[दीवान]शहनवाज भाई को शुक्रिया
Ravikant
ravikant at sarai.net
Wed Feb 14 18:45:03 IST 2007
शहनवाज़ साहब को शुक्रिया, गिरीन्द्र के लिए वैलेंटाइन डे पर दुष्यंत की मशहूर लाइनें:
तू किसी रेल सी गुज़रती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ.
रेल यहाँ सीधे तो नहीं, उपमान-रूप में मौजूद है. कुछ और भेजूँगा.
और आप तमाम लोगों के लिए ब्लैक फ़्राइडे की समीक्षाएँ:
http://www.mohalla.blogspot.com/
रविकान्त
बुधवार 14 फरवरी 2007 16:34 को, girindra nath ने लिखा था:
> शहनवाज भाई को शुक्रिया,
> आप लगातार हमें अच्छी शायरी से परिचय कराते रहते हैं, इस बार भी आपकी खोज
> अच्छी लगी. वैसे अरसे बाद आप दिवान पर नज़र आए.
> आप क्या कोई ऐसी शायरी से रू-ब-रू करा सकते हैं जो ट्रेन (रेल गाडी)से जुडी
> हो.. ? यदि आपके नज़रो से गुजरी हो तो हमें बतायें.
> गिरीन्द्र नाथ झा.
> www.anubhaw.blogspot.comn
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