[दीवान]बाज़ार भाव रिपोर्टिंग: चौथी पोस्ट

Ravikant ravikant at sarai.net
Wed Jul 11 16:53:22 IST 2007


 आलोक पुराणिक की  चौथी पोस्ट-

1958-1967 की अवधि उर्फ युद्धों के मारे बाजार

1958-1967 की अवधि में भारत ने दो युद्धों  का सामना किया, 1962 में चीन के साथ
और 1965 में पाकिस्तान के साथ। इस अवधि की बाजार रिपोर्टिंग में इन युद्धों की
छाप साफ दिखायी देती है। सामान्य बाजार रिपोर्टिंग के साथ-साथ युद्ध के असर को
भी बाजार रिपोर्टिंग ने इंगित किया।

      दृढ़ धातुएं और लोहेतर.........

      धातुएं दृढ़ होती थीं और मेवा और लोहेतर धातुओं में तेजी के दौर देखे
जाते थे। शेयर बाजार सुधरकर भी नरम होता था और सराफे में अन्त तक नरमी होती थी।
देखें -

  हिन्दुस्तान , सोमवार ता. 22 दिसम्बर, 1958, पेज नंबर 7

      दो कालम की रिपोर्ट

दिल्ली बाजार,

कपास वायदे में तेजी, सरसों तथा तेलों के भाव नीचे

मांग अधिक होने से मेवाओं के भाव बढ़े-धातुएं दृढ़

(हमारे व्यापार संवाददाता द्वारा)

दिल्ली 21 दिसम्बर। आलोच्य सप्ताह में अधिकांश स्थानीय मंडियों जैसे गल्ला,
तिलहन और चीनी में मिलाजुला रुख रहा, लेकिन तेल मूंगफली, सरसों, वायदों तथा तेल
में मुलायमी की धारणा थी। जिन्स  वायदों में गुड़ वायदों में अनियमित घटाबढ़ी
चली, जबकि कपास वायदे के भाव एक नए उच्च स्तर पर पहुंच गए।

अन्य बाजारों में मेवा तथा लोहेतर धातुओं में तेजी का दौर था, जबकि शेयर बाजार
में बाद में सुधार के बावजूद नरमी थी। सराफे में अन्त तक नरमी रही।

कारोबार प्राय सभी मंडियों में कम हुआ।

गल्ले दड़ा गेहूं की सप्लाई अच्छी थी। उठाव कम होने से उसमें थोड़ी मुलायमी थी।
फार्म गेहूं की आमद के अनुसार खपत होने से उसके भाव स्थिर थे, मगर शनिवार
कोभाव 50 नए पैसे
प्रति मन बढ़ कर रु. 20 प्रति मन हो गए। गरडा चने का स्टाक अच्छा था। मांग कम
और आमद अच्छी होने से उसमें 25 नए पैसों की नरमी आई, जबकि पीले चने के भाव रु.
19.50 पर रहे। जौ की आमद की अपेक्षा उठाव कम होने से उसमें 50 नए पैसों की गरमी
आकर अन्त में भाव रु. 15.50 पर रहे। चावलों में घटिया माल का स्टाक अच्छा था। उठाव
कम होने से उसमें थोड़ी नरमी थी। ................


नरमी के मुकाबले जब गरमी आती थी, तो इसका आशय होता था कि भाव ऊपर जा रहे हैं।
गरमी और तेजी लगभग पर्यायवाची शब्द के तौर पर प्रयुक्त होते रहे हैं। इसी तरह
नरमी और मुलायमी का आशय यह है कि भाव बढ़ने की प्रवृत्ति नहीं दिखा रहे थे,
बल्कि गिरने की प्रवृत्ति दिखा रहे थे।


रौनक को कांग्रेसी धक्का

शेयर बाजार तब परेशान हो जाता था, जब निजी क्षेत्र के मुनाफे पर किसी तरह की
सीमा लगाने की बात कही जाती थी। ये वह दौर था, जब सार्वजनिक क्षेत्र, समाजवाद
के मसले कांग्रेस में जबरदस्त चर्चा के विषय थे। इस चर्चा का असर शेयर बाजार पर
खासा पड़ता था। देखें-



हिन्दुस्तान, शुक्रवार 2 जनवरी, 1959

पेज नंबर सात, दो कालम

बम्बई शेयर (वार्षिक समीक्षा)

प्रारम्भिक रौनक के बाद 1958 के अंत में निराशा

बम्बई, 1 जनवरी। 1957 की तुलना में 1958 का वर्ष शेयर बाजार के लिए काफी उत्साह
का वर्ष रहा और लगभग सभी शेयरों में चहुंमुखी सुधार हुआ। बाजार में पुन विश्वास
की भावना आ जाने से कारोबार में भी वृद्धि हुई और वर्ष के अधिक हिस्से में
भावों में ऊंचे की भावना रही, किन्तु वर्ष के अन्त में शेयर बाजार की भावना को
गहरा धक्का लगा और भाव गिर गए। इसका मुख्य कारण कांग्रेस कार्य समिति का वह
प्रस्ताव था जिसमें निजी क्षेत्र लाभ पर सीमा लगाने की बात कही थी। इस प्रस्ताव
का असर यह हुआ कि शेयरों का काफी लाभ खत्म हो गया और वे वर्ष के उच्चतम भावों
से काफी नीचे बन्द हुए।

वर्ष के प्रारम्भ से ही शेयर बाजार में ऊंचे की भावना आ गई। यह भावना अनेक
अनुकूल कारणों से आई जिनमें स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर टाटा आयरन एण्ड स्टीलकम्पनी
लिमिटेड द्वारा बोनस शेयर जारी करने की सम्भावना थी।  इस्पात के सीमातीत उत्पाद
की सम्भावना, कपड़े की मांग बढ़ जाने की आशा और केन्द्रीय बजट में कुछ राहत
मिलने के उम्मीद भी इसका कारण थे। बाद में टिस्को के संचालकों ने प्रति पांच
शेयरों पर एक बोनस शेयर की घोषणा भी कर दी,  जिस पर उन्हे सरकार की अनुमति मिल
गई। अमरीका से भारत को 22.5 करोड़ डालर का ऋण मिलने की खबरों से और फ्रांस तथा
जापान से भी सहायता मिल जाने की सम्भावना से भी बाजार में यह तेजी की भावना आई।
इसके अलावा सीमेंट के रिटेंशन भावों में रु. 10 प्रति टन की शीघ्र वृद्धि की
सम्भावना भी इसका कारण थी।

फरवरी माह में बाजार की भावना दबी हुई थी। केन्द्रीय वित्तमंत्री के इस्तीफे
तथा बजट सम्बन्धी अनिश्चितताओं के कारण यह स्वाभाविक भी था। किन्तु जब 28 फरवरी
को बजट प्रस्ताव पेश हुए तो बाजार में कुछ मंदी आई  किन्तु यह मंदी अधिक समय तक
कायम नहीं रह सकी और भाव पुन : सुधर गए। इसका मुख्य कारण केन्द्रीय बजट में कोई
नए कर  न लगाया जाना था। 19 मार्च को कपड़े के उत्पादन कर में कमी कर दिए जाने
और अनिवार्य डिपाजिट योजना के समाप्त कर दिए जाने से व्यापारियों को यह अनुमान
हुआ कि सरकार का रवैया निजी क्षेत्र के प्रति सहयोगपूर्ण हो रहा है।

यह सुधार मई माह तक जारी  रहा। मई में इंडियन आयरन और टाटा आयरन स्टील
कम्पनियों में कर्मचारियों की हड़ताल से भावों में गिरावट आई। इसके अलावा इसी
समय आयोजन आयोग ने लोकसभा के सामने यह प्रस्ताव पेश किया कि आगामी दो वर्ष में
करों में रु.100 करोड़ रुपये की अतिरिक्त वृद्धि की जानी चाहिए। इससे निकट
भविष्य में और लगाए जाने की आशंका बढ़ी।

....................जून माह से भाव नए ऊंचे स्तर पर पहुंचने लगे। इस समय
इस्पात उद्योग की हड़ताल भी समाप्त हो गई थी जिससे बाजार में रौनक आ गई।

जुलाई माह में कपड़े के उत्पादन कर में और कमी कर दिए जाने और सीमेंट के
रिटेंशन भावों में वृद्धि कर दिए जाने से शेयरों में ऊंचे की भावना और बलवती
हुई। भारत सरकार ने निर्यात को प्रोत्साहन  देने की जिस योजना की इसी समय घोषणा
की  उससे और वस्त्रोद्योग जांच समिति की सिफारिशों सो बाजार में रौनक फैल गई।
वित्तमंत्री द्वारा जीवन बीमा निगम की विनियोग नीति की घोषणा का भी बाजार में
स्वागत किया गया।

यह ऊंचे की भावना बाद में और दृढ़ होती गई। इसके मुख्य कारण इस्पात के रिटेंशन
भावों में और वृद्धि कर दिया जाना तथा वित्तमंत्री को अपनी विदेश यात्रा के
दौरान में और विदेशी सहायता का आश्वासन मिल जाना था।

ऊंचे की यह भावना नवम्बर माह में राष्ट्रीय विकास परिषद द्वारा खाद्यान्नों के
थोक व्यापार का समाजीकरण करने के निश्चय से रुक गई। परिषद ने जो निश्चय इस समय
किये उनका यह अर्थ था कि निजी क्षेत्र पर और नियंत्रण लगाये जाएंगे। इसी समय
कांग्रेस कार्य समिति ने पूर्ण समाजवाद के ध्येय को प्राप्त करने के लिए जिन
तरीकों का सुझाव दिया उनसे बाजार की भावना को गहरा धक्का लगा। इन सुझावों में
मुख्य यह था कि निजी क्षेत्र के लाभ पर सीमा लगाई जायगी। वित्तमंत्री ने
कलकत्ता के असोसिएटेड चेम्बर आफ कामर्स की सभा में भाषण दिया, उससे बाजार से
विश्वास की भावना उठ गई। सभा में वित्तमंत्री ने यह स्पष्ट रुप से घोषित कर
दिया कि करों में कमी किए जाने की जरा भी संभावना नहीं है। इससे वर्ष के अंत
में बाजार में घबराहट फैल गई। यह स्वाभाविक ही था। इस घबराहट के कारण तेजड़ियों
ने कटान की जिससे शेयर नीचे बंद हुए। ............



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