[दीवान]आत्मीयता के इर्द-गिर्द अयोध्या
Ravikant
ravikant at sarai.net
Tue Jul 10 12:28:06 IST 2007
नीचे वर्तमान सत्र के शोधार्थी यतीन्द्र मिश्र की पोस्टिंग है, जिसे चंदन जी ने मामूली डाक से
प्राप्त कर टंकित किया है. यतीन्द्र की योजना है कि वे शोधकार्य को पुस्तकाकार में छापेंगे. दीवान
के पाठकों की टिप्पणियाँ आमंत्रित हैं, इस उम्मीद के साथ भी कि यतीन्द्र के अयोध्या में तब तक
ब्रॉडबैंड आ जाएगा, और वे ख़ुद अपनी पोस्टिंग कर पाएँगे.
रविकान्त
सराय-सीएसडीएस स्वतंत्र शोधवृत्ति 2006-07
(शहरी जीवन के अनतर्गत ‘अयोध्या’ पर अध्ययन के लिए पिछले तीन महीनों, अप्रैल-जून की रिपोर्ट)
यतीन्द्र मिश्र
आत्मीयता के इर्द-गिर्द अयोध्या
पिछले तीन महीनों में (अप्रैल-जून, 2007) अयोध्या के आम जीवन, समाज और संस्कृति का आन्तरिक व
आत्मीय अध्ययन करने पर एक बात जो सबसे प्रमुखता से सामने आती है, वह यह है कि यह शहर अपना
विशद धार्मिक रखने के बावजूद मिथक और इतिहास की सन्धि पर खड़ा नज़र आता है। कालिदास की
उज्जयिनी, बुद्ध की कपिलवस्तु, वासवदत्ता की मथुरा और अशोक के पाटलिपुत्र की तरह मिथकीय
सन्दर्भों में राजा मनु द्वारा निर्मित और विक्रमादित्य द्वारा दूसरी बार बसाया गया यह शहर
इतिहास और वर्तमान, परम्परा और फंतासी, आमजन और श्रद्धालुओं के बीच ढ़ेरों सवालों से रूबरू होने
का दिलचस्प मौका मुहैया कराता है।
यह एक ऐसा शहर है, जिसे हम छीज रही परम्पराओं को किसी हद तक, थोड़ा बहुत बचा लेने के श्रम में
लगे प्रतीक नगर के रूप में पढ़ सकते हैं। उस निहायत गैर पारम्परिक और आधुनिक शहर के उदाहरण के
तौर पर, हमारे यहाँ भारत में जिस तरह मगध, वाराणसी, कौशाम्बी, पाटलिपुत्र, उज्जैन, गुण्टूर,
मदुरै और श्रीरंगपट्टम या विदेशों में प्राहा, रोम, बगदाद, लन्दन, प्राग और पेरिस को देखने, पढ़ने
और समझने का जतन किया जाता रहा है।
इस शोध-वृत्ति के दौरान, अयोध्या को बहुत करीब से देखने के प्रयास में, ढ़ेरों स्थानों, मठ-मन्दिरों,
हवेलियों और ड्योढ़ियों, विभिन्न रियासतों द्वारा बनवाये गए सरायों-मन्दिरों एवं व्यक्तियों व
मुर्धन्यों से पिछले तीन महीने में मिलना और जानना सम्भव हुआ है। इस परियोजना के विस्तार को
समझने के लिए, इनमें से कुछ का नामोल्लेख करना यहाँ प्रासंगिक है। एक संक्षिप्त सूची क्रमवार अंकित
है-
(1) रामानुज सम्प्रदाय (श्री वैष्णव) के प्रमुख स्थानः
यज्ञवेदी, विजय राघव मन्दिर, अशर्फी भवन, उत्तर तोताद्रिमठ, बैकुण्ठ मण्डप,
दर्भशयन भगवान का
दिव्य देश, बैकुण्ठनाथ मन्दिर, कौशलेश सदन, नेपाली मन्दिर एवं दन्तधावन कुण्ड का मन्दि
र।
(2) रामानन्द सम्प्रदाय के प्रमुख स्थानः
श्रीराम गुलेला, बड़ा स्थान अथवा बड़ी जगह, रत्न सिंहासन, श्री मणिरामदास जी की
छावनी एवं
हनुमानगढ़ी, बड़ी छावनी, तपस्वी जी की छावनी।
(3) अन्य प्राचीन एवं प्रमुख स्थानः
उदासीन आश्रम रानोपाली, श्रावणकुंज, त्रेता के ठाकुर, विदेहजा दूल्हा निकुंज,
मत्तगजेन्दर, शेषावतार
मन्दिर, सहस्त्रधारा, गोप्रतार घाट।
(4) कुछ विशिष्ट स्थानः
गोलाघाट के बाग में मुस्लिम फकीर शाह कलन्दर की गुफा, अनन्य राम भक्त मुस्लिम साधि
का बड़ी
बुआ की दरगाह, बाल विधवाओं और सन्यासिनों का राम घाट स्थित आश्रय, सिया सुहाग बा
ग जो प्रचलित
अर्थों में माईबाड़ा कहलाता है, प्रख्यात पखावजी स्वामी रामशंकर दास ‘पागलदास’ का
घर ‘जय मृदंग’, प्रमुख
सन्त बाबा राममंगल दास का स्थान गोकुल भवन एवं महर्षि अरविन्द का आश्रम श्री अरवि
न्द साधनालय आदि।
कुल दुर्लभ, दिलचस्प, इतिहासपरक और महत्त्वपूर्ण तथ्य भी इस काम को करने के क्रम में हाथ आये हैं,
उनमें से कुछ का उल्लेख नीचे दिया जा रहा है, यह बताने के लिए कि अयोध्या किस तरह अपनी
संस्कृति को रचती रही है, किस तरह उसने अपनी स्वायत्तता अर्जित की है और किन अर्थों में वह वा
ल्मीकि, महाकवि कालिदास, तुलसीदास, स्वामी युगलानन्यशरण, बनादास, शाहकलन्दर और पागलदास
जैसे दिग्गज साधकों, कवियों सूफ़ियों और कलाकारों की प्रतिभा की साक्षी रही है।
(1)ज़्यादातर मठ-मन्दिरों में रसिक भक्ति की परम्परा रही है, जो कृष्ण की मधुरोपासना के प्रमुख
केन्द्रों (मथुरा, वृन्दावन एवं द्वारिका) एवं दक्षिण में श्रृंगार भक्ति के प्रमुख केन्दों (वृहदीश्वर शि
व मन्दिर, तन्जौर मन्दिर, मीनाक्षी मन्दिर एवं चेन्नई के कापालीश्वर शिव मन्दिर) से मिलती
जुलती है।
(2)राम की आदि नगरी की मान्यता के बावजूद ज़्यादातर मठ-मन्दिरों में सीता की पूजा और उनकी
अनन्यता का
इतिहास मौजूद है। सीता की अष्टसखियों द्वारा अपने राम के श्रृंगार की मिथकीय कथाएँ प्रचलित हैं।
लक्ष्मण किला में सीता की मूर्ति स्थापना के लिए उन्हें वधू रूप में सौ वर्ष पूर्व डोली में बिठाकर
मिथिला से गरिमापूर्ण ढंग से लाया गया है, जिस तरह आज भी कोई बहू अपना पीहर छोड़कर ससुराल
अपने पति के घर रहने आती है। कनक भवन, विअहुति भवन, लक्ष्मणकिला एवं जानकीघाट के मन्दिर इस
परम्परा के सबसे सशक्त उदाहरण हैं।
(3)हज़ार वर्ष पूर्व की मान्यता में स्थापित श्रावण कुंज मन्दिर में इस बात का प्रणाण मिलता है कि
यहाँ रामचरित मानस के बालकाण्ड की सबसे प्राचीन हस्तलिखित पाण्डुलिपि मौजूद थी, जो पिछले
तीस वर्ष पूर्व चोरी हो गयी। यह कृति सम्वत् 1661 की लिखी है तथा इसका उल्लेख गीता प्रेस
द्वारा छपे रामचरितमानस के लगभग सारे संस्करणों में सबसे प्राचीनतम पाण्डुलिपि के रूप में होता
रहा है। इससे सम्बन्धित सारे तथ्यों, मुकदमों और तत्कालीन अयोध्या समाज द्वारा की गयी
प्रतिक्रियाओं का वर्णन शोध-वृत्ति की समाप्ति पर पुस्तक में दिया जाएगा।
(4)लक्ष्मणकिला में एक कक्ष चिन्हित हुआ है, जहाँ स्वामी विवेकानन्द पधारे थे और उन्होंने कुछ दिनों
तक सत्संग किया था। इसी तरह सरयूबाग स्थित संस्कृत पाठशाला में दयानन्द सरस्वती कई बार आए थे
एवं विक्रमादित्यकालीन प्राचीनतम मन्दिर श्री कालेराम मन्दिर में उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत
के सशक्त हस्ताक्षर पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जी ने कई बार विभिन्न उत्सवों पर शास्त्रीय गायन
किया था।
(5)अयोध्या और उसके आस-पास के क्षेत्रों में कई स्थल ऐसे हैं, जो समन्वय की मिसाल प्रस्तुत करते हैं।
इनमें प्रमुख रूप से जियनपुर स्थित कबीर मठ. फैजाबाद बाईपास के पास साईंदाता सम्प्रदाय का
आश्रम एवं भरत की कर्मस्थली नन्दीग्राम प्रमुख हैं।
(6)लगभग सौ वर्ष पूर्व (सम्वत् 1959 विक्रमी में) अयोध्या के प्राचीनतम स्थलों को रेखांकित करने के
लिए तत्कालीन न्यायाधीश एडवर्ड, बड़ा स्थान के महान्त स्वर्गीय श्री राममनोहर प्रसादाचार्य
एवं तत्कालीन अयोध्या नरेश प्रताप नारायण सिंह ‘ददुआ महाराज’ के नेतृत्व में एक कमेटी गठित हुई
थी, जिसने उस वक्त प्राचीन एवं पौराणिक 148 स्थानों की सूची तैयार की थी और उसे उन स्थानों
पर पत्थरों में अंकित करके लगवा दिया था। यह सभा ‘अयोध्या तीर्थ विवेचनी सभा’ कहलाती है।
पूरी सूची इस शोधवृत्ति के दौरान ढूँढ़ ली गई है, जिसमें से अधिकांश स्थान आज लगभग लुप्तप्राय हो
गए हैं, साथ ही उनमें से अधिकांश स्थानों को इंगित करने वाले पत्थरकी अयोध्या और उसके आस-पास के
क्षेत्रों में नहीं रहे। मगर ऐतिहासिक कालक्रम की अवधारणा के फलस्वरूप यह सूची अपने पूरे
विस्तृत ब्यौरे के साथ पुस्तक में इस कारण दे दी जाएगी कि हम जान सकें पौराणिकता के
मानक पर अयोध्या का अस्तित्व आज किताना बदल चुका है।
(7)अयोध्या के मठ-मन्दिरों, विभिन्न रियासतों के आश्रित स्थानों एवं साधुओं की तपस्थलियों में संगीत
की परम्परा ढूँढ़ने पर एक दुर्लभ तथ्य सामने आया है कि यहाँ पूजन के दौरान नृत्य की जो व्यवस्था
थी, उसमें ‘खड़ी महफिल’ लगभग सभी जगहों पर आयोजित होती थी। भारतीय शास्त्रीय
नृत्य के क्षेत्र में आज ‘खड़ी’ एवं ‘बैठकी’ महफिल का ऐतिहासिक महत्त्व माना जाता है। इसी
तरह ‘रामधुन’ की परम्परा यहाँ अति प्राचीन है, जिसे यहाँ के अधिकांश बुर्जुग साधु-सन्तों ने यह
कहकर परिभाषित किया है कि ‘रामधुन लय में भक्ति का शोर है।’
(8)जानकी घाट के संस्थापक श्री करुणासिन्धु जी ने रामचरितमानस की हिन्दी में पहला टीका लिखी
थी।
(9)रामघाट स्थित बाल विधवाओं एवं सन्यासिनों के आश्रम स्थल सिया सुहाग बाग, जो माईबाड़ा भी
कहलाता है, वहाँ जाने पर पता लगता है कि यह स्त्रियाँ किस तरह अपना निर्वासित जीवन जी
रही हैं। उनमें से कुछ साध्वियाँ इतनी छोटी हैं कि प्रारम्भिक पाठशाला में पढ़ती हैं। एक लड़की शा
रदादासी, जिसका घर का नाम शुचिता है इण्टर में पढ़ती है। यदि हम थोड़ी देर के लिए दीपा
मेहता की फ़िल्म ‘वाटर’ के कुछ अंशों को सजीव रूप से प्रत्यक्षतः देखना चाहें, तो हमें माईबाड़ा
आना ही पड़ेगा।
(10)संगीत की परम्परा में एक अद्भुत बात यह भी पता लगी है कि विभिन्न रियासतों के मन्दिरों में
बाहर से भी गायकों की टोली आती थी, कुछ नर्तकियाँ इन अवसरों पर वहाँ देखी जा सकती थीं और
सखी सम्प्रदाय के मन्दिरों में विशेष उत्सव होते थे। कुछ प्राचीन साक्ष्य इस बात के भी मिले हैं कि
पूर्णतया कृष्ण को अर्पित हवेली संगीत का माहौल कुछ स्थानों पर अयोध्या में भी रहा है तथा रेहुआ
रियासत के मन्दिर में तो स्वयं उनकी महारानी ही नृत्य करती थीं। उन्होंने अपने जीवन के 75 वर्षों
तक मन्दिर में नृत्य सेवा अर्पित करते हुए गुजारे थे। एक दुर्लभ तथ्य यह भी है कि मुगल दरबारों का
प्रमुख गायन मुबारकबादी यहाँ कनक भवन और अमावाँ राज के मन्दिर में प्रचलित था।
(11)मन्दिरों से उपजी हुई कथिकों की परम्परा एवं मानस गायन यहाँ की विशेषता रहे हैं। बलदेव कथि
क, कल्लू कथिक एवं ओंकार कथिक की इस परम्परा को आगे बढ़ाने की चर्चा से यह बात स्पष्ट
होगी कि किस तरह छोटे-छोटे धार्मिक शहरों ने कला की दुनिया पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है।
साथ ही दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से आज बिल्कुल विलुप्त हो गयी रामलीला की प्राचीन परम्परा पर भी
प्रकाश डाला जाएगा।
(12)स्थानीय विधायक श्री लल्लू सिंह से बातचीत के आधार पर इस बात की पड़ताल करना
आसान होगा कि रामजन्मभूमि एवं बाबरी मस्ज़िद प्रकरण में क्यों विश्व हिन्दू परिषद और उनके अनुषंग
संस्थान अयोध्या को प्रभावित नहीं कर पाए हैं।
(13) सामान्य जनता, विशिष्ट लोगों, कलाकारों एवं मन्दिर अर्चकों से व्यापक बातचीत के दौरान
उन ढ़ेरों लोगों की भूमिका का भी संक्षिप्त विश्लेषण पुस्तक में स्थआन पाएगा, जो इस बात की नुमा
इन्दगी करेगा कि अयोध्या ने साहित्य, कला, संस्कृति, अध्यात्म और मत सम्प्रदाय के नाम पर कितने
महापुरुषों को पैदा किया है।
(14)कुछ बेहद चौंकाने वाले और तथ्यपूर्ण संवाद हमें हासिल हुए हैं, जो अयोध्या का वर्तमान चेहरा
प्रतिबिम्बित करते हैं। जैसे कि पूर्व में दिवंगत हुए प्रमुख सन्त साधक स्वामी राममंगल दास जी का
यह कथन कि ‘साठ हज़ार लोगों में साठ साधु भी नहीं हैं।’ या सुग्रीव किला के प्रवर्तक श्री पुरुषो
त्माचार्य जी का यह कथन ‘यहाँ के साधुओं में लंगोटी पहनने की परम्परा ही जब ख़त्म हो गयी है,
तब वह पवित्रता कहाँ से आएगी?’ और माईबाड़ा की देख-रेख करने वाली रामजानकी दासी का यह
कहना ‘हमने सिर पर कभी केश नहीं रखा, मगर नये जमाने की ये दासियाँ बड़ी मॉडर्न हैं, यह बाल
नहीं कटाना चाहतीं। उन्हें अभी भी अपने रूप का आकर्षण है। ऐसे में राम कहाँ से मिलेगा?’
(15)इसी तरह के सैकड़ों ऐसे तथ्य, इतिहासपरक सामग्री और आध्यात्मिक कथाएँ अयोध्या अध्ययन के दौ
रान प्राप्त हुई हैं, जिनकी प्रासंगिकता और महत्ता के आधार पर उल्लेख किया जाएगा। आगामी जुला
ई माह के अन्त तक का समय अन्य स्थलों पर भ्रमण, लोगों से बातचीत, एवं साक्ष्य आदि जुटाने में
व्यतीत होंगे। इसके उपरान्त दो माह का समय (अगस्त-सितम्बर 2007) पुस्तक को लिखने में इस्तेमाल
करने की योजना है। अन्त में, अक्टूबर माह में यह कोशिश रहेगी कि पूरी पुस्तक संयोजित करके सराय
संस्था को समुचित साक्ष्यों, प्रमाणों एवं किंवदन्तियों के लेखा-जोखा के साथ सौंप दी जाए।
धन्यवाद सहित।
(यतीन्द्र मिश्र)
दिनांकः 05.07.2007
राजसदन, अयोध्या
मो. 9415047710
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