[Deewan] दूसरा खेप
Brajesh Kumar Jha
brajesh_1974 at rediffmail.com
Fri Mar 3 02:56:28 IST 2006
दूसरे अनौपचारिक खेप का पहला भाग।
शुरूआती दौर में फिल्मी गीत-संगीत साधारण लोगों की रुचि के
हिसाब से नहीं रचे जाते थे। चूँकि सिनेमाघर चुनिन्दा शहरी इलाकों
में ही सीमित थे इसलिए गीत-संगीत भी चुनिन्दा भद्र समाज के
रसिकों एवं पारखियों के लिए ही बनाए जाते थे।
पर, इस नजरिए में बदलाव तब आया जब ग्रामोफोन रेकाड और
मशीन आम लोगों की पहुँच में आ गया। रईसों और जमींदारों के
जरिए ठेठ देहाती इलाकों में भी ठुमरी और ख्याल गूँजने लगे।
यानी, ग्रामोफोन के बढ़ते प्रचलन एवं रेडियो ब्राडकास्टिंग की सुविधा
ने श्रोताओं की संख्या में लगातार इजाफा किया।आगे शीध्र ही सकारात्मक
प्रतिक्रिया आने लगी। अभी फिल्मों ने घुटने के बल चलकर बोलना ही
सीखा था कि इसके गीत लोकप्रिय होने लगे। गीतों को नया रंग व
आकार देने में न्यू थिएटर्स की फिल्म 'देवदास' ने बड़ा काम किया।
ऐसे किस्से हैं कि इस फिल्म ने गीत-संगीत और रोमांस की जुगलबंदी
के युग का सूत्रपात किया।खैर!
यहीं से नवीन तर्ज एवं गानों के कारण फिल्मों की 'रिपीट वेल्यू' भी बढ़ी।
दर्शक दुबारा-तिबारा टिकट -खिडकी तक आने लगे।
इस प्रतिक्रिया ने फिल्मकारों के मन में कुछ नया इजाद करने की बेचैनी
पैदा कर दी।
फिल्म 'चंडीदास' के लिए आभा मिश्र कश्‍मीरी ने प्रेम-मय गीत लिखे
प्रेम नगर मैं बनाऊंगी घर में
तज के सब संसार
प्रेम का आंगन प्रेम की छत
और प्रेम के होंगे दुलार
प्रेम सखा हो प्रेम पडो़सी
प्रेम में सुख का सार
प्रेम के संग बिताएंगे जीवन
प्रेम ही प्राणाधार
प्रेम सुधा में स्नान करूंगी
प्रेम में होगा सिंगार
॥
यका-यक गीत से मीरा की भक्ति परंपरा का अभास होता है।
'देवदास' में कुल चार गजल गाये गए हैं।हिन्दी फिल्मी गानों में गजल के
ये शुरूआती रूप हो सकते हैं।
फिलहाल मेरा मत लोचदार है,जरूरत पडी तो बदला जा सकता है।
भारतीय रागों पर आधारित गीत भी यहं गुंजता है।
'पिया बिना नहीं आवत चैन'
राग पीलू पर आधारित है।
विवाह के पश्‍चात कन्या-विदाई भारतीय समाज का पारंपरिक सच है। इस पर
ढेरों गीत लिखे गए। किन्तु , इसकी शुरूआत 'सिंगर स्ट्रीट' फिल्म से मानी जा
सकती है।यहं आर,सी ,बोराल ने खुद कुल छ: पंक्ति के गीत लिखे
बाबुल मोरा नइहर छुटा जाये
चार कहार मिल डोलिया उठाव
अपना बेगाना छूटो जाए
आंगन तो पर्वत भयो और भयो विदेश
जो बाबुल घर आपनी मैं चली पिया के देश॥
लगे हाथ एक और बात
लोरी का भी खास जगह है, गाने के रूप में। अब तक की पड़ताल के बूते कह रहा हूँ कि पहली लोरी फिल्म -"जिंदगी " में गायी गई थी जिसे आरजू लखनवी ने लिखा था।
लोरी इस प्रकार है
सोजा, सोजा
सोजा, राजकुमारी
सोजा मैं बलिहारी
सोजा मीठे सपने आएं
सपनें में भी दर्श दिखाएं
उड़ने वाला घोड़ा ॥
चूमे मांग तुम्हारी
सोजा, सोजा राजकुमारी ॥
दूसरा भाग अगले दूपहरिया तलक।
धन्यवाद
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