[दीवान]हम दर्शक दो कौडी के
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Sun Dec 2 20:48:05 IST 2007
हमारे एक कवि लिख गए कि-
*जहां लिखा है प्यार*
*वहां लिख दो सड़क*
*फर्क नहीं पड़ता है*
*हमारे देश का मुहावरा है*
*फर्क नहीं पड़ता है...*
कवि ने ये बात देश की स्थिति और मानसिकता को लेकर कही है, लेकिन हम इसे मीडिया
के लिए भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
कल जी स्पोर्ट्स ने दर्शकों को खूब मामू बनाया। बंदे गए थे आइसीएल का मैच देखने
और वहां करीब बीस मिनट करीना का नाच दिखा दिया। माने, आए थे हरिभजन को ओटन लगे
कपास। ये तो शुक्र मनाइए कि पब्लिक को मजा आया क्योंकि नाच हुआ था, अब कल को
मैच के बीच में बापूजी का प्रवचन घुसेड दे कि भारत और पाकिस्तान के बीच हो रहे
मैच को देखने के लिए कैसे संयम बरता जाए तो जनता बिदक सकती है और टिकट के पैसे
भी मांग सकती है। एकदम नयी बात कर दी जी स्पोर्ट्स ने। और उसका नतीजा देखिए-
स्टार प्लस ने स्कोर को पट्टी पर चलाया और क्रिकेटर के शॉट्स की जगह करीना का
मौजा-मौजा दिखाता रहा। और स्लग चलाया- मसालेदार क्रिकेट। क्रिकेट में सिने का
पोलिएशन हो गया।
आज आप देखेंगे कि खबरों में पॉलिएशन का काम तेजी से हो रहा है। इंडिया 20-20
जीतती है तो शाहरुख के फोनो लिए जाते हैं, एक्सपर्ट कमेंट्स के तौर पर और फिर
मामला खिसककर उनके पर्सनल मैटर और बेटे पर आ जाता है। हम फूद्दू ऑडिएंस को पता
भी नहीं चल पाता कि कब क्रिकेट खिसककर बॉलीबुड पर चला गया। यही हाल बीसीसीआई के
मामले में होता है। बात होत-होते खेल की पॉलिटिक्स के पाले में चला जाती है।
विज्ञापनों में तो ये बात समझ में आती है कि जो लेडिस कभी कपड़े नहीं धोती वो
मिराज साबुन बेच रही है लेकिन ये काम अब खबरों में भी तेजी से शुरु हो गया है।
खबरें फ्री प्ले होकर घूमती है, अब आप इसे खेल की खबर समझे, राजनीति की या फिर
वॉलीवुड की ये सब आपकी समझ पर है। लेकिन इससे दो-तीन बाते बहुत साफ हो जाती है-
एक तो ऐसा होने से खबरों की विश्वसनीयता घटती है, अब हर जगह मनोरंजन बोलकर कुछ
भी नहीं पेला जा रहा है। चैनलवाले आप ऑडिएंस की आदत खराब कर रहे हैं। आप खतरनाक
काम कर रहे हैं।
एक स्तर पर आप हार चुके हैं,आप होम वर्क नहीं करना चाहते खबरों के उपर इसलिए
सबकुछ को सॉफ्ट स्टोरी के नाम पर चला देते हैं। ऐसा करने से ऑडिएंस का डिविएशन
होता है। उन चैनलों पर तो और भी हैरत होती है जिनके पास लाइसेंस तो है खबरिया
चैनल की लेकिन होड़ लगा रहे हैं मनोरंजन प्रधान चैनलों से। एक ही रट लगाए जाते
हैं कि जनता यही सब देखना चाहती है, तो भइया जनता तो ये भी देखना चाहती है
प्रकाश सिंह जैसे पत्रकारों का क्या हुआ, हमारे गांव में बिजली कब आएगी। है
माद्दा दिखाने की ये सब। यहां तो चुप मार जाओगे।
रोज दिखा रहे हो किलर बस का कहर। कभी रिसर्च किया ड्राइवरों की जिंदगी पर, क्या
है उनके जीने का हिसाब-किताब। तो ले-देकर वही क्रिकेट, क्राइम,सिनेमा और
सिलेब्रेटी है और उसी को दिनभर फेंटते रहो और हम फूद्दू जनता देश की बड़ी खबर
समझकर पचाते रहेंगे और फेंटने से जो झाग पैदा होगा उसे यूपीएससी के इंटरव्यू के
लिए बचाकर रखेंगे।
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