[दीवान]इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान

reyaz-ul-haque beingred at gmail.com
Sat Apr 28 13:01:49 IST 2007


 इतिहास निर्माण और राष्ट्र का
आख्यान<http://hashiya.blogspot.com/2007/04/blog-post_26.html>

*ऐसे समय में, जब हिंदीब्लाग में घमसान मचा हुआ हो और निहायत सतही और निरर्थक
बातों पर (वेब) पन्ने काले किये जा रहे हों, एक गंभीर और शोधपरक लेख देना खतरे
से खाली नहीं है. खतरा इस बात का कि पाठक नहीं मिलेंगे. सारा ध्यान तो भड़काऊ
चिट्ठों पर ही चला जाता है. फिर भी एक बात ज़रूर है कि जो बहस चल रही है वह
इतिहास और तथ्यों की ही है. इसी संदर्भ में वैभव सिंह का लेख, तद्भव से साभार.
*

*इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान
(सन्दर्भ : उन्नीसवीं सदी का हिन्दी लेखन) *

वैभव सिंह

*भारत * में परम्परागत रूप से इतिहास के प्रामाणिक स्रोतों के अभाव में पौराणिक
मिथकीय कथाओं और शास्त्राों ने ही इतिहास की भूमिका का निर्वाह किया है। हिन्दू
धर्म की कतिपय धर्मशास्त्राीय मान्यताओं जैसे अवतारवाद , वर्णधर्म और कर्मकाण्ड
को सामाजिक आदर्श का दर्जा प्राप्त था और विभिन्न पौराणिक मिथकीय पात्रां एवं
घटनाओं को इन्हीं सामाजिक आदर्शों की प्राप्ति या इनसे विचलित होने के आधार पर
व्याख्यायित किया जाता था। धार्मिक मान्यताओं द्वारा अनुमोदित इन सामाजिक
आदर्शों को विभिन्न रोचक कथाओं के जरिए वैधता दिलाने का काम पुराणों ने इतनी
कुशलता के साथ किया कि इतिहास की जरूरत ही नहीं रह गयी।
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