[दीवान]नज़ीर अकबराबादी - बचपन

Ravikant ravikant at sarai.net
Thu Jan 25 15:52:43 IST 2007


दोस्तो,

पिछले सालों का मेरा यह क़यास अब पुष्ट हो चला है कि नेट की साहित्यिक दुनिया में उस तरह का
धार्मिक भेदभाव कम मिलता है जिसके अकादमीय संदर्भों में हम आदी हो चले हैं. 
शायर और कवि का फ़र्क़ कुछ मिट-सा चला है, ज्ञान के विरसे की ख़ेमेबंदी करने वालों को लिए बुरी 
ख़बर है कि विकी शैली में बनी हिन्दी कवियों की सूची में मीर, ग़ालिब घुसे चले आ रहे हैं, 
नज़ीर भी शामिल हो रहे हैं. बहरहाल, पेश है, चंदन जी को सधन्यवाद, वहीं से नज़ीर की एक 
प्यारी-सी कविता. 

दीगर कवियों का काव्य भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है. मज़े लें:

http://hi.literature.wikia.com/wiki/


रविकान्त



नज़ीर अकबराबादी / बचपन

क्या दिन थे यारो वह भी थे जबकि भोले भाले ।

निकले थी दाईं लेकर फिरते कभी ददा ले ।।                         

चोटी कोई रखा ले बद्धी कोई पिन्हा ले ।                             

हँसली गले में डाले मिन्नत कोई बढ़ा ले ।।                                    

मोटें हों या कि दुबले, गोरे हों या कि काले ।                                    

क्या ऐश लूटते हैं मासूम भोले भाले ।।1।।

                             

दिल में किसी के हरगिज़ ने शर्म ने हया है ।
                             
आगा भी खुल रहा है, पीछा भी खुल रहा है ।।
                             
पहनें फिरे तो क्या है, नंगे फिरे तो क्या है ।
                            
यां यूं भी वाह वा है और वूं भी वाह वा है ।।
                                     
कुछ खाले इस तरह से कुछ उस तरह से खाले ।
                                   
क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।2।।

                            
 मर जावे कोई तो भी कुछ उनका ग़म न करना ।

 ने जाने कुछ बिगड़ना, ने जाने कुछ संवरना ।।
                             
उनकी बला से घर में हो क़ैद या कि घिरना ।                           
 
 जिस बात पर यह मचले फिर वो ही कर गुज़रना।।
                                    
 माँ ओढ़नी को, बाबा पगड़ी को बेच डाले ।
                                   
 क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।3।।

                             
कोई चीज़ देवे नित हाथ ओटते हैं ।
                             
गुड़, बेर, मूली, गाजर, ले मुंह में घोटते हैं ।।
                            
बाबा की मूंछ माँ की चोटी खसोटते हैं ।
                            
 गर्दों में अट रहे हैं, ख़ाकों में लोटते हैं ।।
                                     
कुछ मिल गया सो पी लें, कुछ बन गया सो खालें ।
                                    
 क्या ऐश लूटते हैं मासूम भोले भाले ।।4।।

                            
जो उनको दो सो खालें, फीका हो या सलोना ।
                            
हैं बादशाह से बेहतर जब मिल गया खिलौना ।।
                            
जिस जा पे नींद आई फिर वां ही उनको सोना ।
                            
परवा न कुछ पलंग की ने चाहिए बिछौना ।।
                                     
भोंपू कोई बजा ले, फिरकी कोई फिरा ले ।
                                     
क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।5।।

                            
ये बालेपन का यारो, आलम अजब बना है ।
                            
यह उम्र वो है इसमें जो है सो बादशाह है।।
                             
और सच अगर ये पूछो तो बादशाह भी क्या है।
                             
अब तो ‘‘नज़ीर’’ मेरी सबको यही दुआ है ।
                                     
जीते रहें सभी के आसो-मुराद वाले ।
                                    
क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।6।।


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