[Deewan] Aaj ka Nangla
"सीएम लैब, नांगला माँछी"
nangla at cm.sarai.net
Thu Mar 30 22:40:54 IST 2006
29 March, 2006
Nangla Maachi
किसी चीज़ को बनाने में/ बसाने
में जितना समय और मेनत लगती है
उसे बिगाड़ने में उसका 1% भी
नहीं लगता। जैसे हम घर के
कामों में भी देख सकते है
।मेरी मां कहती है कि मैं
कितनी मेहनत से कपड़े धोती
हूँ ( पहले सर्फ में भिगोना,
साबुन और ब्रुश लगाकर रगड़ना,
पानी में खंगालना, छत पर धूप
में सुखाना, फिर प्रेस करना )
और तुम उनको पहनकर कितनी
जल्दी मैला, गंदा कर देते हो।
ख़ैर..........
यह तो ज़िन्दगी में एक आम
प्रकिया है , जो लगातार चलती
रहती है। पर कभी - कभी इने बड़े
बदलाव आते है जिन्हें स्वीकारना बहुत मुश्किल होता है और अंसमभव से लगते है।
शहर को सुंदर और सरल बनाने के
फ उपाय/ तरीके , शहर के ही
बाशिंदों के लिए कितने
बदसूरत और मुश्किल बन जाते
है।
30 सालों से जहां नांगलामाची
बस्ती बसी हुई थी अब शहर के इस
बिंदू को कुछ अलग मुखौटा देने
की कोशिश में है हमारी सरकार।
शायद हमारी सरकार भी 5 साल में
बनती है और उसको गिराने के
लिए 1 election काफी होता है।
नांगलामाची में हम जब पहले
जाते थे तो गली में घुसते ही (
अब चाहे वो बस स्टोप के पास
वाली गली हो या CNG Pump वाली गली )
लोगों की अलग-– अलग आदाओं से
तआरुफ होता था। कहीं पर 4
बुज़ुर्गं बैठे ताश खेलते
नज़र आते, कहीं कोई औरत अपने
बच्चों को नल के पास नहलाती
हुई नज़र आती, कहीं 3-4 लड़कों
का खड़ा हुआ group नज़र आता, कहीं
कोई नहाता - कपड़े धोता नज़र
आता, स्कूल से आते या जाते
बच्चों की मस्ती जो उनके चलने
की अदा में बखूबी उभर जाती,
मार्किट में दुकानों पर बैठे
शख़्स और उनसे मोल – भाव करते
ग्राहक, कोई अपनी ही धुन में ,
जलदबाज़ी में चलता हुआ नज़र
आता, कहीं घरों के बाहर एक
दूसरे की जूएं देखती लड़किया
दिखती, कहीं अपने दरवाज़ों या
दरवाजों पर पड़े पर्दों से
लिपटी या झांकती लड़किया
दिखती जिनको सजने-सवरने का
नया शौक लगा है और यह उनको
एहसास दिलाता है कि वो अब
बड़ी होने लगी है। कहीं
खेलते-कूदते- चिल्लाते -भागते
बच्चों का रैला दिखता, कहीं
खूटे से बंधी बकरियां और
दूसरे जानवर नज़र आते जिनके
आगे उनका चारा-पानी रखा हुआ
दिखता, S.T.D, Parlour, Tailour, Meat आदि जैसी
दुकानों पर भी अपना एक रचा -
बसा माहौल नज़र आता। पर आज की
तारीख में इन सब चीजों के रंग
कहीं दब गए थे, हर तरफ़ हलचल का
एक माहौल था। जो एक- दूसरे से
अलग होते हुए भी एक ही दिशा
में बहता महसूस हो रहा था।
पहले हर एक की अदा , माहौल का
अपना ही रंग होता जैसे आसमान
में इन्र्दधनुष। पर आज जब कदम
नांगला की तरफ बढ़े तो वहां
बाहर से ही POLICE की ख़ाकी वर्दी
का रंग चारों तरफ फैला हुआ
नज़र आया।
वर्दी का यह रंग ही लोगों को
डराने के लिए काफी होता है
चाहे भले ही उस रंग को पहना
शख़्स कुछ ना करें। यहां हो भी
यही रहा था। सैकड़ो की ताहदात
में पुलिस थी पर सब अपने में
मस्त थे। बैठे हुए, घूमते हुए,
बातें करते हुए, बोर होते हुए
यह लोगों को और उस जगह को देख
रहे थे।
इस हलचल और गतिवान माहौल में
एक ठहराव लाये हुए थे या यह
खुद ही एक धहराव का केंन्र्द
बने हुए थो।
आज सड़क को बड़ी-बड़ी पुलिस की
गाड़ियों , टैम्पू और ट्रक
जैसे बड़े वाहनों ने घेर रखा
है जिससे सड़क के ट्रैफिक पर
भी असर पड़ रहा है। नांगला की
वो रिंग रोड वाली सड़क जहां
गाड़ियों की ज़न्नाटेदार
आवाज़ , हवा हमें तेज़ी का
अहसास कराती हु ई दौड़ती
दिखती थी आज उस सड़क पर सबसे
ज़्यादा होर्न की आवाज़े
सुनाई आ रही है।
नांगलामाची के बाहर पटरियों
पर , बाहर की जगह पर थोड़ी।
थोड़ी दूरी पर लोगों का बंधा
हुआ सामान रखा है। ज़्यादातर
उस सामान के आस- पास बच्चें
घूमते या खड़े हुए नज़र आ रहे
है। बड़े लोग अंदर से सामान
बाहर ला-लाकर इकटठा कर रहे है।
कहीं 2 आदमी भारी मशक्कत के
साथ अपनी फ्रिज उठाकर ला रहे
है तो कोई अपने एक हाथ में
पंखा उठाए चला आ रहा है। कोई TV
उठाकर ला रहा है तो बार-बार
अपने रास्ते को देखता हुआ चल
रहा है कहीं रास्ते में ऐसा
कुछ ना आ जाए जिससे वो गिर
जाए। हर कोई एक दूसरे को जगह
देता हुआ चल रहा है। सबकी चलने
की एक अपनी लय , अदा है।
कईं घरों में सामान बंधा हुआ
रखा है शायद यह आस है कि हमारा
घर ना टूटें, शायद हम दोबारा
से इस जगह में बस पायें।
आज नांगला में एक भी गाने की
आवाज़ नहीं है वरना पहले तो हर
5-10 की दूरी पर Radio FM के अलग- अलग
स्टेशन सुनने को मिलते थे। और
CD वालों की दुकानों में तो
लगातार , नए-नए गानों के साज़
चारों तरफ फैले हुए और एक
लोगों को उस बंधे - बंधाए
माहौल में न्यौता देते महसूस
होते थे।
आज नांगला में धूल बहुत उड़
रही है शायद इस कारण कि लोग
अपने घरों और दुकानों को खुद
तोड़कर वो चीज़े निकाल रहे है
जो उनके नए घर बनाने में काम आ
सकती है जैसे घर के दरवाज़े,
दुकानों के शटर, दिवारों में
लगी कुंडिया आदि।
बहुत सारी जगहें खाली हो चुकी
है । उस खाली जगह में कोई
हल्का-सा भी बोलता है तो आवाज़
पूरे आकार में गूँज जाती है और
बाहर तक भी अपना फैलाव बनाती
हुई दिखती है। अब यहां घर और
दुकानों की की पहचान वहां
लिखे नामों या निशानों को
देखकर ही पता चल रही है।
क्योंकि अब घर, दुकानें ,
चौराहें, ठिये , चबूतरे सिर्फ
एक आकार को ही लेकर खड़े हुए
है अभी जिन में अब कोई जान
नहीं , जो कभी भी गिरकर एक
समतलता में आसानी से समाने को
तैयार है ।
पर एक दुकान अभी भी क़ायम है
जिसमें लेन-देन , खरीदना-
बेचना अभी भी चल रहा है और वो
है कबाड़ी की दुकान। आज सबसे
ज़्यादा उसकी दुकानदारी हो
रही है।
शायद लोग सोच रहे है कि हम
कितना, कहाँ- कहाँ तक और कितना
पुराना सामान लेकर जाएंगे
अपने साथ???
आज घरों के आगे गलियों में वो
सफाई नहीं है जो हर रोज़ देखने
को मिलती थी। लोग अपने घरों को
आगे के हिस्सों को चमकाकर
रखते थे। एक गीलापन और ठंडक -
सी लगती थी। पर आज उन्हीं
जगहों में एक रुखापन-सा लग रहा
है वैसे नलों में तो पानी अभी
भी आ रहा है पर उसको बखूबी
इस्तेमाल नहीं किया जा रहा।
कहीं का नल बंद है, कहीं
इक्का-दुक्का लोग हाथ धोते
नज़र आए, कही आधे एक मिनट के
अंतराल में नल से पानी की
बूंदे टपक रही है।
कहीं नल खुला है बस पानी बहता
जा रहा है, बहता जा रहा है, बस
बहता ही जा रहा है......................
Neelofar
सीएम लैब, नांगला माँछी
http://nangla-maachi.freeflux.net
http://nangla.freeflux.net
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प्यासों की प्यास बुझाता है
नांगला,
दिल्ली में आने वालों का
बसेरा है नांगला।
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