[दीवान]कोंकणी कविता रीति-रिवाजों का किला तोड कर.....
girindra nath
girindranath at gmail.com
Tue Feb 20 15:28:17 IST 2007
कोंकणी कविता रीति-रिवाजों का किला तोड कर का यह हिन्दी अनुवाद
है.लक्षमणराव सरदेसाय की यह कविता समाज के ताने बाने को हमारे सामने
प्रकट करती है.
पढें.
आपका
गिरीन्द्र नाथ
www.anubhaw.blogspot.com
रीति-रिवाजों का किला तोड कर मुक्त हुआ
और सुख पाया
छोटी-बडी परंपराओं की
भयानाक भूतनियां
भिन्न भिन्न प्रकार से नाचती थीं
कोई मर गया रोने चलो
कोई पैदा हुआ हंसने चलो
किसी का ब्याह हुआ जल्दी जाकर काम का दिखवा करो
किसी के माथे पर काली मिर्च का लेप लगा
उठो, दौडो उसका हाल चाल पूछो
हमें रिवाज के मुताबिक कोट पहनना चाहिए
वैसी हीं धोती पहननी चहिए
पवित्र वस्त्र ओढ्ना चाहिए
नाते का कोई मर गया
कडा सूतक रखना होगा
सादा पत्र लिखना हो
सप्रेम नमस्कार विनती विशेष लिखना होगा
अगर मैं मंदिर गया तो गाल पीट कर माफी मांगनी होगी
दोस्तो के जन्मदिन पर तोहफे देने होंगे
घर मे कड्की है अमीर होने का दिखावा करना है
इश्वर मे आस्था नही पक्का भक्त होने दावा करना है
पत्नी के पास गले मे फूटी मणी भी नहीं
उसके लिए फूलो का आभूषण खरीदना होगा
कदम-कदम पर परंपराओ के नकाब ओढ्ने चाहिए
सच्चा मनुष्य दफन हो गया हो तो उसे खोद कर
निकालना चाहिए
ऊपरी दिखावा न करें तो समाज -बाहर होना चाहिए
जब मैं ने परंपराओ को छोडा
तभी मैं सुखी हुआ.
More information about the Deewan
mailing list