[दीवान] second post- kyonki har blog kuch.....
Gauri Paliwal
paliwal.gauri at gmail.com
Mon Apr 30 22:09:08 IST 2007
"क्योंकि हर ब्लॉग कुछ कहता है" विषय पर अपनी दूसरी पोस्टिंग लिखने से
पहले एक ईमानदार स्वीकारोक्ति..
"शोध का ये विषय उससे कहीं दुश्कर है-जितना मैंने सोचा था। दरअसल, इस
फेलोशिप मिलने के बाद ही हिन्दी ब्लॉगिंग यानि हिन्दी चिट्ठाकारिता में
इस तेज़ी से परिवर्तन हुए हैं कि शोध का दायरा लगातार फैलता जा रहा है,
जबकि प्रस्ताव देते वक्त हिन्दी में बमुश्किल 60-70 सक्रिय ब्लॉग थे।"
फिर भी, शायद यही इस विषय में शोध का मज़ा भी है कि हम जितना जानते
हैं,उससे कहीं अधिक जानने के लिए बचा है। शायद,शोध पत्र प्रस्तुत करते
वक्त कई ऐसे नए सवाल भी खड़े होंगे-जिनके बारे में हमने सोचा भी न हो।
इस स्वीकारोक्ति के बाद एक घोषणा- मैंने सराय के शोध के दौरान केस स्टडी
के लिए ही एक व्यंग्य ब्लॉग mastikibasti.blogspot.com बनाया है। इस पर
हिन्दी के कई व्यंग्यकारों से लिखवाने की कोशिश की जाएगी। इस ब्लॉग से
क्या, क्यों और कैसे निष्कर्ष निकालने की कोशिश होगी-इस पर अगली पोस्टिंग
में बात होगी।
बहरहाल, हिन्दी चिट्ठों के बारे में इन दिनों मीडिया में भी इतनी चर्चा
है कि सराय के सभी साथी इस "खेल" से परिचित होंगे। मैंने अपनी पहली
पोस्टिंग में इस बात का ज़िक्र किया था कि हिन्दी में सक्रिय तौर पर
ब्लॉग लिखने वालों की संख्या अभी सीमित है। हालांकि, हिन्दी में ब्लॉग
लिखने वालों की संख्या में तेज़ी से इजाफा हो रहा है,पर अभी भी मेरा
मानना है कि सक्रिय ब्लॉग लिखने वालों की संख्या सीमित ही है।
प्रमुख ब्लॉग एग्रीगेटर नारद के मुताबिक फिलहाल हिन्दी में ब्लॉग की
संख्या 600 से कुछ ज्यादा है। यद्यपि, कई चिट्ठों के नाम हमारी सूची में
हैं, लेकिन सूची पूरी नहीं कही जा सकती। इस बार, मैंने सोचा कि यही देखा
जाए कि हिन्दी में नियमित तौर पर कितने लोग चिट्ठाकारी कर रहे हैं। अब,
नियमित का दायरा क्या हो ? अपनी समझ के मुताबिक और सहूलियत के लिए मैंने
उन चिट्ठों को नियमित माना जो सप्ताह में कम से कम एक बार अपडेट किए गए
हों। लेकिन, मुमकिन है कि इक्का दुक्का सक्रिय चिट्ठाकार किसी विशेष
हफ्ते में एक भी पोस्ट न डाल पाए हों, इसलिए मैंने इस अवधि को नौ दिन कर
दिया। हिन्दी ब्लॉग एग्रीगेटर नारद और हिन्दी ब्लॉग्स डॉट कॉम के जरिए 31
मार्च से आठ-नौ अप्रैल तक के चिट्ठों को खंगाला तो निष्कर्ष में
निम्नलिखित तथ्य सामने आए।
इन नौ दिनों में कुल 150 लोगों ने चिट्ठे लिखे थे। इनमें से कुछ लोगों के
एक से अधिक चिट्ठे भी हैं यानि ब्लॉग की संख्या भले करीब 150 थी, लेकिन
लिखने वाले उससे कम हैं। इऩमें से कुछ चिट्ठाकार अति सक्रियता की अवस्था
मे दिखे यानि इनके चिट्ठे पर नौ दिनों में 10 से भी अधिक पोस्टिंग डाली
गईं। इनमें प्रमोद सिंह के अज़दक का रिकॉर्ड धुआंधार था, जिन्हें इतने
वक्त में 21 पोस्ट डालीं। इनके अलावा,वाह मनी (15),मोहल्ला (13),छू लो
आसमान (18), कमल शर्मा (18),हिन्द युग्म (19),महाशक्ति (12),कुछ लम्हे
(10),वर्षा (10) और ममताटीवी (11) मुख्य हैं। इसी तरह सक्रिय ब्लॉग की
श्रेणी भी बनायी जा सकती है। इसमें वो सारे चिट्ठे हैं, जिनकी बदौलत
हिन्दी चिट्ठों की दुनिया फल-फूल रही है। लेकिन, खास बात यह कि 150 में
से कम सक्रिय चिट्ठों की भी बड़ी संख्या थी। मेरी जानकारी के मुताबिक,
करीब 38 चिट्ठे ऐसे थे,जिन पर नौ दिनों में केवल एक पोस्ट डाली गई। इनमें
रत्ना की रसोई, बारह पत्थर, रेलगाड़ी, होम्योपेथी, दस्तक,राजलेख का
हिन्दी चिट्ठा, नितिन हिन्दुस्तानी का हिन्दी चिट्ठा, यूयुत्सु, ख्वाब का
दर, देश-दुनिया, इंकलिंक, रिफ्लेक्शन, विपन्न बुद्धि उवाच, शब्द यात्रा,
शब्द संघर्ष, महावीर, आवारा बंजारा, शत शत नमन, कुछ सच्चे मोती, मानस के
हंस, युगान्तर और चंपा का ब्लॉग जैसे चिट्ठे शामिल हैं। दिलचस्प बात यह
है कि इन कम सक्रिय ब्लॉग्स में से कुछ इस अध्ययन के बाद दोबारा दिखायी
ही नही दिए यानि इन पर फिर कोई पोस्ट नहीं डाली गई। पहली नज़र में इस तरह
के अध्ययन से एक बात साफ हो गई कि हिन्दी में महज़ 100-110 ब्लॉग्स पर ही
नियमित तौर पर पोस्टिंग हो रही है।
वैसे, इसमें कोई दो राय नहीं कि हिन्दी में चिट्ठों की संख्या में अचानक
काफी बढ़ोतरी हुई है। रोज़ दो-तीन नए ब्लॉग मैदान में उतर रहे हैं।
लेकिन,चार साल के हिन्दी ब्लॉगिंग के इतिहास में केवल 100 से 150 सक्रिय
चिट्ठे यह बताते हैं कि नियमित लिखना मज़ाक नहीं है। ब्लॉग मुफ्त में
बनाए जा सकते हैं,लिहाजा ब्लॉगिंग के बारे में सुनकर या पढ़कर उत्सुकता
में ब्लॉग बनाने वालों की संख्या बहुत अधिक है (हिन्दी -अंग्रेजी और सभी
भाषाओं में), लेकिन नियमित लिखना बेहद दुश्कर है।
अब, हिन्दी ब्लॉग पर नियमित लिखा नहीं जाता, इसलिए सर्च इँजन के जरिए इन
पर हिट्स भी नहीं पड़ते यानि सर्च इँजन के जरिए इऩ्हें नए पाठक नहीं मिल
पा रहे हैं। वरिष्ठ चिट्ठाकार रवि रतलामी ने ब्लॉग 'एक शाम तेरे नाम' पर
मनीष की लिखी एक पोस्ट(हिन्दी चिट्ठाकारिता: कैसा है इसका वर्तमान और
क्या होगा इसका भविष्य) पर टिप्पणी करते हुए लिखा-
" यह कहना कि सर्च से हिन्दी पृष्ठों पर लोग नहीं आते, तो आज की स्थिति
में यह कथन गलत है। मेरे पृष्ठों पर अब 70 प्रतिशत लोग सर्च इंजन के जरिए
पहुंचते हैं- जी हां, हिन्दी सर्च इंजन के जरिए। इसका कारण है-पृष्ठों
में सामग्री की प्रचुरता। अगर सामग्री ही नहीं होगी तो सर्च इंजन क्या
खाक खोजेगा? "
साफ है-हिन्दी चिट्ठाकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती नियमित लिखना है।
अब, यह मुमकिन कैसे होगा-यह हिन्दी चिट्ठाकारी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
अभी जो लोग हिन्दी में सक्रिय चिट्ठाकारी कर रहे हैं, उनके लिखने की चंद
खास वजह हैं। मसलन, लिखने की खुजली, अभिव्यक्ति की माध्यम मिलना, हिन्दी
से जुड़ाव, विदेश में बैठकर हिन्दी वासियों से संपर्क का साधन आदि आदि
(नीलिमा जी ने-हिन्दी चिट्ठाकार हिन्दी में चिट्ठाकारी क्यों करते
हैं(थे) पर अच्छा लिखा है)। मेरा अध्ययन भी जारी है। लेकिन,मुझे लगता है
कि हिन्दी ब्लॉगिंग जब लेखक को अर्थलाभ कराने लगेगी, तब इसमें नियमित
लिखने वाले लेखकों-पाठकों की संख्या बढ़ेगी और विषयों में बहुत तेज़ी से
विविधता दिखायी देगी। (अति प्रारंभिक निष्कर्ष)।
दरअसल, अभी तक हिन्दी ब्लॉगिंग पर विषयों की वो विविधता नहीं दिखायी
देती-जो इसके लिए पाठकों का नया वर्ग तैयार कर सके। चिट्ठाकार अपने अंदाज
में अपनी बात कहते हैं-कभी साहित्य की किसी विधा में तो कभी किस्से के
तौर पर, कभी देखी-पढ़ी बातों का जिक्र होता है तो कुछ चिट्ठों पर अति
गंभीर विषयों पर बहस हो रही है। दिलचस्प बात देखिए कि टेलीविजन न्यूज की
दुनिया में जो चार चीजें सबसे ज्यादा टीआरपी खींचती हैं,उनमें से एक पर
भी हिन्दी में विशेष ब्लॉग नहीं है। ये चार चीजें यानि 4C हैं- Cricket,
Cinema, Crime and Celebrity.। हिन्दी में चिट्ठाकार अपने अंदाज में
क्रिकेट पर (खिलाड़ियों पर भड़ास) लिख तो मारते हैं-लेकिन क्रिकेट को
समर्पित कोई ब्लॉग नहीं दिखता। ये सवाल अहम है कि क्या सिर्फ क्रिकेट के
ब्लॉग के पाठक नहीं है ? इसी तरह, धारणा है कि सिनेमा में सभी की जबरदस्त
दिलचस्पी होती है। टीवी चैनल पर आने वाले कार्यक्रम और अखबारों के बदलते
साप्ताहिक परिशिष्ट इस बात की बहुत हद तक पुष्टि भी करते हैं, पर हिन्दी
में मुख्यधारा के सिनेमा को पूरी तरह समर्पित कोई सक्रिय ब्लॉग नहीं है।
हां, सिलेमा एक ब्लॉग जरुर है। उस पर अच्छी विश्लेषणात्म पोस्ट भी नियमित
लिखी जाती हैं,लेकिन सिनेमा पर लेखन का आर्ट फार्मूला ज्यादा मालूम पड़ता
है। क्राइम बिकता है- लेकिन अपराध जगत की ख़बरें ,उसके पहलू, उससे जुड़े
किस्से, उससे जुड़ी सावधानियां, सुझाव आदि देने वाला कोई हिन्दी ब्लॉग
शायद नहीं है। अंग्रेजी में कई बड़ी सेलेब्रिटी लिख रही हैं,लेकिन हिन्दी
में ऐसा नहीं है। हिन्दी में न तो कोई सेलेब्रिटी (इक्का दुक्का
पत्रकारों को ही मान लें सेलेब्रिटी) लिख रहा है और न सेलेब्रिटी पर लिखा
जा रहा है।
हिन्दी ब्लॉगिंग के बारे में एक दिलचस्प बात और देखने को मिल रही है। वो
है-ग्रुपिज़्म यानि समूहवादिता। हिन्दी चिट्ठों की संख्या भले 150 से
ज्यादा नहीं है, लेकिन चिट्ठाकारों के बीच लिखने और पढ़ने के अँदाज़ में
ही ग्रुपिज्म की झलक दिखायी दे रही है। हालांकि, यह बात बेहद प्रारंभिक
दौर के निष्कर्षों के आधार पर कह रही हूं लेकिन मुझे लगता है कि इससे कई
अच्छे हिन्दी चिट्ठों को नुकसान हो रहा है, और होगा।
पहले मैंने सोचा था कि शोध करते वक्त अपना एक निजी ब्लॉग भी बनाया
जाएगा,लेकिन इस ग्रुपिज़्म और उसमें बह जाने के खतरे के चलते मैंने यह
इरादा फिलहाल छोड़ दिया है। दरअसल, पार्टीसिपैंट आब्जर्वेशन मैथड अपनाने
में बड़ा खतरा यह रहता ही है कि आप ऑब्जर्व करना छोड़, भागीदार बन जाते
हो।
बहरहाल,बातें कुछ और कहनी हैं-लेकिन तथ्यों के साथ हाज़िर होना चाहती
हूं..इसलिए इस बार इतना ही।
हां, इस विषय पर शोध का विचार आने के बाद से मुझे लगता है कि हिन्दी
ब्लॉगिंग का विस्तार तभी हो सकेगा,जब लोगों को अर्थलाभ की संभावनाएं
दिखायी पड़े। मेरे शोध का एक पहलू इस आयाम से भी जुड़ेगा। इसकी शुरुआत हो
चुकी है, जिसकी चर्चा अगली पोस्टिंग में।
-गौरी
(नोट- मजे की बात यह है कि जिस दिन मैंने पोस्ट लिखी, उसी दिन नारद
एग्रीगेटर पर भी सक्रिय-कम सक्रिय आदि से जुड़ी एक लिस्ट हाजिर हो गई।
नारद ने सक्रिय ब्लॉग को 400 के करीब आंका है,लेकिन नारद ने 15 दिन में
कम से कम एक बार अपडेट होने वाले चिट्ठों को भी सक्रिय का दर्जा दिया है।
पर,जब ब्लॉग पर कंटेंट का महत्व बढ़ता जा रहा हो,तो पखवाड़े में एक पोस्ट
कम लगती है और इसलिए मैंने नौ दिन की अवधि रखी।)
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