[दीवान]जाल में फँसे नाम, ......धँसे नाम,...... हँसे नाम :ब्लॉगों के नामों पर एक नजर
girindra nath
girindranath at gmail.com
Mon Feb 26 17:01:48 IST 2007
ब्लाग जगत में अपने स्थान को लेकर नामकरण की जो स्थिती है वह सचमुच काफी
रोचक है. हर कोई जो हिन्दी में ब्लागिंग कर रहे है, वे सब नाम को लेकर
काफी गंभीर है. दर असल टाईट्ल रखते वक्त ब्लागर के मन में एक सवाल रहता
है कि वह जो कुछ भी यहां रखेगा वह इसी टाईट्ल से ज़ुडा होगा. मुहल्ले की
बात हो या फिर उड्न तश्तरी की स्थिती ,ये सब तो नाम के पदचिन्हो पर ही
पोस्टीया रहे हैं.
इसी कारण मैं आपकी(Neelima Chauhan <neelimasayshi at gmail.com) इन बातों
से सहमत हूं कि --- "लगता है कि हिंदी के चिट्ठाकार नाम के महत्व
और महिमा के बड़े गहरे मुरीद हैं। इन चिट्ठाकारों के लिए इनके चिट्ठे का
नाम खालिस शब्द या संबोधन नहीं उनकी व उनके चिट्ठे की पहचान की
विशिष्टिता को उभारने वाला अहम तत्व है।"
नामकरण की दुनिया से शायद आप और भी रोचक बातें सामने लाऐंगी.
गिरीन्द्र नाथ झा.
On 2/24/07, Neelima Chauhan <neelimasayshi at gmail.com> wrote:
> 'ब्लॉगित हिंदी जाति का लिंकित मन : ब्लागों में हिंदी हाईपरटेक्स्ट का
> अध्ययन' विषय पर जारी शोध कार्य के अंतर्गत ब्लॉगों के नामों पर एक नजर
> ब्लॉग जगत में काफी कुछ हो रहा है लोग पोस्टिया रहे हैं और टिप्पिया रहे
> हैं। कुछ पोस्टों पर टिप्पिया रहे हैं तो कुछ टिप्पणियों पर पोस्टिया रहे हैं
> कई तो टिप्पणियों पर ही टिप्पिया रहे हैं ऐसे में मुझे तो रिसर्चियाना है और
> जाहिर है यह अलग किस्म का काम है। इसलिए सोचा कि आज रिसर्च पर पोस्टियाआ जाए।
> ....तो मैने ब्लॉग शोध के पहले चरण में ब्लॉगों की सूची बनाई और सूची देखते
> हुए लगा कि पहला परचा तो ब्लागों के नाम की प्रकृति पर विचार करते हुए ही लिखा
> जाए। लगता है कि हिंदी के चिट्ठाकार नाम के महत्व और महिमा के बड़े गहरे मुरीद
> हैं। इन चिट्ठाकारों के लिए इनके चिट्ठे का नाम खालिस शब्द या संबोधन नहीं
> उनकी व उनके चिट्ठे की पहचान की विशिष्टिता को उभारने वाला अहम तत्व है। हिंदी
> चिट्ठों के नामकरण संस्कार के वक्त वक्त इन चिट्ठाकारों को किस प्रसव पीड़ा
> से गुजरना पड़ा होगा इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। अपने चिट्ठे की
> सामग्री और अपनी लेखकीय क्षमताओं व दृष्टि पर विचार करते हुए एक आकर्षक, कौतुहल
> भरा, निराला-सा नाम ढूँढ कर निकाल लाना बड़ी मेहनत का काम रहा होगा इन
> चिट्ठाकारों के लिए।
>
> कुछ चिट्ठाकारों के चिट्ठे अपने लेखक के फुरसत के हल्के क्षणों , खामखां के
> वक्त बिताऊ चिंतन के महत्व को बताते हैं। यहॉं 'ये न थी हमारी किस्मत के
> दीदारे यार होता' वाले अंदाज में कुछ हल्की कुछ थोड़ी भारी बातों को पेश करने
> की बेतकल्लुफी नजर आती है। कहीं किसी ब्लॉग में मोहल्लेबाजी के बहाने
> दर्शनबाजी करता चिट्ठाकार विश्वग्राम की तरह विश्व को एक मोहल्ले के रूप में
> देखना चाहता है। 'कहना चाहने और कह न पाने' के द्वंद्व में फँसे लेखकीय
> व्यक्तित्व के दर्शन कराने वाले ब्लॉगों की अपनी अलग पहचान है। यहॉं लेखक की
> पीड़ा, द्वंद्व और सटीक अभिव्यक्ति न कर पाने की छटपटाहट दिखई पड़ती है।
> रचना में भावों और कल्पना की उड़ान का महत्व कुछ चिट्ठाकारों के लिए सबसे
> ज्यादा है। अपनी कल्पना रूपी उड़नतश्तरियों पर बैठकर अनंत ब्रह्मांडों पर
> पहुँचने और नए जीवनों से मिल आने की चाह है शायद वहॉं। भावना और यथार्थ की
> टकराहट में भाव की जीत कभी-कभी भाव-सिंधु की उठती गिरती लहरों में प्रकट होती
> है। दूसरी ओर यथार्थ से टकराने की अदम्य इच्छा और साहस का संगम कुछ चिट्ठों
> के नामों में है। मानों कह रहे हों 'आइए हाथ उठाएं हम भी' और सामाजिक विषमताओं
> का एकजुट होकर सामना करें। रोजमर्रा की जिंदगी के अन्याय, शोषण व
> साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ हमारी दैवीय भारतीय आत्माएं एक ही लोकमंच से
> युद्धरत हों। ऐसा मारक, प्रहारशील और तरकशवादी नामकरण अपने पाठक पर बहुत ही
> आह्वानकारी प्रभाव छोड़ता है।
> कुछ चिट्ठाकार अपने लेखन में छिपे अदनेपन, भदेसपन, जमीनीपन को उभारने के फेर
> में पड़े हैं। यहॉं वे सिद्ध करना चाहते हैं कि रचना महत्वपूर्ण है रचनाकार
> नहीं। आवारा बंजारा, बिहारी बाबू कहिन जैसे नाम जमीनी सच की मुखलफत करते दिखाई
> देते हैं। इससे ठीक उलट कई चिट्ठाकार देववाणी या प्रवचनात्मक शैली लिए हुए
> अपनी बात कहना पसंद करते हैं। पंडिताई (ई पंडित) मनसा वाचा कर्मणा (मानसी) वाली
> शैली या भविष्यवाणी (जोगिलिखी) में एक अलग ही अभिजातपना झलकता है।
> हिंदी-तकनीक-सृजन के त्रिकोण को संभाले साहित्य साधना पर अपना सबकुछ कुर्बान
> कर चुके रवि रतलामी का हिंदी ब्लॉग , मसिजीवी, शब्दशिल्प राजसमंद की हिंदी
> बेवसाईट के नाम निराले हैं। स्वनामधन्य ये चिट्ठे मानों कह रहे हों कि ' हम
> हिंदी, तकनीक और सृजन की शपथ लेकर ये संकल्प लेते हैं कि ......' (आप स्वंय
> जोड़ लें) कबीर ने सत्य को साक्षी मानकर साखियों की रचना की इससे प्रेरणा लेकर
> प्रत्यक्ष को साक्षी मानकर लगता है प्रत्यक्षा ने नामकरण किया है। वेसे कई
> रचनाकारों के नाम और उनके ब्लॉगों के नाम एक ही हैं मसलन मानसी, प्रत्यक्षा,
> शुएब प्रतीत होता है कि इन्हें अपनी पहचान पर कोई पट गवारा नहीं यहॉं व्यक्ति
> और रचना में सम भाव है।
> गालिबन यह सारी नामगाथा इस विचार से प्रेरित थी कि -'नाम में कुछ रखा है....'
> यदि इन चिट्ठाकारों ने अपने चिट्ठों के नाम यूँ ही आनन फानन में, खाम ख्याली
> में दे मारे थे तो मेरी इन अटकलों को बेतकल्लुफी की उपज मानकर क्षमा करें।
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