[दीवान] gulzar ki ek kavita
Ravikant
ravikant at sarai.net
Sat Jul 7 12:21:26 IST 2007
गिरीन्द्र और ब्रजेश के लिए,
इसलिए कि गिरीन्द्र अपने गाँव को ज़िन्दा रखे हुए हैं, और ब्रजेश बीच-बीच में गुलज़ार छोड़ते हैं. वैसे
गुलज़ार वाला लेख मैंने कहीं पढ़ा है, याद नहीं आ रहा है, अंग्रेज़ी के फ़िल्मफ़ेयर में या कहाँ,
कृपया स्रोत का ज़िक्र अवश्य करें. नीचे की कविता एक पुरानी साइट
http://www.kaavyaalaya.org/ से है. कुछ अच्छी कविताएँ हैं यहाँ.
रविकान्त
ईंधन
छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी
हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे
आँख लगाकर - कान बनाकर
नाक सजाकर -
पगड़ी वाला, टोपी वाला
मेरा उपला -
तेरा उपला -
अपने-अपने जाने-पहचाने नामों से
उपले थापा करते थे
हँसता-खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर
गोबर के उपलों पे खेला करता था
रात को आँगन में जब चूल्हा जलता था
हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे
किस उपले की बारी आयी
किसका उपला राख हुआ
वो पंडित था -
इक मुन्ना था -
इक दशरथ था -
बरसों बाद - मैं
श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ
आज की रात इस वक्त के जलते चूल्हे में
इक दोस्त का उपला और गया!
- गुलज़ार
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