[दीवान]उदय प्रकाश
Ravikant
ravikant at sarai.net
Thu Dec 20 14:15:46 IST 2007
दोस्तो,
हिन्दी के मशहूर कहानीकार, कवि, लेखक और फ़िल्मकार को सराय में बुलाकर बातचीत करने की योजना
बन रही है. अगर सब कुछ ठीक रहा तो अगले साल 4 जनवरी को दोपहर के बाद तक़रीबन तीन बजे
हम मिलेंगे. औपचारिक घोषणा फिर होगी लेकिन अनौपचारिक तौर पर आपको इसलिए बता रहा हूँ,
कि उनका साहित्य एक-बार फिर पढ़ लें. यह संवेद और सराय-सीएसडीएस का संयुक्त आयोजन होगा, और
बातचीत संवेद में छपेगी. अपने सधे हुए सवाल तैयार रखें. सराय के लोगों ने उनकी शहर-केन्द्रित
कहानियाँ ग़ौर से पढ़ी हैं, तो उनके अपने तरह के सवाल होंगे, शायद किंचित ग़ैर-साहित्यिक
भी. इसलिए भी ज़रूरी है कि आप सब तशरीफ़ लाएँ.
उदय प्रकाश का अपना ब्लॉग तो है ही, दीवान पर पहले भी कड़ी भेजी जा चुकी है:
http://uday-prakash.blogspot.com/
यहाँ मैं मोहल्ला के हवाले से एक शुरुआत कर देता हूँ.
रविकान्त
हिंदी साहित्य की जे जे कॉलोनी
http://mohalla.blogspot.com/2007/12/blog-post_12.html
उदय प्रकाश का प्रार्थना, पीड़ा और शाप से भरा जीवन
जातियों का इतिहास आदमी की स्मृतियों के इतिहास की तरह पुराना लगता है। जातियों के
बनने की कहानी जो भी रही हो, हर समय में समाज के बेचैन हिस्सों ने एक नयी कहानी की चादर
जाति पर डाली है। कबीलाई अंदाज़ से बाहर आ चुकी इंसानी बस्तियों में अब जाति के खिलाफ़ भी कई
तरह के तर्क हैं और उन तर्कों के कई शास्त्र तक रच डाले गये हैं। आधुनिक समय में जाति की प्रासंगि
कता पर दिलीप मंडल ने जो बहस छेड़ी है, उसमें ब्लॉग समाज के कई बुद्धिवेत्ताओं ने अपनी-अपनी बा
त रखी। लेकिन क्योंकि ये समाज अभी अपनी सीमाओं से ही अठखेलियां कर रहा है और ज़्यादातर का
यस्थ महासभाओं की तरह मीट इत्यादि में बझा हुआ है, बेहतर है इस बहस को हिंदी की कुछ
मुख्यधारा वाली गली में टहलाने की कोशिश की जाए। हिंदी के शिखर कथाकार उदय प्रकाश की कवि
ता अयोध्या पर जब गिरिजेश ने टिप्पणी की, तो उदय प्रकाश की प्रतिटिप्पणी भी जाति से
जुड़ी एक विडंबना की कहानी सुनाती नज़र आयी। जाति पर चल रही बहस में ये
टिप्पणी-प्रतिटिप्पणी चूंकि छौंक का काम कर सकती है, इसलिए इसमें हम आप सबकी नज़्र कर रहे
हैं।
गिरिजेश said...
उदय जी, एक बार आपसे मुलाकात में आपकी किसी कहानी की तारीफ की थी तो आपने कहा
था- 'मैं मूलत: कवि हूं, मुझे कहानीकार मानना कुछ वैसा ही है कि कुम्हार कभी कपड़ा सिल दे और
उसे दर्ज़ी समझ लिया जाए।' मैं तो मूलत: आपकी कहानियों का मुरीद हूं, लेकिन आपकी कविताएं
पढ़कर फैसला नहीं कर पाता कि आप कुम्हार बड़े हैं या दर्ज़ी।
उदय प्रकाश said...
कुम्हार, दर्ज़ी, बढई, जुलाहा, मोची, लोहार, मेकेनिक (मिस्त्री), साफ़्ट्वेयर इन्जीनियर
वगैरह सब के सब अपने-अपने माध्यम के कारीगर ही है। आप मुझे हिन्दी भाषा का एक गैर-ब्राह्मण,
गैर-ठाकुर, गैर-कायस्थ, गैर-बनिया, गैर-दलित, गैर-मुसलमान कारीगर ही समझिए- यानी 'लेखक'।
साथ मे दिलीप मंडल द्वारा भेजा गया स्टिंग आपरेशन पढ लीजिए।
भाई, बहुत कठिन है किसी अग्यात-कुलशील कारीगर का 'देव-राजभाषा' हिन्दी का कवि,
कथाकार, अध्यापक, पत्रकार या मीडियाकर्मी होना। हमारे जैसे वर्णाश्रम बहिष्कृत लोग हिन्दी
साहित्य की जे जे कोलोनी के कुम्हार या दर्जी या कारीगर ही हैं। गरीब-गुरबे और हाशिये के लोग
ही यहा कपड़ा सिलाने आते है। जब एमएनसी तक जातिवाद के 'राजरोग' से नही बची, तो क्या
हिन्दी कविता, कहानी, अकादेमिकता, पत्रकारिता और विचारधाराएं इससे बची रह सकती थी।
असम्भव। यह सदियों पुरानी सच्चाई है। जो इस जातिवाद के खिलाफ़ बोलेगा, वह या तो
'जातिवादी' ठहरा दिया जाएगा या साम्प्रदायिक। ज़रा एक बार हिन्दी की कविता-कहानी ही
नही, सभी अनुशासनों, चैनलों, अख़बारों, संस्थानों, विभागों, लेखक संगठनों का स्टिंग आपरेशन कर के
देखिए... आप पाएंगे कि यहां हमारा कुछ भी होना कठिन है। इस देश और इस भाषा मे जन्म लिया
है, तो जीवन तो गुज़ारना ही है। प्रार्थना और पीड़ा और शाप से भरा जीवन
काश कभी इस देश की राजनीति और हमारी भाषा जातिवाद के इस कैन्सर से मुक्त हो! शुभकामना
एं!
Posted by avinash तारीख़ Wednesday, December 12, 2007
गली का नाम: कुछ हम कहें कुछ तुम, देश
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