[Deewan] दीवान में तीसरा खेप

brajesh kumar jha jha.brajeshkumar at gmail.com
Tue Mar 28 17:28:00 IST 2006


*तीसरे खेप का पहला भाग दीवान को**–*

दूसरा खेप भेजते ही एक रोज एम.फारुकी जी से मुकालात होती है। जैसे ही वक्‍त
मिला मैंने

गीतों की भाषा को लेकर उनसे चर्चा छेडी। यकीन मानिए उस थोडे समय में ज्‍यादा
जानकारी

मेरे हिस्से ही आई। पर हँ,यह सच है कि उनसे हुई चर्चा मुझे जरा पीछे लौटने को
मजबूर करती

है। मेरी कोशिश है कि बातें ज्‍यादा विश्‍वसनीयता व साफगोई के साथ अगले पायदान
तक पहुँचे।

यह ठीक भी रहेगा।

एक लम्बी तफतीस के बाद मैं यह स्पष्‍ट कह दूँ कि बोलती हिन्‍दी सिनेमा
में लोकगीतों
व ठेठ

आंचलिक शब्‍दों की बयार शुरुआती वर्षों में ही आने लगे थे। वैसे, पारंपरिक
गीतों का कदमताल भी

यहीं से जारी है जैसे- *"**काहे मारे पिचकारी लला हो काहे मारे पिचकारी** "* दौलत
का नशा -फिल्म

का यह गीत होली का पारंपरिक गीत है। सन् 1931 में ही बंबई की इंपीरियल मुवीटोन
ने इस

फिल्‍म का निर्माण किया था।

शादी के बाद लडकी की बिदाई भारतीय समाज की अटूट परंपरा है। यह फेविकोल का मजबूत
जोड है।

आगे भी नहीं टूटने जा रहा है। शायद इसी वास्ते सन् 31 में जो इस पर लोगों की
नजर टिकी सो अब

तक हटी नहीं है।

*"**बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए**"*

मास्टर बसंत द्वारा लिखे इस पारंपरिक गीत को फिल्म ट्रैप्‍ड (1931) में सबसे
पहले दुर्गा खोटे पर

फिल्माया गया था। आगे सन् 40 तक इन्‍हीं बोलों को और दो बार फिल्‍माया गया।
नाचवाली (1934),

और स्‍ट्रीट सिंगर (1938) में।

' स्‍ट्रीट सिंगर ' के गीतकार को लेकर मैंने दूसरे खेप में आर.सी.बोराल का नाम
लिया था। उसे वापस

लेता हूँ। दरअसल, आर.सी.बोराल ' स्‍ट्रीट सिंगर ' के संगीतकार और आरजू लखनवी
गीतकार थे।

यहां आरजू लखनवी में गीत का दोहराव अचानक ही मिल जाता है। खैर, इस पर चर्चा बाद
में।

अब जरा गौर फरमाइये–

*"**राजा जानी न मारो नजरवा के तीर रे**…………**।**"*

यह गीत ' भारती बालक ' फिल्म से है। इसका निर्माण मादन थियेटर ने सन् 1931 में
किया था।

' ट्रैप्ड ' फिल्‍म का – *" **साँची कहो मोसे बतियां**, **कहां रहे सारी रतियां
** "*

या फिर, दौलत का नशा – फिल्‍म का एक गीत-

*" **गगरिया भरने दे बांके छैला**,*

*भर दे भरा दे सर पर उठा दे**………*।"

इधर मैं लगातार महसूस कर रहा हूँ कि लोक जीवन से उपजे शब्दों-गीतों का इस्तेमाल
सिनेमा द्वारा

आवाज की दुनिया में दाखिल होते ही शुरु हो गया था। हाँ, इन बातों का खयाल जरूर
रखा गया कि

इन ठेठ देहाती शब्दों में खुरदरेपन की बजाय एक प्रवाह हो ताकि उसे सहजता से
लयबद्ध किया जा

सके। *घुंघरवा**, **गगरिया**, **नजरवा**, **बलमवा**, **सुरतिया या फिर मोरा**,
**तोरा**, **मोसे**, **तोसे**, **सांची* (सच) इनके बारे

में क्या खयाल है? बात ऐसी है कि हिन्दी पट्टी के पूर्वी हिस्से में कहीं भी -कभी
भी आकारांत जोड देने

की गजब परंपरा है। गीतकारों ने भी इस चलन का खूब इस्तेमाल किया। इसकी वजह पर
गुफ्‍तगू आगे

करेंगे। आप के खयाल भी मेरे लिए अहमियत रखते हैं।





*गीतों का लोकोक्‍ितयों** – **मुहावरों से अंत**:**संबंध** ——–*

किसी भाषा में लोकोक्तियों और मुहावरों का आधिक्‍य उसकी  समृद्धि का एहसास
कराता है। यह भाषा की

समृद्धि का एक खास मान्‍य पक्ष है। हिन्‍दी इस मामले में किस्‍मत वाली है कि कई
बोलियों ने खडी बोली

के साथ होकर एक समृद्ध भाषा का निर्माण किया। इस फेरे में अवधी, ब्रज जैसी भाषा
खुद बोली हो गई।

अत: एक सम्पन्न भाषा के रुप में हिन्‍दी इन बोलियों की एहसानमंद है।

इसके मुहावरे - लोकोक्तियां दैनिक जीवन के तमाम रंगों से छन-छन कर सामने आती
रही है।

गीतकार जीवन के उन्‍हीं जटिल रंगों-भावों को संप्रेषित के लिए गानों में
मुहावरों का इस्तेमाल करते रहे हैं।

मुलाहज फरमाइये—

*"**प्रीत है नागन काल निशानी, इसका डसा न माँगे पानी……**"*

फिल्म –बैरिस्टर वाइफ (1935) गीतकार- पं. नारायण प्रसाद'बेताब'।

*"**जग में है प्रीत की रीत कठिन, लोहे के चने चबाना है…….**"*

फिल्म- कृष्ण सुदामा (1933) रणजीत मुवीटोन, बंबई।

*"**राई का पर्वत बनाऊँगा मैं, बालू में नाव चलाऊँगा मैं…………**"***

फिल्म – काला पहाड (1933)।

"*दिल के फफोले जल उठे……अन्‍धे की लाठी तू ही है**"*

फिल्म –धूप-छाँव(1935) पं.सुदर्शन।

*"**छीन ली खून पसीने की कमाई तू ने,***

*खूब पानी से उतारी है मलाई तू ने**"*

फिल्म – देवदासी(1935) रणजीत मुवीटोन बंबई।

उपर लिखे केवल पांच ही नहीं पचासौं हैं।



क्या यह आश्‍चर्य की बात नहीं कि एक अरसा बाद भी कुछ पुराना नहीं हुआ। कोई देशज
शब्द छूटे। अब भी गीतों में –आँखे चार, खून पसीने की कमाई हो तो खाएंगे……जैसे
मुहावरे युक्‍त पंक्तियां आती रहती है।

अटरिया, बलमा, कलेजा, सजनवा, पनिया जैसे शब्द अपनी रफ्तार से फासिला तय कर रहा
है।

यहां से दम भर जो उधर फेरता हूँ तो ताज्जुब होता है।

शब्दों के प्रयोग पर, इसके लगातार दोहराव-तिहराव पर किन्तु, हमेशा नए लहजे में।



लोगों के खयाल मुझे मिल रहे हैं, किन्तु उनके खयाल मेरे यकीन तक पहुंचे और तब
कुछ कहूं तो बात बने।

धन्यवाद। स
-------------- next part --------------
An HTML attachment was scrubbed...
URL: http://mail.sarai.net/pipermail/deewan/attachments/20060328/d8d7ebb3/attachment.html 


More information about the Deewan mailing list