[दीवान]क्या केवल मुसलमान ही दोषी हैं?

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Fri Jul 20 00:17:57 IST 2007


क्या केवल मुसलमान ही दोषी
हैं?<http://hashiya.blogspot.com/2007/07/blog-post_19.html>

कुलदीप नैयर
बैंगलूर एक चर्चित स्थान हो गया है। अभी बहुत समय नहीं बीता, वहां से आतंकवादी
संबंधी समाचार आए थे। लश्कर-ए-तोइबा ने कड़ी सुरक्षा से युक्त भारतीय विज्ञान
संस्थान पर, डेढ़ वर्ष पूर्व हमला किया था। मुझे स्मरण आ रहा है कि क्षेत्र में
शीर्षस्थ व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने, हमले से एक दिन
पूर्व ही मुझे बताया था कि आतंकवादी कभी भी और कहीं भी हमला कर सकते हैं।
उन्होंने अपनी मजबूरी जताई थी। मेरा उद्देश्य इस उल्लेख द्वारा यह जताने का है
कि ऐसी चेतावनी के बावजूद अधिकारियों की प्रतिक्रिया निरुत्साहित सी ही रही थी।
अधिकारियों ने उस समय उस आतंकवादी तंत्र के राज्य और राज्य के बाहर भी विस्तार
पर गहनता से दृष्टिपात नहीं किया। जो व्यक्ति ग्लागो हवाई अड्डे पर जलती हुई
जीप ले जा धमका और जो लोग उसके मददगार रहे, वे बैंगलूर के डाक्टर ही हैं।
स्पष्ट ही है कि पुलिस, खुफिया एजेंसियां और राज्य की मशीनरी ने तब अपना काम
बखूबी अंजाम नहीं दिया था। वे अखिल इस्लामी कट्टरतावाद और तब लीग के केंद्रों
तक पहुंच पाने में असफल रहे, जहां डाक्टरों को शिक्षित-दीक्षित किया गया था।
समग्र भारत में अधिकारियों के कुल मिलाकर क्रियाकलाप को देखकर मैं यही महसूस
करता हूँ कि या तो उनमें अनुभव की कमी है, अथवा वे राजनीतिक दबावों के चलते
अपने काम को मन लगाकर पूरा नहीं कर पाते। राजनीतिक दबाव की बात अनेक राज्यों के
बारे में एक सच्चाई है। खासतौर पर महाराष्ट्र के बारे में तो यह मानना ही होगा।
इसके बावजूद ग्लासगो हवाई अड्डे की घटना के बाद जो रहस्य प्रकाश में आए हैं
उन्होंने भूमिगत गतिविधियों और उनके पीछे जो संगठन है, उनका पर्दाफाश कर दिया
है। दुख के साथ यह स्वीकार करना पड़ता है कि तालिबान और अलकायदा के सेल
(प्रकोष्ठ) भारत में भी सक्रिय हैं। उन पर यूरोप तक से कट्टरपंथियों के लिए
सहायता जुटाने में सक्रिए रहने का संदेह है।
जिस बात से कुछ लोगों को खासा आघात लगा है, वह यह है कि अभी कुछ साल पहले तक ही
हममें से सभी सगर्व यह कहते थे कि भारतीय मुसलमानों ने बड़ी दृढ़ता के साथ
अफगानिस्तान में जिदाह में योगदान हेतु उग्रवादियों के आह्वान को खारिज कर दिया
है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 2002 में आक्सफोर्ड में बड़ी दृढ़ता के साथ
यह कहा था कि 'भारतीय मुसलमान अल कायदा जैसी सोच रखने वाले नहीं हैं।' विगत कुछ
वर्षों से अयोध्या में बाबरी विध्वंस जैसी कोई घटना नहीं हुई और न ही गुजरात
जैसा नरसंहार हुआ है। इन दोनों घटनाओं ने मुस्लिमों और बहुलवादियों को संतप्त
कर दिया था। फिर भी ये ऐसे पुराने घाव हैं कि जो हो सकता है अभी तक नहीं भर सके
हों, फिर भी मुसलमानों में उन घटनाओं के प्रतिशोध जैसा कोई आक्रोश तो अब नहीं
ही है।
सत्य है कि ज्यादातर मुस्लिम अभी भी मुख्यधारा से दूर हैं, किंतु उन्होंने
हालात के साथ रहना सीख लिया है, जबकि व्यापक तस्वीर सेक्युलर ही है। मेरा सोचना
यह है कि बैंगलूर के डाक्टरों की प्रतिक्रिया की वजह इस बात को लेकर कि पश्चिम
ने विगत छह दशकों में मुस्लिम विश्व के साथ क्या कुछ किया जाता रहा है। वह
अलग-थलग सा महसूस करता है और सोचता है कि अमेरीका, ग्रेट ब्रिटेन और अन्य
यूरोपीय देश इस आधार पर कि ईसाई और मुस्लिम सभ्यताओं में संघर्ष है, उसके साथ
टकराव की राह अपना रहे हैं, जबकि यह टकराव यह स्थापित करने लिए हो रहा है कि
दोनों में से कौन सर्वोच्च है।
इराक पर हमले को भी इसी दृष्टि से देखा जा रहा है, यह असंदिग्ध तौर पर सिध्द हो
चुका है कि उस देश के पास सामूहिक संहारक कोई आयुध नहीं थे और राष्ट्रपति बुश
ने वहां जो मारकाट कराई, उसके बाहरी कारण ही थे। हजारों इराकी मारे जा चुके हैं
और उनमें से हजारों को पाषाण युगीन जैसे हालात में जिन्दगी काटने पर बाध्य किया
जा चुका है। अमरीका ने और अधिक सैनिक वहां भेजे हैें।
यदि अमरीका अपनी आक्रामकता में कुछ बदलाव करता तो शायद मुस्लिम जगत यह सोचता कि
संभवत: उसकी सोच सही नहीं है कि पश्चिम उसका शत्रु है। वस्तुकाल यदि अमरीका कुछ
सदाशयता दर्शाए तो उसके भी सर्वत्र ही उसके प्रति मुस्लिम सोच में एक सीमा तक
बदलाव आ सकता है। नए ब्रिटिश प्रधानमंत्री गोर्डन ब्राउन अमरीका के संकेतों पर
चलते रहने के बजाय, कुछ ऐसे कदम उठा सकते हैं कि जिससे तनाव में कमी आए।
मुस्लमानों में फलस्तीन को लेकर भी चिंता है। वे उस देश की सहायतार्थ ठोस भले
ही न कर सकें, परन्तु विश्वभर में मस्जिदों के मिम्बर से इसका उल्लेख होता ही
है। कोई भी अब यहूदियों को समुद्र में फेंकने जैसे वाक्य का इस्तेमाल नहीं करता
जो अतीत में सामानय रूप से उच्चारित होता था। इस्राइल एक हकीक्त है, जिसे
अनिच्छा से ही मुस्लमान भी मान्य करते हैं। इस पर भी ऐसे कोई संकेत नहीं है कि
इस्राइल अपनी उन मूल सीमाओं पर लौटने को तैयार जो संयुक्त राष्ट्रसंघ ने तब
निर्धारित की थी, जब उस राज्य की स्थापना हुई थी।
सऊदी अरब के प्रिंस ने इस्राइल को मान्यता देने के प्रस्ताव इस शर्त के साथ रखा
है कि वह उन क्षेत्रों को खाली कर दे, जिन पर उसने युध्दों के दौरान कब्जा किया
था। फिर कोई आपत्ति नहीं होगी। अमरीकाको भी इस प्रस्ताव के पीछे अपना ताकत
लगानी चाहिए थी। मगर उसने ऐसा नहीं किया, क्योंकि अमरीकी कांग्रेंस और वाल
स्ट्रीट में यहूदी लांबी बहुत अधिक सशक्त है। और इनका ही अमरीकी वित्तीय स्थिति
पर प्रभुत्व है। मुस्लिमों की शिकायतें व शिकवे, जिनमें से कुछ वास्तविक और कुछ
काल्पनिक, उसका यह अर्थ नहीं है कि मजहब के साथ ही कुछ गलत नत्थी है। आतंकवाद
उसका हिस्सा नहीं है और जिहाद का आह्वान गलत ढंग से उभारा गया और वह इस्लाम की
मूल मान्यताओं के ही खिलाफ है। टर्की पर दृष्टिपात कीजिए। वह एक इस्लामिक राज्य
है। किंतु किसी ने यह नहीं सुना कि अमुक-अमुक आतंकवादी टर्किश (तुर्की) है। अभी
बहुत दिन नहीं हुए इस्तम्बूल की सड़कों पर सेक्युलरवाद के समर्थन में एक जलूस
निकाला गया था। इसके बावजूद टर्की की सबसे बड़ी खामी यूरोपियन बाजार नहीं बनाने
को लेकर यह है कि वह एक मुस्लिम देश है।
निसंदेह मुस्लिम जगत के शेखों और विदृतजनों को मिल बैठकर इस्लाम में विमत के
लिए गुंजाइश की राह खोजना चाहिए। कुछ मजहबी सिध्दान्तों की पुन: व्याख्या
अपेक्षित है।
कोई भी देख सकता है कि टर्की, पाकिस्तान, बंगलादेश में ऐसा भी हो रहा है। किंतु
आपत्ति का अधिकार और अधिक सशक्त तथा मुखर होना चाहिए। कुरान का कथन है 'अल्लाह
के नाम पर उन लोगों से लड़ों जो तुम्हारे विरुध्द लड़ते हों। मगर विद्वेष का
शुरुआत न करो।' आतंकवाद निर्दोषों की हत्या का एक सुनियोजित कृत है। इस्लाम इसे
मंजूर नहीं करता।
अधिक चिंता की बात यह है कि भारतीय राष्ट्र जो बहुलवाद और सहनशीलता से परिपोषित
है, इसमें भी ऐसे लोग हों, जो मजहब को देश से ऊपर रखते हैं। कोईभी व्यक्ति एक
ही साथ भारतीय और मुस्लिम होने पर गर्व कर सकता है। बैंगलूर के डाक्टरों ने
भारत को बदनाम किया है, क्योंकि उन्होंने अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति बमों के
माध्यम से की है। यह कृत्य जितना अभारतीय है, उतना ही गैर-इस्लामिक है।
साथ ही ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन आदि में भारतीय डाक्टरों के साथ जो व्यवहार जवाबी
प्रतिक्रिया के तौर पर हुआ है, वह भी दुभाग्यपूर्ण है। हर समुदाय में ही कुछ
बुरे लोग होते हैं। इसके तात्पर्य सारे समुदाय के ही खराब होने का तो नहीं है।
किंतु मुझे आशंका है कि कुछ पश्चिमी देश जातिवादी सोच से प्रेरित हो रहे हैं।
1990 में लंदन में भारत के उच्चायुक्त के तौर पर मैं तब स्तम्भित रह गया था, जब
ब्रिटेन जैसे परिपक्व और बहुलवादी राष्ट्र में मुझे जातिवाद के उभार की झलक
मिली थी, उन दिनों उपमहाद्वीप का हर व्यक्ति 'पाकी' था। बड़े-बड़े सुसभ्य ब्रिटिश
जन घृणा मात से इस संज्ञा का प्रयोग करते थे। अश्वेतों को वहां सहन किया जाता
था, मान्य नहीं।
मैं यह सोचकर सिहर सा उठता हूं कि ब्रिटिश आव्रजन के नाम पर कौन से नए
नियम-उपनियम लागू करेंगे। मारग्रेट थै्रचर ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल के
अंतिम दिनों में मुझसे कहा था कि साम्यवाद की पराजय के बाद इस्लाम संसार के लिए
सबसे बड़ा खतरा होगा। मैं सोचता हूं कि उनका तात्पर्य इस्लामिक कट्टरतावाद से
था।

देशबंधु
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साभार.
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