[दीवान] chakradhar ji ki iitihas drishti

Kamal Kumar Mishra kamal_bhu at rediffmail.com
Fri Jul 13 17:23:44 IST 2007


  
  


bahut-bahut shukriya Ravikant,

Silsila likhte hasya- Kavi Ki Nazron par kabhi Chakradhar ji ka apna adhyapakiya vyaktitva to kabhi unke andar chipa Patrakar samne ata hai.Hindi ki apne hi desh men adhikarikta khone aur Sanjukt Rastra men  iski adhikarikta ka sawal uthne par likhte waqut chakradhar ji dwara jin rupakon ka prayog kiya gaya hai vah bhi kam dilchasp nahin hai.
 
Chakradhar ji Indra Gandhi ke bhartiya bhasaon aur Rastrabhasha ke sandarbh men diye gaye us vaktvya -jismen swargiya Gandhi ne bhashaon ke prashn par bolte hue "sanjukt parivar" ke rupak ka istemal kiya tha- ko Hindi ki antrik takat ko vyakt karne wala pramanik vaktvya batate hain. 
   "  वे मानती थीं कि हमारी जितनी भी भाषाएं हउनके रहते हम एक संयुक्त परिवार जैसे हैं। वे सब की सब हमारी मातृभाषाएं हैं और चूंकि हिन्दी सब से बड़े भाग द्वारा बोली जाती है इसलिए हमारी राष्ट्र भाषा है।  इंदिरा जी का वक्तव्य हिन्दी की आंतरिक ताकत को बताता है।"

Austrelia se Mala ji ka Udahran bhi dhoond late hain.
  
" आस्ट्रेलिया में माला मेहता à¤
गर हिन्दी स्कूल चला रही हैं तो उसके लिए भारत का कोई संस्थान उनकी आर्थिक मदद नहीं करता है। à¤
पने संसाधन स्वयं जुटाती हैं। दरà¤
सल, हिन्दी स्कूल वहां के लोगों की  निजी आवश्यकता है। वे जिस भाषा और संस्कृति से प्यार करते हैं, à¤
पने बच्चों को भी सिखाना चाहते
हैं।"

Lekin muhalle-samaj,aur sanjukta parivar ke rupakon men baat karta hamara ye pyara kavi angrezi ke lalon ke khilaf ek narazgi zahir karne ke sath hi, sasan-satta par is kadar nirbharta kyon pradarshit karta hai,ye bat samajh nahin aati???   

बाहर से और शासन की ओर से जो ताकत उसे मिलनी चाहिए हिन्दी को à¤
भी भी उसकी दरकार है। मा
ना कि वह राजभाषा है लेकिन राजभाषा के रूप में उसका कितना महत्व है और राजकाज में कितना
प्रयोग में आती है, ये कुछ ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें हम दबा लेते हैं। आज इस बात से इंकार नहीं किया जा
सकता कि राजनीतिक दुरिइच्छाओं और à¤
ंग्रेज़ियत के लालों की लाल फीताशाही से हिन्दी व्यापक तबा
ही का शिकार हुई।

vaise nai takniki(computer aur digi- cam) ke vyavhar ko lekar Chakradhar ji tamam theth Hindiwallon jaisa rukh nahin rakhte jaan kar accha laga.

-ik Murid


On Fri, 13 Jul 2007 Ravikant wrote :
>maafi chahunga kafi lamba hai. doosri kist mein maujooda sammelan ki charcha
>hai.
>
>ravikant
>
>
>http://ashokchakradhar.blogspot.com/2007/06/blog-post_03.html
>
>Sunday, June 03, 2007
>विश्व हिन्दी सम्मेलन सिलसिले
>
>बच्चे क्यों जल्दी सीख जाते हैं? क्योंकि à¤
पनी जिज्ञासाओं को तत्काल शांत कर लेते हैं। वयस्क होते ही
>बंदा दस बार सोचता है कि मन में जो सवाल उठा है उसे पूछें कि न पूछें। पूछ लिया तो हेठी तो न
>  हो जाएगी, à¤
ज्ञानी तो न माने जाएंगे। इसी चक्कर में मैंने डॉ. इन्द्रनाथ चौधुरी से वह जिज्ञासा
>नहीं रखी जो एक संगोष्ठी में उन्हें सुनकर मेरे à¤
ंदर कुलबुला रही थी। उन्होंने कहा था— ‘हिन्दी एल.
>डब्ल्यू. सी. है’। मुझे नहीं मालूम था कि एल. डब्ल्यू. सी. क्या होता है। संगोष्ठी के बाद मिले,
>पूछने को हुआ तो उन्हें किसी और ने घेर लिया। à¤
पने à¤
गले किसी भाषण में उन्होंने फिर वही बात दो
>हराई कि हिन्दी एल. डब्ल्यू. सी. है। भला हो उनका कि उन्होंने खुद ही बता दिया-- एल.
>डब्ल्यू. सी. का मतलब है ‘लैंग्वेज ऑफ वाइड सर्कुलेशन’।
>
>सचमुच हिन्दी ‘लैंग्वेज ऑफ वाइड सर्कुलेशन’ है। इस समय विश्व में काफी फैली-पसरी भाषा।
>  मीडिया-प्रभु के हाथों में शंख, गदा, चक्र, कमल, परशु, वीणा और स्वर्ण-मुद्राओं के विविध रूपों में
>हिन्दी विराजमान है। मीडिया-प्रभु के चेहरे पर हिन्दी की वैश्विक मुस्कान है।
>
>उन्नीस सौ पिचहत्तर से विश्व हिन्दी सम्मेलनों का सिलसिला चला। पहला नागपुर में हुआ। दूसरा
>सम्मेलन उन्नीस सौ छिहत्तर में मॉरीशस में हुआ। फिर सात वर्ष के à¤
ंतराल के बाद सन उन्नीस सौ ति
>रासी में नई दिल्ली में आयोजित हुआ। चौथा इसके दस साल बाद उन्नीस सौ तिरानवै में पुन: मॉरीशस
>में हुआ। पांचवां उन्नीस सौ छियानवे में त्रिनिदाद में छठा उन्नीस सौ निन्यानवे में लंदन में, सातवां
>दो हज़ार तीन में सूरीनाम में आयोजित हुआ और आठवां à¤
ब न्यूयार्क में होने जा रहा है। पिछले
>  तीन बार से सरकार इस बात का ध्यान रखने लगी है कि विश्व हिन्दी सम्मेलनों का à¤
ंतराल तीन-चा
>र वर्ष से à¤
धिक न हो।
>
>सात सम्मेलनों का क्या लाभ हुआ
>सवाल ये है कि क्यों जाते हैं लोग विश्व हिन्दी सम्मेलनों में? क्यों होते हैं विश्व हिन्दी सम्मेलन? यह
>आठवां है। सात सम्मेलनों का क्या निचोड़ निकला, क्या लाभ हुआ? इस बात के उत्तर में सवाल किया
>जा सकता है कि किसी मेले, त्यौहार या पर्व का क्या लाभ होता है। à¤
गर लाभ-हानि उसी तरह से
>देखेंगे जिस तरह से विभिन्न à¤
नुदान आयोग देखते हैं तब तो बात न बनेगी। वस्तुत: विश्व हिन्दी
>सम्मेलन के à¤
वसर पर पूरी दुनिया में हिन्दी बोलने, समझने, लिखने और पढ़ने वाले लोगों का मेला
>  जुड़ता है। उन लोगों से मिलने का मौका मिलता है जो भारत से सुदूर स्थित देशों में किसी न
>किसी प्रकार से हिन्दी से जुड़े हुए हैं। वे भारतवंशी मिलते हैं जो आज से ड़ेढ़ सौ वर्ष पहले ये भूमि छोड़
>कर गए थे और साथ ले गए थे रामचरितमानस का एक गुटका और पोटली में सत्तू।
>इन सम्मेलनों का घोषित उद्देश्य विदेशों में हिन्दी का प्रचार-प्रसार करना है।
>
>हिंदी का बरगद
>देखना यह है कि हिंदी जिन जड़ों से निकली है, उसका बरगद पूरे विश्व में कहां-कहां तक फैला है और
>उसने कहां-कहां à¤
पनी जड़ें जमाई हैं। हिंदी का यह बरगद सात समंदर पार तक à¤
पनी डालों को ले
>  गया। कुछ मजबूत डालों ने केरेबियन देशों में à¤
पनी जड़ें गिराईं कुछ ने गल्फ में तो कुछ ने एशिया में। à¤
ब
>उन जड़ों को वहां विकसित वृक्ष के तनों के रूप में देखा जा सकता है। वे जड़ें जहां गिरीं वहीं से खा
>द-पानी लेने लगीं।
>
>पिछले बीस बरस में मैंने काफी दुनिया देखी है। इस दौरान प्रवासी भारतीयों में धीरे-धीरे एक चिंता
>को विकसित होते देखा है। पश्चिम की दुनिया में à¤
ब लोगों को ख्याल आ रहा है कि उनके बच्चे बड़े
>  हो गए और à¤
फसोस कि वे उन्हें à¤
पनी भाषा न सिखा पाए। à¤
फसोस कि उन्हें à¤
पनी संस्कृति न दे पा
>ए। इस मरोड़ का तोड़ क्या हो? विश्व हिन्दी सम्मेलनों में इस प्रकार की सामूहिक चिंताएं एक मंच
>पर आती हैं और निदान खोजती हैं। निदान का à¤
र्थ संस्थाएं चलाने के लिए केवल आर्थिक मदद करना
>नहीं होता।
>
>आस्ट्रेलिया में माला मेहता à¤
गर हिन्दी स्कूल चला रही हैं तो उसके लिए भारत का कोई संस्थान उनकी
>आर्थिक मदद नहीं करता है। à¤
पने संसाधन स्वयं जुटाती हैं। दरà¤
सल, हिन्दी स्कूल वहां के लोगों की
>  निजी आवश्यकता है। वे जिस भाषा और संस्कृति से प्यार करते हैं, à¤
पने बच्चों को भी सिखाना चाहते
>हैं। ‘हिन्दी समाज’ की डॉ. शैलजा चतुर्वेदी और ‘भारतीय विद्या भवन’ के गम्भीर वाट्स न केवल
>  हिन्दी शिक्षण से जुड़े हैं बल्कि स्थानीय संसाधनों से सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित कराते रहते हैं।
>इसी तरह à¤
मरीका में ‘भारतीय विद्या भवन’, ‘à¤
ंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति’ और ‘हिन्दी न्यास’
>के तत्वावधान में हिन्दी के बहुमुखी कार्यक्रम चलते रहते हैं। रूस, नेपाल और गल्फ के कई देशों
>  में ‘केन्द्रीय विद्यालय’ हिन्दी सिखाते हैं। इनका खाद-पानी भारत की जड़ों से जुड़ा है।
>भारत सरकार की सहायता से मॉरीशस में ‘विश्व हिन्दी सचिवालय’ की स्थापना हो गई है, डॉ. वी
>नू à¤
रुण हाल ही में उसकी निदेशिका बनी हैं। खाद-पानी एकल भूमि से मिले या संयुक्त मिट्टियों से,
>दुनिया भर में हिन्दी की हरियाली फैलाने के प्रयत्न निरंतर बढ़ रहे हैं।
>
>मॉरीशस, त्रिनिदाद और सूरीनाम ऐसे देश हैं जहां भारतवंशी बहुतायत में रहते हैं। उन्होंने हिन्दी को
>à¤
पने पूर्वजों से प्राप्त करके सुरक्षित रखा। स्थानीय भाषाओं के प्रभाव में कितनी सुरक्षित रख पाए,
>यह à¤
लग बात है। नई पीढ़ी को भाषा-प्रदान की यह प्रक्रिया सहज ही घटित होती रही। इसमें
>  माताओं की भूमिका à¤
धिक रही, क्योंकि परंपरागत रूप से महिलाओं ने भाषा नहीं छोड़ी। इन तीनों
>  ही देशों के भारतवंशी परिवारों में भोजपुरी बोली जाती है। उनकी भोजपुरी ठीक वैसी भोजपुरी नहीं
>है जैसी भारत के भोजपुरी à¤
ंचल की है। उनकी भोजपुरी में उनकी स्थानीय भाषाओं के शब्द भी घुल-मिल
>गए हैं। मॉरीशस में बोली जाने वाली भोजपुरी में फ्रैंच और क्रियोल भाषा के शब्द हैं।
>
>विदेशों में हिन्दी से रागात्मक लगाव को बढ़ाने में हिन्दी फिल्मों और हिन्दी गानों की महत्वपूर्ण
>  भूमिका रही है। हिन्दी गाने à¤
पनी मधुर धुनों और पारंपरिक तरानों के कारण भारतवंशियों को बहुत
>à¤
च्छे लगते हैं। गाना एक बार नहीं, बहुत बार सुना जाता है, और जो बंदिश à¤
नेक बार सुनी जाती है
>वह कंठस्थ हो जाती है। मैंने पाया कि भले ही पूरे गीत का à¤
र्थ वे नहीं समझते हैं, लेकिन त्रिनिदाद
>और सूरीनाम के युवा मस्ती से ये गाने गाते हैं। ‘सुहानी रात ढल गई ना जाने तुम कब आओगे’ एक ऐसा
>गीत है जिसे त्रिनिदाद में इस आस्था से गाते हैं जैसे वह उनका दूसरा राष्ट्र-गीत हो। कोई एक
>  व्यक्ति गाना प्रारंभ करता है, सभी सुर मिलाने लगते हैं। हिन्दी सम्मेलनों ने भारतवंशियों के à¤
न्दर
>आत्मविश्वास का सुरीला संचार किया है।
>
>आज के ज़माने में टीस की बात ये है कि आदमी तीस दिन में बदल जाता है, सूरीनाम के भारतवंशी तो
>एक सौ तीस साल पहले जो लोक-भाषा और लोक-संस्कृति लेकर गए थे आज भी वहां उन्हीं धुनों में गा
>रहे हैं और भारत को प्यार करते हैं बेशुमार। युग बीत गए पर वे ज़्यादा नहीं बदले। ऐसे भारतवंशियों
>को देखकर मन में à¤
पार स्नेह उमड़ता है।
>
>पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन का प्रमुख मुद्दा
>श्रीमती इंदिरा गांधी का भाषण कितने ही लेखों में इन दिनों दोहराया जा रहा है।
>उन्होंने पहले सम्मेलन में कहा था कि विश्व हिन्दी सम्मेलन किसी सामाजिक या राजनीतिक
>प्रश्न à¤
थवा संकट को लेकर नहीं, बल्कि हिन्दी भाषा तथा साहित्य की प्रगति और प्रसार से उत्पन्न
>प्रश्नों पर विचार के लिए आयोजित किया गया है। वे मानती थीं कि हमारी जितनी भी भाषाएं हैं
>उनके रहते हम एक संयुक्त परिवार जैसे हैं। वे सब की सब हमारी मातृभाषाएं हैं और चूंकि हिन्दी सब से
>बड़े भाग द्वारा बोली जाती है इसलिए हमारी राष्ट्र भाषा है। इंदिरा जी का वक्तव्य हिन्दी की
>आंतरिक ताकत को बताता है।
>
>बाहर से और शासन की ओर से जो ताकत उसे मिलनी चाहिए हिन्दी को à¤
भी भी उसकी दरकार है। मा
>ना कि वह राजभाषा है लेकिन राजभाषा के रूप में उसका कितना महत्व है और राजकाज में कितना
>प्रयोग में आती है, ये कुछ ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें हम दबा लेते हैं। आज इस बात से इंकार नहीं किया जा
>सकता कि राजनीतिक दुरिइच्छाओं और à¤
ंग्रेज़ियत के लालों की लाल फीताशाही से हिन्दी व्यापक तबा
>ही का शिकार हुई।
>
>बहरहाल, पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन में तीन मुद्दे थे लेकिन प्रमुख पहला ही था—
>1। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिया जाए। 2। वर्धा में विश्व
>हिंदी विद्यापीठ की स्थापना हो। 3।हिंदी सम्मेलनों को स्थायित्व प्रदान करने के लिए à¤
त्यंत वि
>चारपूर्वक एक योजना बनाई जाए
>
>
>हिन्दी à¤
पने ही देश में à¤
पने à¤
धिकार खोने लगी थी और हम बात कर रहे थे संयुक्त राष्ट्र संघ
>  में हिन्दी की आधिकारिकता की। ऐसा हमारे मोहल्ले-समाज में भी होता है। जब घर में कोई कमतरी
>हो तो हम मोहल्ले के सामने à¤
पनी à¤
न्दरूनी कमज़ोरियां नहीं बताते। मोहल्ले से à¤
पनी à¤
पेक्षा बनाए
>रखते हैं कि वह हमारी श्रेष्ठता स्वीकार करे।
>
>संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषा की ‘श्रेष्ठता’ स्वीकार कराने के लिए कुछ निर्धारित मानक थे। हिन्दी से
>जुड़े आंकड़ों को लेकर हम वहां खरे नहीं उतरे। आचार्य विनोबा भावे ने पहले सम्मेलन में ही à¤
पने देश की
>भाषागत विडम्बनाओं का उल्लेख किया था— ‘यूएनओ में स्पेनिश को स्थान है, à¤
गरचे स्पेनिश बोलने वाले
>पंद्रह-सोलह करोड़ ही हैं। हिन्दी का यूएनओ में स्थान नहीं है, यद्यपि उसके बोलने वालों की संख्या
>लगभग छब्बीस करोड़ है। इसका कारण यह है कि बिहार वालों ने à¤
पनी भाषा सेंसस में मैथिली, भो
>जपुरी लिखी है। राजस्थान वालों ने à¤
पनी भाषा राजस्थानी बताई है। इन कारणों से हिंदी बोलने
>  वालों की संख्या पंद्रह करोड़ रह गई। à¤
गर हम इन सबकी गिनती करते तो हिन्दी बोलने वालों की
>संख्या कम से कम बाईस करोड़ होती। इसके à¤
लावा उर्दू भी एक प्रकार से हिंदी ही है, जिसे बो
>लने-वालों की संख्या करीब चार करोड़ है’। आचार्य ने इस बात पर भी à¤
पनी हैरानी जताई कि
>यूएनओ ने चीनी मंदारिन जानने वालों की संख्या सत्तर करोड़ कैसे दर्ज करा दी।
>
>दरà¤
सल, हुआ क्या कि चीन में भाषा के प्रति राजनीतिक सदिच्छा रही और लाल झंडे तले
>लालफीताशाही ने देश के सारे नागरिकों से भाषा के कॉलम में एक ही नाम भरवा लिया— ‘मंदारिन’।
>हालांकि, वहाँ भी तीस-चालीस भाषाएं à¤
स्तित्व और चलन में थीं। सत्तर के दशक के प्रारंभ में उनकी
>आबादी लगभग सत्तर करोड़ थी। जनगणना के भाषागत सर्वेक्षण के आधार पर यूएनओ ने स्वीकार कर लि
>या कि चीनी बोलने वाले सत्तर करोड़ हैं। और उन्होंने ‘मंदारिन’ को मान्यता दे दी।
>
>à¤
नेक महनीय विद्वान मानते हैं कि हिन्दी की महनीयता तभी मानी जाएगी जब वह संयुक्त राष्ट्र की
>आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता पा जाएगी।
>
>दूसरा विश्व हिन्दी सम्मेलन : बालक भी नहीं शिशु
>मैं à¤
ठहत्तर में मॉरीशस में गया था। दूसरे विश्व हिन्दी सम्मेलन में तो शरीक नहीं हुआ, लेकिन महात्मा
>गांधी इंस्टीट्यूट के हिंदी विभाग में जाने का à¤
वसर मिला। नए-नए बने प्रधानमंत्री श्री à¤
निरुद्ध
>जगन्नाथ के निजी न्योते पर हम दो कवि, मैं और श्री ओम प्रकाश आदित्य वहां गए और यह पाया कि
>पूरा मॉरीशस इस बात पर गर्व करता था कि हमारे देश में दूसरा विश्व हिंदी सम्मेलन हुआ।
>
>उस सम्मेलन में हमारे देश के हिंदी के बड़े-बड़े विद्वान गए थे, कवि और लेखक गए थे। डॉ. हजारी प्रसा
>द द्विवेदी का सम्मेलन की à¤
ंतिम गोष्ठी में दिया गया भाषण à¤
द्भुत था। उन्होंने à¤
पने भाषण की
>शुरुआत यह कहते हुए की कि आप इतनी देर से धैर्य के साथ सुन रहे हैं। मुझे आप पर दया भी आ रही थी
>। आपको भी मेरे ऊपर थोड़ी-थोड़ी दया आती होगी। प्राय: ऐसा कुछ छूटा नहीं है जो विद्वानों ने
>आपको बताया न हो। उनसे à¤
छूती कौन सी बात कहूं मुझे समझ में नहीं आ रहा है।
>उनकी इस प्रस्तावना से लगता था जैसे वे à¤
धिक नहीं बोलेंगे लेकिन वे लगभग एक घंटा बोले और सब ने
>बहुत एकाग्रता से सुना। उन्होंने कहा— ‘यह जो विश्व हिन्दी सम्मेलन है इसका à¤
भी दूसरा ही वर्ष
>है। बहुत बालक भी नहीं शिशु है। à¤
भी तो यह पैदा ही हुआ है, एक दो साल का बच्चा है। लेकिन
>इसको देखकर लगता है कि एक महान भविष्य का द्वार उन्मुक्त हो रहा है’।
>
>द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन को हुए à¤
ब इकत्तीस वर्ष हो चुके हैं। आचार्य द्विवेदी की भविष्य
>  दृष्टि सब कुछ जानती थी। आठवां विश्व हिन्दी सम्मेलन à¤
ब बत्तीस वर्ष का परिपक्व जवान होने वा
>ला है। यह युवक ऊर्जावान है, इसकी क्षमताएं à¤
पार हैं।
>
>आठवां विश्व हिन्दी सम्मेलन पहली बार इतने विराट फलक पर आयोजित होने जा रहा है। उसका उद्घा
>टन सत्र भी यू. एन. की इमारत में होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी नहीं है का दर्द पाले हुए
>  हमारे आदरणीय बुजुर्ग श्री मधुकर राव चौधरी चिंतित न हों। जिस इमारत में आठवें हिंदी विश्व
>सम्मेलन का उद्घाटन होना है उसी इमारत में शायद ये मधुर घोषणा सुनने को मिले कि हिंदी संयुक्त
>  राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा है। आधिकारिक भाषा क्यों नहीं होगी भला? बताइए! जब बुश, भले
>ही à¤
पनी सुरक्षा के लिए, à¤
पने पूरे देश को प्राथमिक स्तर से हिंदी सिखाने पर आमादा हैं, जब सारे
>मल्टीनेशनल्स बहुत बड़ा बाजार देखकर हिंदी के सॉफ्टवेयर निर्माण में à¤
पनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं,
>जब प्रयोक्ताओं के सूचना प्रौद्योगिकी के सद्य:विकसित ज्ञान के कारण हिंदी में सूचना समाचारों का
>आदान-प्रदान और प्रेमाचार हो रहा है और जब हमारे पास माशाà¤
ल्ला पैसे की भी वैसी कमी नहीं है
>तो फिर हिन्दी क्यों नहीं होगी संयुक्त राष्ट्र में एक आधिकारिक भाषा। पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन
>के समय हमारे देश के सामने विदेशी मुद्रा की उपलब्धि का सवाल था। आज वैसी चिंताएं नहीं हैं।
>
>संस्कृति, भाषा और नई सूचना प्रौद्योगिकी
>à¤
ब जबकि हम इंटरनेट के युग में हैं पूरा विश्व à¤
पनी भौगोलिक दूरियां समाप्त करते हुए बकौल
>  डॉ. सुधीश पचौरी एक ग्लोकुल बन चुका है-- ‘ग्लोबल गोकुल’। गोकुल एक गांव है पर गांव से कुछ
>  ज़्यादा है। मुहब्बत फैलाता है। ‘ग्लोकुल’ बनने के बाद एक à¤
च्छी बात यह हुई है कि à¤
ब से सात-आ�
>साल पहले हिंदीवादियों का जो à¤
हंकार था वह à¤
ब युवा-शक्ति की नई आशाओं और आकांक्षाओं के कारण
>धीरे-धीरे नमित हुआ है। प्रारंभ में जो लोग कंप्यूटर और तकनीक को साहित्य विरोधी, संस्कृति विरो
>धी और पाश्चात्य सभ्यता का आक्रमण मानते थे वे भी à¤
ब मानने लगे हैं कि कंप्यूटर तो एक माध्यम भर
>है। यह संस्कृति नहीं है, इसके माध्यम से संस्कृतियां आ-जा सकती हैं। दूसरी संस्कृति को रोकने
>का प्रयास करेंगे तो à¤
पनी संस्कृति को à¤
न्यत्र कैसे पहुंचाएंगे।
>
>हिन्दी को लेकर जो कुंठाएं थीं वे समाप्त हो गई हों ऐसा नहीं कह सकते। कई बार घर की
>कलह को बाहर की ताकतें ठीक करती हैं। à¤
पना महत्व तब पता चलता है जब बाहर के लोग बताएं। हम
>हनुमान जी के देश के लोग हैं और à¤
तुलित बलधामा है हिन्दी। इसको जाना माइक्रोसोफ्ट ने, गूगल ने,
>याहू ने और आज इंटरनेट पर सूचना भण्डारण कोई समस्या नहीं रही। गति इतनी कि आप मिली सैकिण्ड
>में सूचनाएं पा सकते हैं। सर्च की जो सुविधा हिन्दी में आई है उसने हिन्दी के परिवार को à¤
चानक
>बहुत बड़ा किया है। आज à¤
पनी संस्कृति और भाषा को व्यापकतम स्तर पर फैलाने का माध्यम है- नई
>सूचना प्रौद्योगिकी। दिन-ब-दिन नए-नए जनसंचार माध्यमों से, प्रौद्योगिकी से, हिन्दी का पाट
>चौड़ा हो रहा है, उसका प्रवाह तीव्र हो रहा है और लगने लगा है कि वह इस भूमंडल की एक
>महत्वपूर्ण सम्पर्क भाषा बन सकती है। भारतवंशी पूरे विश्व में फैले हुए हैं, वे हिन्दी के चलन को
>  विश्वव्यापी बना सकते हैं।
>
>लंदन का विश्व हिंदी सम्मेलन छठा था
>न्यूयार्क में यह सम्मेलन जो à¤
ब होने जा रहा है, यह निन्यानवे में भी हो सकता था वहां। प्राथमिक
>प्रयास à¤
मरीका के ही चल रहे थे, लेकिन छोटे-छोटे à¤
हंकार और भविष्य की दूरगामी दृष्टि न होने के
>कारण à¤
मरीका स्थित हिन्दी सेवी संस्थाएं प्रस्तावित आयोजन को साकार रूप न दे सकीं। à¤
चानक
>लंदन के नौजवानों ने वह कार्यक्रम लपक लिया। देखते ही देखते सम्मेलन लंदन में सम्पन्न हो गया, और
>à¤
च्छी तरह से हुआ। लंदन का विश्व हिंदी सम्मेलन छठा था। इससे पहले त्रिनिदाद और भारत में भी
>  हो चुके थे। लंदन में काफी à¤
फरा-तफरी रही। मैं भी गया था, मेरी तो तफरी रही। न तो मुझे किसी
>सत्र में बोलना था, न कोई शैक्षिक ज़िम्मेदारी थी, मात्र एक कविसम्मेलनी कवि की हैसियत से बुला
>या गया था। जग का मुजरा लेता रहा और लोगों को सुनता रहा। कैमरा साथ ले गया था, फोटो खीं
>चता रहा। लंदन की हिंदी की खूबसूरती पर मैंने ग्यारह रोल खर्च कर दिए। किन्हीं विद्वान को,
>  जिन्होंने उस सम्मेलन में भाग लिया हो और à¤
पना फोटो न मिला हो तो मुझसे संपर्क कर सकते हैं, शा
>यद मैं उन्हें उनका चित्र दे पाऊं। मेरे पास डॉ. नामवर सिंह और डॉ. विष्णु कांत शास्त्री के घुट-घुट
>कर बतियाते हुए चित्र हैं। शिवानी जी के ऐसे चित्र हैं जिन्हें पाकर डॉ. मृणाल पांडे खुश हो सकती
>हैं।
>
>तो, छठे विश्व हिन्दी सम्मेलन में मैंने फोटोग्राफर की हैसियत से भाग लिया। और वहीं से मेरी रुचि
>सम्मेलनों में बढ़ी। लगा जैसे यह है हिंदी का एक à¤
द्भुत मेला, एक कुंभ। जहां आप à¤
पनी हिन्दीगत,
>  व्यावहारिक, सांस्कृतिक भड़ांस निकाल सकते हैं। कह सकते हैं, सुन सकते हैं और à¤
पनी कलंगी में एक पंख
>जोड़ सकते हैं- देखा हम भी गए थे कुंभ करने, हम भी वहां थे।
>
>वहां मैंने देखा कि आयोजक प्रिय पद्मेश गुप्ता, तितीक्षा शाह, उषा राजे सक्सेना, के़.बी़.एल़.
>सक्सेना, कृष्ण कुमार, महेन्द्र वर्मा और ब्रज गोयल परेशान थे क्योंकि सम्मेलन में ‘पांच बुलाए पंद्रह
>आए’, मुहावरा बेमानी हो गया। वहां तो पांच सौ से ज़्यादा आ गए। इतने प्रतिभागियों की
>  व्यवस्था कैसे हो? कहां टिकाया जाए? कहां खिलाया जाए? लेकिन मैंने देखा कि नौजवान à¤
गर किसी
>चीज़ में लग जाएं तो हर समस्या हल हो सकती है। बड़ी ही निष्ठा से उन लोगों ने à¤
धिकांश के
>ठहरने, खाने और मनोरंजन का इंतजाम किया। सारा पैसा भारत सरकार ने दिया हो ऐसा तो नहीं
>  था। उन्होंने à¤
पने-à¤
पने संसाधनों और सम्पर्कों का इस्तेमाल किया। किसी से भोजन स्पौन्सर कराया
>  किसी से स्टेशनरी। स्वयं कितना करते! जहां से फोकट में मिल सकता था, हिन्दी के हित में लिया।
>  किस से ले रहे हैं इस पर ध्यान नहीं दिया। एक भोजन सत्यनारायण मंदिर में क्या हो गया, भारत के
>à¤
ख़बारों में कोहराम मच गया कि देखिए सम्मेलन का स्वरूप धार्मिक है, इसे कट्टरवादी दक्षिण पंथी
>शक्तियों ने हथिया रखा है।
>
>मैं समझता हूं कि à¤
पनी-à¤
पनी विचारधाराएं à¤
पने-à¤
पने साथ हैं, लेकिन हिंदी के मामले को लेकर दक्षि
>ण-पंथी और वाम-पंथी होकर नहीं सोचना चाहिए। हिन्दी के लिए न कोई पक्ष हो और न प्रतिपक्ष,
>हिन्दी तो सबकी है। जो सरकार में हैं उन्हें भी हिंदी के हित में होना चाहिए, जो विपक्ष में हैं
>  उन्हें भी। वस्तुत: हिंदी को एक ऐसी भाषा के रूप में विश्व में स्थापित करना है जो एक ओर हमारे
>देश के लोकतांत्रिक मूल्यों की वाहिका बने दूसरी ओर हमारी साझा संस्कृति की संवाहिका।
>
>सातवें का 'सम्मेलन समाचार'
>à¤
गला यानी सातवां विश्व हिन्दी सम्मेलन दो हज़ार तीन में सूरीनाम में हुआ। सम्मेलन में जो काम मुझे
>दिया गया, उसमें मुझे श्रम तो ख़ूब करना पड़ा, लेकिन आनंद भी बहुत आया। पिछले विश्व हिन्दी
>सम्मेलनों में प्रायः मुझे लगता था कि मैं इससे ज़्यादा कुछ कर सकता हूं। कविसम्मेलन तो एक रात में
>कुछ घंटों का मामला होता है और सम्मेलन चलता है तीन-चार दिन। बाकी समय में क्या करिए! सिर्फ
>प्रतिभागी बनकर फाइलें उठाए-उठाए घूमने में भला क्या मज़ा!
>
>आई० सी० सी० आर० ने मेरे सामने एक प्रस्तावनुमा सवाल रखा कि क्या मैं सम्मेलन के दौरान, प्रतिदि
>न, एक चार पेज की न्यूज़-बुलेटिन निकाल सकता हूं? सुनकर मैं तो परम प्रसन्न हो गया। उत्साह से
>भरकर मैंने कहा- 'जी, चार पृष्ठ क्या, मैं प्रतिदिन सोलह-पृष्ठीय समाचारपत्र निकाल दूंगा। मेरे
>  पास à¤
पना लैपटॉप है। साथ में डिजिटल कैमरा, जिससे मैं तस्वीरें खींचकर सीधे कंप्यूटर पर डाउनलोड
>कर सकता हूं। स्कैनिंग का कोई झंझट नहीं। एक टाइपिस्ट मिल जाए तो à¤
च्छा है, वैसे मुझे टाइपिंग
>  भी आती है। पेजमेकर और फोटोशॉप का पिछले कुछ वर्षों से इस्तेमाल कर रहा हूं। चित्र बना सकता
>हूं, बाइंडिंग भी जानता हूं। ये सब तो मैं जानता हूं कि जानता हूं, लोगों का मानना है कि मैं लिख
>भी लेता हूं।'
>
>बहरहाल, प्रस्ताव पाकर मैं उल्लास से भरा हुआ था। एक चुनौतीपूर्ण कार्य मिला तो मैं à¤
पनी पूर्व
>तैयारियों के साथ इस सम्मेलन में गया। मुझे ख़ुशी है यह बताते हुए कि पांच तारीख़ से लेकर दस तारीख़
>तक श्री घनशाम दास, à¤
निल जोशी, राजमणि, के. बी. एल. सक्सेना और भुत सारे साथियों के
>सकर्मक सहयोग से मैंने न्यूज़-बुलेटिन के पांच à¤
ंक निकाले। नाम रखा 'सम्मेलन समाचार'। पांच जून
>को 'सम्मेलन समाचार' का स्वागतांक निकाला, छः जून को निकाला उद्घाटन के समाचारों को प्रा
>थमिकता देते हुए। कोई दस पेज का, कोई बारह पेज का, कोई चौदह पेज का। सामग्री हर दिन
>  आवश्यकता से à¤
धिक होती थी। सोचते थे कि बची हुई सामग्री को à¤
ंतिम दिन के 'विदाई à¤
ंक' में डा
>ल देंगे। ये पांच à¤
ंक निकालकर मुझे बहुत-बहुत आनंद आया। आनंद आया रिपोर्टिंग का, फोटोग्राफी का,
>पेज-सैटिंग का, प्रस्तुति-कला का, नई टीम के गठन का, घनघोर श्रम का और थकान का।
>
>मेरे à¤
चानक जन्मे इस उत्साह और उल्लास के पीछे कुछ कारण और भी थे। पहला तो यह कि मैं विगत
>सम्मेलन की à¤
ख़बारी रिपोर्टों से मन ही मन थोड़ा खिन्न था। मुझे वे एकांगी लगी थीं। à¤
गर मैं उस
>सम्मेलन में नहीं गया होता तो मुझे क्या पता चलता कि सचमुच क्या हुआ! मैं तो à¤
ख़बारों की रिपोर्ट
>को ही à¤
ंतिम मान लेता। लेकिन मैं तो वहां था। सब कुछ मैंने देखा था, सुना था। और सब कुछ वैसा
>नहीं था जैसा कि कुछ ख़ास à¤
ख़बारों में बताया गया था। मैंने उस सम्मेलन में लगभग दस रोल फोटो खीं
>चे। व्यक्तिगत वितरण के à¤
तिरिक्त वे कहीं छपे नहीं। तब मन करता था कि इन चित्रों के साथ एक
>  विस्तृत रिपोर्ट बनाऊं ताकि सम्मेलन की पूरी झांकी दिखा सकूं। उस दबी हुई कामना को पूरा होने
>का मौका मिला तो फिर मैं ख़ुश क्यों न होता।
>
>कई बार जब दाल में कंकड़ी आ जाती है तो मुंह में किरकिराहट भर जाती है। लेकिन जैसा मैंने बचपन से
>देखा है हम दाल नहीं फेंकते कंकड़ी थूक देते हैं। पल दो पल खाना बनाने वाले पर नाराज़ होते हैं और
>भूल जाते हैं। छठे विश्व हिन्दी सम्मेलन के मामले में दाल-भात का तो ज़िक्र नहीं हुआ, कंकड़ी पुराण
>पर रोदन चलता रहा। मैं जानता था कि दाल में एक-दो कंकड़ियां थीं लेकिन भोजन सुस्वादु था। ज़मा
>ने ने तो यही जाना कि सारा गुड़-गोबर था।
>
>एक और भी पीड़ा थी मेरी। इस पीड़ा को वर्तमान पत्रकारिता से मेरी शिकायत भी माना जा सकता
>है कि प्रायः सारे à¤
ख़बार दृश्य के एक बहुत बड़े हिस्से को à¤
नदेखा कर देते हैं। ऐसे जैसे- 'मूंदहु नयन
>कतहुं कछु नांही'। पत्रकारिता निर्णयात्मक ज़्यादा हो जाती है विवरणात्मक कम। पाठकों का
>à¤
धिकार है कि पहले उन्हें सम्पूर्ण दृश्य दिखाया जाए। मुझे लगा कि मुझे यह मौका मिल रहा है। सो
>à¤
ंदर ही à¤
ंदर बहुत प्रसन्न था।
>
>तीसरी बात ये कि जामिआ मिल्लिया इस्लामिया के हिन्दी विभाग में हम पिछले दो दशक से किसी न
>किसी रूप में पत्रकारिता पढ़ाते आ रहे थे। यह à¤
वसर था जब मुझे पत्रकारिता के सैद्धांतिक पक्ष के
>  साथ व्यावहारिक प्रयोग करने का à¤
वसर मिल रहा था। 'सम्मेलन समाचार' प्रतिदिन शाम को छा
>पना बड़ा रोमांचकारी लगा। सोचा, पहले ये काम कर दिया जाए फिर विद्यार्थियों को उदाहरण के
>रूप में दिखाया जाए। कह सकता हूं कि 'सम्मेलन समाचार' की परिकल्पना से मेरे à¤
ंदर का विद्यार्थी
>सजग हो गया जो मेरे à¤
ंदर के गुरु को बहुत सारे नंबर लाकर दिखाना चाहता था। यानि मेरा उत्साह
>मेरे à¤
ंदर के विद्यार्थी का उत्साह था।
>
>चौथा कारण भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। पिछले सात-आठ साल से कम्प्यूटर के साहचर्य में रहते रहते यह
>बात शिद्दत से महसूस होने लगी कि नई सूचना प्रौद्योगिकी का पूरा-पूरा लाभ à¤
भी हम हिन्दी में
>नहीं उठा पा रहे हैं। कम्प्यूटर और नई तकनीकों के प्रति हम सहज नहीं हो पाए हैं और न ही समझ
>  पाए हैं कि कम्प्यूटर कलम जैसा ही एक औज़ार है जो आपकी क्रियाशीलता को कई गुना बढ़ा देता है।
>प्रतिदिन à¤
ख़बार निकालने के पीछे मुझे à¤
पने कम्प्यूटर जैसे साथी पर बड़ा भरोसा था।
>  'सम्मेलन समाचार' के रूप में मैं कम्प्यूटर की क्षमताओं का एक 'डैमो' देना चाहता था।
>
>कई बार ऐसा हुआ कि टाइप करने तक का समय नहीं मिला। डिजिटल कैमरे ने à¤
लादीन के जिन्न की
>तरह हुकुम बजाया। आठ जून को सायंकालीन सत्र के बाद सम्मेलन में गए बारह सांसदों ने ‘सूरीनाम
>संकल्प’ के रूप में एक प्रस्ताव का प्रारूप बनाया। लिखा था— ‘सूरीनाम में आयोजित सातवें विश्व हि
>न्दी सम्मेलन में भारतीय संसद की ओर से à¤
धिकृत रूप से उपस्थित हुए संसद सदस्यों का यह प्रतिनिधि
>मंडल विश्व हिन्दी सम्मेलन के समग्र परिवेश का à¤
ध्ययन करने के पश्चात भारत सरकार से यह आग्रह
>करता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को आधिकारिक भाषा की मान्यता दिलाने के लिए संसद एक
>संकल्प पारित करे और उसे शीघ्रातिशीघ्र क्रियान्वित करने के लिए आवश्यक क़दम उठाए’। संकल्प के
>  नीचे सर्वश्री लक्ष्मी पांडे, नवल किशोर राय, बालकवि बैरागी, वरलु, दीना नाथ मिश्र,
>सरला माहेश्वरी, एपीजे, राम रघुनाथ चौधरी और सत्यव्रत चतुर्वेदी के हस्ताक्षर थे। पत्र का चित्र
>खींचा, आधा घंटे बाद à¤
ंक लोगों के हाथ में था।
>_______________________________________________
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