबर,चारनंबर आदि पर जो चैनल
> आता है,वो उसकी गणना करता
> है। हमारें यहां केबल
> ऑपरेटर हर आए दिन चैनल का
> नंबर बदलते रहते हैं 3-मीटर
> बिहार,झारखंड,अंडमान जैसे
> कई राज्यों में हैं ही नहीं
> 4-एक मीटर की कीमत लाखों में
> हैं,लिहाजा टैम( टीआरपी गणना
> करने वाली कंपनी) और मीटर
> लगाने की इच्छुक नहीं है।
5-विज्ञापन प्रदाता कंपनियो�
> � के पास कार्यक्रमों की
> लोकप्रियता जानने का कोई
> और साधन नहीं हैसलिहाजा वो
> टीआरपी के आधार पर ही
> विज्ञापन देते हैं और बहुत
हद तक इसके आधार पर विज्ञापन
> दर तय की जाती है। अब,इनका व�
> �श्लेषण अगली
> पोस्टिंग में। मैं कोशिश
> कर रहा हूं कि इस पूरे
> गड़बड़झाले के बारे में और
> ज्यादा जानकारी जुटायी जा
> सके। साथ ही, सनसनीखेज
> कार्यक्रमों की टीआरपी
> क्या रही,इसके आंकडे भी
> जुटाए जा सके। सनसनी बेचने
की कोशिश और क्राइम प्रोगाम�
> �स के बारे में आप क्या सोचते �
> ��ैं, मेरे लिए ये जानना
> महत्व�
> ��ूर्ण
> है। धन्यवाद पीयूष
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