[दीवान]tech-charcha
Vijender chauhan
chauhan.vijender at gmail.com
Thu Apr 19 15:02:29 IST 2007
जी बंधुवर,
यह निश्चय ही एक स्वागत योग्य कदम है। इस वैविध्य से कई रिक्त स्थानों की
पूर्ति होगी
मसिजीवी
On 4/19/07, Ravikant <ravikant at sarai.net> wrote:
>
> हिन्दी चिट्ठाजगत में अब जमकर टेक-चर्चा होने लगी है. पेश है ऐसे ही एक नए
> ब्लॉग की कड़ी, जो
> चिट्ठाकार की अपनी टेक-यात्रा की एक झाँकी भी है. यहाँ जिस रवि का ज़िक्र है,
> वह हैं रवि
> रतलामी, जो इस सूची पर भी बाक़ायदा मौजूद हैं.
>
> मज़े लें
> रविकान्त
>
> http://kkarnatak.wordpress.com/2007/04/19/intro_1/
>
> मैं और हिन्दी लेखन
> April 19th, 2007 ·
>
> रवि जी ने कुछ रैगिंग लेने के अंदाज में पूछा …. "चलिए हमें बताएं कि आप इस
> चिट्ठे पर हिन्दी में कैसे
> लिखते हैं, सरल तरीका क्या है और यदि आप लिनक्स में हिन्दी लिखने का कोई सरल
> तरीका बता सकते
> हैं तो बताएं " . ये रैगिंग भी थी और मेरी क्षमताओं को जानने की कोशिश भी.
>
> रवि जी भले ही मुझे ना जानते हों पर मैं उन्हें जानता हूँ विभिन्न कंप्यूटर
> पत्रिकाओं में छ्पते उनके लेखों
> से. अभी इसी महीने "लिनक्स फॉर यू" में भी उनका लेख छ्पा है . उनका लिनक्स के
> हिन्दी-करण में भी काफी योगदान रहा है. तो वो यदि पूछें लिनक्स और हिन्दी के
> बारे में थोड़ा
> आश्चर्य होता है. ये सवाल तो मैने आपसे पूछ्ना है रवि जी. वैसे उन्मुक्त जी
> भी बता सकते हैं. जहां
> तक मेरा सवाल है मैं बताता हूँ अपने बारे में ( ज्ञानदत्त पाण्डे जी भी यही
> जानना चाहते हैं ).
>
> मेरा कंप्यूटर और हिन्दी से बहुत पुराना नाता है. मैं चिट्ठाजगत ( हिन्दी और
> अंग्रेजी दोनों ) से
> अरसे से जुड़ा हुआ हूँ लेकिन सिर्फ एक पाठक की हैसियत से. इसलिये लगभग सभी को
> इस माध्यम से जा
> नता हूँ. जहां तक हिन्दी की बात है हिन्दी मेरी मातृभाषा है . कंप्यूटर पर
> हिन्दी की जरूरत मुझे
> पड़ी सन 1996 में . मैं एक मैनुफेक्चरिंग कंपनी में काम करता था वहां हम लोग
> मजदूरों के लिये ट्रेनिंग
> मैनुअल बनाते थे जो कि हिन्दी में होते थे . ये सब उन दिनों बाहर से टाइप
> करवाने पड़ते थे. इसमें
> एक तो समय बहुत लगता था और फिर एक बार बनने के बाद उनको बदलना बहुत मुश्किल
> होता
> था .तो हम चाहते थे कि इसको कंप्यूटर में ले के आना . उस समय माइक्रोसोफट
> वर्ड उतना पॉपुलर
> नहीं था . हम लोग 'एमि प्रो' और 'फ्री लांस ग्राफिक्स' इस्तेमाल में लाते थे
> . उस समय किसी
> स्थानीय कंपनी से हमने कुछ सोफ्टवेयर लिया जो कि 'रैमिंगटन क़ी बोर्ड' पर चलता
> था. इसको
> इस्तेमाल करने मे काफी समस्या आती थी. अप्रेल 1998 (शायद) में चिप' पत्रिका
> का पहला अंक आया
> था ( ये 'चिप' के 'चिप-इंडिया' बनने और 'डिजिट' के आने से काफी पहले की बात
> थी ) उसमें भा
> रत-भाषा के प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी दी गयी थी और साथ में 'शुशा' फोंट
> भी थे . तब से ही
> में 'शुशा' फोंट इस्तेमाल करने लगा. बाद में संस्थान के लिये 'अक्षर' और
> 'श्री-लिपि' भी लिये जो
> आज भी कुछ विभागों में सफलता पूर्वक चल रहे हैं. जहां तक अंतरजाल (वैब) पर
> हिन्दी की बात है मैने
> अपनी पहली हिन्दी साइट 1998 में बनायी थी. उस समय वी.एस.एन.एल के डायल अप
> ऎकाउंट होते
> थे और वो सर्वर स्पेस देते थे आपको अपनी साइट होस्ट करने के लिये . उसी में
> अपनी साइट
> ] बनायी थी 'शुशा फोंट' इस्तेमाल करके जो केवल हमारे संस्थान के लोगों के
> लिये थी. मैने अपनी
> पर्सनल साइट 1999 में 'एंजल फायर" में होस्ट की इसमें भी कुछ पेज हिन्दी के
> थे. फिर जियोसिटीज
> (geocities) में 2001 में अपनी साइट बनायी . उस समय जियोसिटीज (geocities) को
> याहू ने
> नहीं लिया था. उसी समय ई-ग्रुप्स में (जो कि अब याहू-ग्रुप है) अपना एक ग्रुप
> भी बनाया. मेरी
> साईट इसी ग्रुप की साईट थी. इसमें भी काफी पेज "शुशा' में थे. लेकिन बाद में
> सदस्यों के कहने पर
> कुछ पेजों को 'रोमनागरी' में बदला ,क्योकि शुशा वाले पेजों को देखने के लिये
> फोंट डाउंलोड करना
> पड़ता था, और कुछ को पी.डी.एफ्. में. ये साइट आधे-अधूरे रूप में आज भी मौजूद
> है .
>
> जहां तक लिनक्स का सवाल है लिनक्स का प्रयोग भी खूब किया लेकिन अधिकतर प्रयोग
> सर्वर पर ही
> किया डैक्सटौप पर नहीं . हम लोग 'HP-Ux' और 'AIX' पर काम करते थे तो
> 'युनिक्स' पर
> हाथ साफ था. सारे सर्वर युनिक्स पर ही थे. लिनक्स को जाना पी.सी.क़्यू. लिनक्स
> के माध्यम से
> और एक दो बार विंडोज पार्टीशन करने के चक्कर में अपने कीमती डाटा भी खो दिये
> . लिनक्स को
> डैस्क्टोप में केवल प्रयोग के लिये ही इस्तेमाल किया और लगभग सभी फ्लेवर पर
> काम किया .
> पी.सी.क़्यू. लिनक्स ,रैड हैट , सूसे , डैबियन , युबंटू और भी बहुत सारे .
> अपने संस्थान में
> लिनक्स को स्थापित किया . पूरा का पूरा मेल सिस्टम लिनक्स पर बदला . फायर-वाल
> के लिये
> पहले 'चैक-पॉंईट' और फिर 'सूसे फायरवाल' का प्रयोग किया , प्रोक्सी सर्वर के
> लिये
> 'स्कविड' का प्रयोग किया . ये सभी अभी भी मेरे पहले वाले संस्थान में सफलता
> पूर्वक चल रहे हैं .
>
> जहां तक डैक्सटौप का सवाल है उसके लिये भी काफी प्रयास किया पर लिनक्स कभी भी
> मेरे पसंद का
> ओ.एस. नहीं बन पाया .वर्ड प्रोसेसिंग के लिये भी 'मुक्त और मुफ्त' विकल्प
> देखे. स्टार ऑफिस के
> व्यवसायिक होने से पहले उसे भी आजमाया और फिर 'ओपन ऑफिस' को भी . हाँलाकि
> मुझे तो 'ओपन
> ऑफिस' ठीक लगा पर मेरे संस्थान के लोगों के बीच नहीं चला . मुख्य कारण रही
> इसकी माइक्रोसौफ्ट
> वर्ड के साथ कम्पैटेबिलिटी . क्योकि अधिकतर लोग माइक्रोसौफ्ट वर्ड इस्तेमाल
> करते हैं और उनके
> द्वारा भेजी गयी सामग्री ओपन ऑफिस में कभी कभी नहीं खुलती.
>
> जहां तक रही कम्प्यूटर पर मेरे हिन्दी लेखन की बात तो मैं माइक्रोसौफ्ट
> विस्टा और ऑफिस 2007
> इस्तेमाल करता हूं . मैने विस्टा में 'हिन्दी भाषा पैक' और ऑफिस के लिये
> 'इंडिक आई.एम.ई.' लगा
> रखा है. कभी कभी बराहा भी इस्तेमाल कर लेता हूं. लिनक्स में यदि कभी हिन्दी
> का इस्तेमाल करना
> हो तो ऑनलाईन टूल इस्तेमाल कर लेता हूं. लिनक्स में आजकल फैडोरा और स्लेड
> (सुसे लिनक्स इंटरप्राइज
> डैस्कटौप 10 ) इस्तेमाल करता हूं.
>
> इस चिट्ठे में मैं उन तकनीकी विषयों को छूना चाहता हूं जो कि एक संस्थान के
> लिये आवश्यक हैं और जि
> नके बारे में अभी भी हिन्दी चिट्ठा जगत में चर्चा नहीं होती जैसे ई.आर.पी,
> फायरवाल , नैटवर्किंग
> वगैरह वगैरह . हिन्दी कैसे लिखें बताने के लिये पंकज भाई का वीडियो है ,
> सर्वज्ञ है , श्रीस जी हैं
> और भी बहुत लोग हैं और फिर रवि जी तो हैं ही.
>
> वैसे रवि जी आपका विंडोज विस्टा वाला लेख भी पढ़ा था उसमें आपने लिखा था कि
> विंडोज विस्टा में
> 3डी सपोर्ट है . मेरे हिसाब से ऎसा नहीं है . विंडोज विस्टा केवल एअरो इफेक्ट
> ही सपोर्ट करता
> है 3डी नहीं .ये तो अभी तक इनबिल्ट केवल लिनक्स में ही है.
>
> शेष फिर…..
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