[दीवान]मेरठ का प्रकाशन उद्योग

VIJAY PANDEY vijaykharsh at gmail.com
Thu Apr 26 01:49:27 IST 2007


*प्रि‍य दोस्‍तों, मेरठ के प्रकाशन उद्योग के सफरनामे पर आपको ले चलने के लि‍ए
मैं वि‍जय कुमार पाण्‍डेय सीएसडीएस सराय की फेलोशि‍प के तहत दीवान की पोस्‍टिंग
‍के जरि‍ए दूसरी बार हाजि‍र हूं। पहली पोस्‍टिंग में मुझसे और फेलोशि‍प के
वि‍षय मेरठ के प्रकाशन उद्योग से आपका परि‍चय हुआ था। मेरठ के प्रकाशन उद्योग
के सफरनामे के शुरुआती चरणों से भी आप रूबरू हुए थे। *

* *

*अबकी बार से मैं आपको सि‍लसि‍लेवार तरीके से मेरठ के प्रकाशन उद्योग की
शुरुआत, प्रकाशन उद्योग की प्रमुख घटनाओं और मेरठ शहर के वि‍कास के संक्षि‍प्‍त
सफरनामे पर ले चलूंगा। अगली बार मेरठ के मौजूदा प्रकाशन उद्योग ने कैसे आकार
लि‍या इससे रूबरू कराउंगा। तो चलि‍ए चलते है मेरठ के प्रकाशन उद्योग और इस
उद्योग के चलते मेरठ शहर के वि‍कास की यात्रा पर। *

* *

मेरठ के प्रकाशन उद्योग की यात्रा का आधुनि‍क मेरठ शहर के वि‍कास से गहरा नाता
रहा है। लगभग दो सौ साल पहले 1806 में ब्रि‍तानि‍यों ने मेरठ में कैंट की
स्‍थापना की। इसी समय को आधुनि‍क मेरठ शहर के सफरनामे की शुरुआत का भी माना जा
सकता है। मेरठ में कैंट की स्‍थापना के आसपास ही मेरठ में प्रकाशन उद्योग की
नींव पड़ी। मेरठ में पहला छापाखाना कब स्‍थापि‍त हुआ, इसका फि‍लहाल कोई
साक्ष्‍य नहीं मि‍ला है। हो सकता है आगे शोध के दौरान इसके बारे में कुछ मालूम
हो सके।



1849 में समाचार पत्रों और मुद्रणालयों से संबंधि‍त एक रि‍पोर्ट प्रकाशि‍त हुई।
यह रि‍पोर्ट वर्तमान उत्‍तर प्रदेश (तत्‍कालीन दक्षि‍णी उत्‍तरी भागों) की थी।
इस रि‍पोर्ट के मुताबि‍क उस समय तक उत्‍तर प्रदेश (तत्‍कालीन दक्षि‍णी उत्‍तरी
भागों) में 23 मुद्रणालय थे। इनमें पुस्‍तक मुद्रण के अति‍रि‍क्‍त 29 समाचार
पत्र और पत्रि‍काएं छपते थे।



1850 तक तत्‍कालीन दक्षि‍णी उत्‍तरी भागों (इसमें लखनउ शामि‍ल नहीं है) में कुल
24 मुद्रणालय थे। इनमें आगरा में सात, बनारस चार, दि‍ल्‍ली में दो, मेरठ में
दो, लाहौर में दो और बरेली, कानपुर, इंदौर व शि‍मला में एक-एक छापेखाने थे।
मेरठ के प्रकाशन उद्योग के वि‍कास में हि‍न्‍दी और उर्दू दोनों सगी बहनों का
बराबर का योगदान था। लेकि‍न शुरुआती सालों में मेरठ उर्दू प्रकाशन के ही जाना
जाता था। मेरठ के छापेखानों में आज से सवा सौ साल पहले तक अधि‍कांश प्रकाशन
उर्दू में ही होते थे। 1850 के आसपास मेरठ से एक समाचार पत्र जाम ए
जम्‍शैदनि‍कलता था। हालांकि‍ यह अखबार कि‍स छापेखाने में छपता था और पत्र
की सामग्री
के वि‍षय में कुछ भी मालूम नहीं है।



मेरठ के ऐति‍हासि‍क कस्‍बे सरधना की बेगम समरु, जि‍न्होंने ईसाई धर्म स्‍वीकार
कर लि‍या था, का भी प्रकाशन उद्योग के वि‍कास में सराहनीय योगदान है। बेगम समरु
के ईसाई धर्म स्‍वीकार करने से सरधना रोमन कैथोलि‍क मि‍शनरि‍यों का केन्‍द्र बन
गया। यहां ईसाई मि‍शनरि‍यों ने 1848 के आसपास एक मुद्रणालय खोला। इसका
उद्देश्‍य धर्म प्रचार में योगदान करना था। इसमें 1850 से पहले उनकी धार्मि‍क
पुस्‍तकें प्रकाशि‍त होती थीं इसके अलावा ईसाई पादरि‍यों के व्‍याख्‍यान और
वार्तालाप फारसी और देवनागरी में छापे जाते थे।



1857 के गदर से पहले देश के कई हि‍स्‍सों में जनमानस में ब्रि‍तानि‍यों के
खि‍लाफ माहौल बन रहा था। मेरठ से प्रकाशि‍त होने वाली पुस्‍तकों, समाचार
पत्रों, पंपलेटों आदि‍ ने यहां इस भूमि‍का को बखूबी नि‍भाया। 1857 में
जमीलुद्दीन हि‍ज्र साहब मेरठ से अपना एक पत्र नि‍कालते थे। वह दि‍ल्‍ली के सादि‍क
उल अखबार का भी संपादन करते थे। उनका यह अखबार शाही महल भी जाया करता था। 1857
के गदर के बाद जब मुगि‍लया सल्‍तनत के अंति‍म बादशाह बहादुरशहर जफर के खि‍लाफ
ब्रि‍तानि‍यों ने मुकदमा चलाया, उसमें इस अखबार का जि‍क्र बार बार आया है। इसके
चलते हि‍ज्र साहब को गि‍रफ्तार कि‍या गया। उनके खि‍लाफ भी मुकदमा चला और उन्हें
तीन साल की सजा मि‍ली।



उन्‍नीसवीं सती के अंति‍म दशकों से पहले खड़ी बोली के गढ़ मेरठ के प्रकाशन
उद्योग में हि‍न्‍दी का प्रकाशन अपेक्षाकृत कम होता था। लेकि‍न सदी के अंति‍म
दशकों में इसमें बदलाव हुआ। इसमें दयानंद सरस्‍वती के आर्य समाज और मेरठ के ही
स्‍थानीय नि‍वासी पंडि‍त गौरीदत्‍त शर्मा का भारी योगदान था। स्‍वामी दयानंद
सरस्‍वती के भाषणों से प्रभावि‍त होकर खुद को देवनागरी के प्रचार के लि‍ए
समर्पि‍त कर देने वाले पंडि‍त गौरीदत्‍त शर्मा ने 1887 में एक मासि‍क
पत्र देवनागरी
गजट और 1892 में देवनागरी प्रचारक नि‍काला। 1894 में नागरी प्रचारि‍णी सभा का
गठन कर मासि‍क पत्र देवनागर का प्रकाशन कि‍या। ये सभी पत्र यही के छापेखानों
में प्रकाशि‍त होते थे। इसके अलावा पंडि‍त जी ने एक उपन्‍यास देवरानी जेठानी की
कहानी भी लि‍खा था। पहली बार 1870 में इसका प्रकाशन मेरठ के जि‍याई छापेखाने में
लीथो पद्ध्‍ति‍ से हुआ। इसकी प्रति‍ आज भी कलकत्‍ता के नेशनल लाइब्रेरी में
सुरक्षि‍त है। हि‍न्‍दी के मशहूर साहि‍त्‍यकार आचार्य क्षेमचंद्र सुमन ने इसे
खड़ी बोली हि‍न्‍दी का पहला उपन्‍यास कहा है। पंडि‍त जी ने अपने पत्रों के
जरि‍ए देवनागरी को बढ़ावा देने के लि‍ए देवनागरी गजट में भजन और आरती प्रकाशि‍त
कि‍ए। उनके भजन महि‍लाओं में काफी लोकप्रि‍य थे। पंडि‍त जी देवनागरी के प्रचार
को लेकर इतने समर्पित थे कि‍ वे परस्‍पर अभि‍वादन में भी जय नागरी का प्रयोग
करते थे।



आचार्य क्षेमचंद्र सुमन के मुताबि‍क हि‍न्‍दी का दूसरा उपन्‍यास वामा
शि‍क्षकमुंशी कल्‍याणराय ने मुंशी ईश्‍वरी प्रसाद के साथ मि‍लकर 1872 में
लि‍खा था। यह
लगभग 11 साल बाद 1883 में मेरठ के वि‍द्या दर्पण छापेखाने में मुद्रि‍त हुआ था।
इन साहि‍त्‍यकारों के प्रयास से खड़ी बोली के गढ़ जनपद मेरठ में उन्‍नीसवीं सदी
के अंत में हि‍न्‍दी प्रकाशन भी बहुतायत में होने लगे।

* *
-------------- next part --------------
An HTML attachment was scrubbed...
URL: http://mail.sarai.net/pipermail/deewan/attachments/20070426/619d27f0/attachment.html 


More information about the Deewan mailing list