[दीवान]Fwd: चक दे इंडिया: बाय मिहिर पंड्या
Ravikant
ravikant at sarai.net
Wed Aug 29 14:10:57 IST 2007
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Date: बुधवार 29 अगस्त 2007 02:08
From: mihir pandya <miyaa_mihir at yahoo.com>
To: ravikant <ravikant at sarai.net>
ये पहला लेख/समीक्षा आपको भेज रहा हूँ.
पढकर राय दीजिये और दीवान पर डाल दीजिये ठीक लगे तो. मुझे अभी तक दीवान पर
पोस्टिंग करना ठीक से समझ नहीं आया है.
राखी पर जयपुर से...
...मिहिर
.................................................
चक दे इण्डिया : हुँकारा आज भर ले...
ये एक अजीब सी तुलना है. पिछले सप्ताह मैनें अमिताभ को
"सी.एन.एन. आई.बी.एन." पर बोलते सुना. स्वत्नंत्रता दिवस के दिन अमिताभ अपनी
पसन्दीदा फिल्मों के बारे में बात कर रहे थे. अम्रर अकबर एन्थोनी की बात आने पर
उन्होनें कहा कि हम सभी को लगता था कि इतना अतार्किक विचार कैसे चलेगा? संयोगों
और अतार्किकताओं से भरी ये कहानी सिर्फ मनमोहन देसाई के दिमाग का फितूर है. आज
भी हम उस फिल्म के पहले दृश्य को देखकर हंसते हैं. एक नली से तीनों भाइयों का
खून सीधा माँ को चढता हुआ दिखाया जाना एक मेडीकल जोक है. लेकिन इन सबके बावजूद
कुछ है जिसने देखने वाले से सीधा नाता जोड लिया. सारी अतार्किकतायें पीछे छूट
गयीं और कहानी अपना काम कर गयी. अब आप क्या कहेंगे इसे... मैं इसे एक फिल्मी
नाम देता हूँ… दिल का रिश्ता. पिछले ह्फ्ते शिमित अमीन की फिल्म चक दे इण्डिया
देखते हुए भी मुझे ऐसा ही एहसास हुआ. वैसे फिल्म के कई प्रसंग तो बहुत ही पकाऊ
थे जैसे कबीर खान के घर छोडने का प्रसंग जहाँ पडोस में रहने वाला बच्चा अपने
पिता से कह्ता है, "पापा मैनूं भी गद्दार देख्नना है". इस जगह भारी मेलोड्रामा
दिखाई देता है. या वो सारी बोर्ड मीटिंग्स जहाँ चेयरमैन बार-बार ये ही दोहराता
है, "ये चकला-बेलन चलाने वाली भारतीय नारियाँ हैं". क्या ये भी स्टिरियोटाइप
किरदार नहीं हैं? लेकिन इनके बावजूद मुझे फिल्म पसन्द आयी और इसका कारण वो ही
दिल का रिश्ता है. ये एक सच्चे दिल से बनाई गई फिल्म है जो नज़र आ ही जाता है.
…..
सबसे पहले सबसे खास बात... याद कीजिये कि मुख्यधारा के सिनेमा
में आखिरी बार आपने कब एक मुस्लिम को नायक के रूप में देखा था? आसानी से याद
नहीं आयेगा ये तय है. हमारे दौर के सबसे बडे नायक शाहरुख ने भी हमेशा राज या
राहुल या वीर प्रताप सिंह या मोहन भार्गव जैसी भूमिकाएँ ही निभाई हैं. हाँ,
हे राम का अमज़द एक अपवाद कहा जा सकता है. शायद जयदीप के लिये सबसे मुश्किल ये ही
रहा हो की यशराज को एक ऐसी कहानी के लिये कैसे मनाया जाये जिसके नायक का नाम
कबीर खान है. यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्य है जिसे गौर से देखा जाना चाहिये.
आज SRK ऐसा रोल कर सकता है, क्या ये पहले सम्भव था या हो सकता था? पुराने
धुरंधर याद कर पायेंगे कि अमिताभ ने अपनी बादशाहत के दौर में मुस्लिम नायक की
भूमिकाएँ भी निभाई हैं लेकिन शाहरुख के खाते में ये तथ्य नहीं है. यह समय का
परिवर्तन है. मित्रों का तो यहाँ तक कहना है कि गदर जैसी दुर्घटना नब्बे के दशक
में ही सम्भव थी. मनमोहन सिंह और लालकृष्ण आडवाणी ने इस दशक की शुरूआत में जो
किया यह उसी का असर है. इसलिये चक दे अभी भी एक अपवाद ही कही जाएगी, मुख्यधारा
नहीं. लेकिन ये एक खूबसूरत अपवाद है.
…..
चक दे एक खेल आधारित फिल्म का मूल नियम ध्यान रखती है और वो है
कमज़ोर की विजय. भारत द्वारा निर्मित सबसे चर्चित खेल फिल्म लगान की तरह चक दे
भी कमज़ोरों के विजेता बनकर निकलने की कहानी है. यहाँ आपको सारे भेदभाव दिख
जायेंगें जैसे जेन्डर, इलाका, खेल के आपसी भेदभाव और इनके खिलाफ लडाई साथ-साथ
जारी है. टॉम एण्ड जेरी की लडाई में जीत हमेशा टॉम की ही होती है और यही
नियम हमारी फिल्मों पर भी लागू होता है. सच यही है कि आम दर्शक ज़िन्दगी की लडाई
हारे हुये किरदार से ही रिलेट करता है. वहीं उसे अपना अक्स दिखाई देता है. …..
हॉकी की भारत में क्या जगह थी इसे दिखाने के लिये बहुत सुन्दर
प्रतीक चुना गया है. देश की राजधानी के हृदयस्थल को निहारती मेजर ध्यानचन्द की
मूरत उस केन्द्रीय स्थान की गवाही देती है जो आजाद भारत में हॉकी ने पाया था.
मेजर ध्यानचन्द हॉकी स्टेडियम जैसे लुटियंस की बनाई दिल्ली को निहार रहा है.
इंडिया गेट के मध्य भाग से देखने पर ठीक सामने राष्ट्रपति भवन दिखाई देता है.
अगर आप सुनील खिलनानी की आइडिया ऑफ इंडिया का शहर और सपना अध्याय पढें तो
मालूम होगा कि इस नक्शे को बनाने में क्या सत्ता संरचना काम कर रही थी. क्यों
वायसराय के घर के लिये उन्नयन कोण सबसे ऊँचा रखा गया था. यहाँ ध्यानचंद का होना
एक कमाल के प्रतीक की खोज है. और इसका श्रेय भी मैं जयदीप साहनी को दूंगा
जिन्होंनें एकबार फिर साबित कर दिया है की नये बनते शहर की बुनावट और उसकी
सत्ता संरचना को उनसे अच्छा समझने वाला हिन्दी सिनेमा में और कोई नहीं है.
खोसला का घोसला के बाद चक दे एक और उपलब्धि है जयदीप के लिये. …..
और वो सोलह लडकियाँ... सोलह अलग-अलग नाम, सोलह अलग-अलग किरदार,
सोलह अलग-अलग पहचान. हर एक ऊर्जा की खान. जैसे उबलता लावा. वैसे कोमल चौटाला को
सबसे ज्यादा पसंद किया गया है और खुद ममता खरब ने कहा है कि कोमल मे मेरी छवि
है लेकिन काम के मामले में मेरी पसंद शिल्पा शर्मा रही. आपने उसे खामोश पानी
में देखा होगा और हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी में नहीं देखा होगा. लेकिन आप बिन्दिया
नायक को नहीं भूल सकते. अगर ये उनका फिल्म जगत में आगमन माना जाये तो ये एक
धमाकेदार आगमन है. वो आयी… वो छायी टाइप! लेकिन आखिर में श्रेय तो जयदीप को ही
जाएगा जिन्होंनें इतने तीखे, तेज़्-तर्रार किरदार रचे. …..
शाहरुख के लिये ये फिल्म स्वदेस वाले खाते में जाती है जहाँ उसने
अपना किंग खान वाला स्टाइल छोडकर काम किया है. स्वदेस हालाँकि ज्यादा परतदार
फिल्म थी लेकिन चक दे भी उसी खाते में है. स्तर भले कम हो लेकिन खाना वही है.
शाहरुख को चाहनेवालों के लिये ये एक नया रूप तो है ही. (हाँ मेरी पसंद अभी भी
कभी हाँ, कभी ना को ही शाहरुख का सर्वश्रेष्ठ काम मानती है. ना स्वदेस को और ना
चक दे को). ये फिल्म तो बस उम्मीद है कि हिन्दुस्तानी फिल्मों की मुख्यधारा
किसी नये प्रयोगशील रास्ते पर आगे बढ रही है...
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