[दीवान]घास की क़ीमत

Ravikant ravikant at sarai.net
Sat Jun 2 18:05:38 IST 2007


दोस्तो,

आजकल दीवान पर कथा-उत्सव चल रहा है. पढ़ें, आनंद लें, टीका-टिप्पणी करें, लानत-मलामत करें, और 
अगर आपने हौसला-अफ़ज़ाई नहीं भी कि तो ये वीर बालक यहाँ नहीं थमने वाला, ऐसी उनकी धमकी 
है.

रविकान्त




घास की कीमत

 योगेंद्र दत्त  

वे मेरे मित्र कैसे बने इसकी बहुत छोटी कहानी है। किसी ने मेरा उनसे परिचय करवाया था और हम दो
नों सात-आठ माह एक ही कमरे में रहे थे। हॉस्टल में।

उस समय वे कलकत्ता से पीएचडी कर रहे थे और फील्डवर्क के लिए हमारे कस्बे में आए थे। मैं उस समय कुछ 
समाज को बदलने की चाह से और कुछ पहचान के संकट को दूर रखने के लिए क्रांतिकारी राजनीति
में सक्रिय था। आते ही वे भी हमारे साथ सक्रिय हो गए। जल्दी ही लोग उन्हें भी पहचानने लगे। वे 
युवा थे। उनकी वाणी में एक ओज था। उनकी निकटता मुझे शक्ति का आभास देती थी। 

यह उस समय की बात है जब दक्षिणपंथी भटकाव, संशोधनवाद, पेटी बुर्जुआ आदि शब्दों का प्रयोग 
सार्वजनिक भाषणों तक में भी हो जाया करता था। इनको समझने-बूझने वाले तब भी ज्यादा नहीं थे पर 
उस युग की विशेषता थी कि आम लोग भी उन्हें सुन लेते थे और कइयों का तो यह भी कहना था 
कि उन्हें वे शब्द समझ में आते हैं। कलकता से आए सुशांत भी इन शब्दों के प्रयोग में सिद्घ थे। मुझे ये शब्द 
कम समझ में आते थे लेकिन उनकी समझ पर मुझे कोई संदेह नहीं था। 

उनके प्रति श्रद्घा का एक और भी कारण था। उन्होंने बताया कि वे विवाह संस्था का त्याग कर चुके 
हैं। विवरण में जाने पर पता चला कि वे एक कन्या के साथ रहते हैं। बिना विवाह किए। अन्य मि
त्राों के लिए किसी स्त्राी देह और वाणी का सान्निय भी कल्पनातीत था यद्यपि क्रांति सन्निकट 
लगती थी, लेकिन ये तो बाकायदा किसी के साथ रह रहे थे। मुझे विश्वास हो गया कि वचन और 
आचरण, दोनों स्तर पर उनके भीतर कोई अंतर्विराध बाकी नहीं बचा है। हमें ऐसे ही नर-रत्न की 
प्रतीक्षा थी। 

जब भी मैं दुविधा में होता था तो उनके पास उसकी व्याख्या होती थी। सुझाव कम देते थे जजमेंट देने से 
उन्हें कोई गुरेज नहीं था। कलकत्ते के अपने अनुभवों का हवाला देना उन्हें बहुत प्रिय था। ह उनका 
स्वर्णिम अतीत था।

 एक बार मैंने कुतुहलवश पूछ ही लिया, ''सुशांत जी कलकत्ता और यहां की राजनीति में आपको या फर्क 
दिखायी देता है?``

हम हॉस्टल के प्रांगण में घास पर बैठे हुए थे। वे पान चबा रहे थे और घास के तिनके तोड़ते जाने की
क्रिया को कला के स्तर तक उठा चुके थे। कुछ देर सोचकर और जब घास के बीच सफाचट चांद सा 
दिखायी पड़ने लगा तो उन्होंने धीरे से गर्दन उठायी और एक पांव लंबा फैलाते हुए बोले, 

''यहां के साथियामें दक्षिणपंथी भटकाव दिखायी देता है। संगठन में पैटी बुर्जुआ एलिमेंट्स बहुत हैं। कई 
साथी तो बिल्कुल डी-कलास नहीं हुए हैं। वहां ऐसा नहीं था। यहां का परिवेश परिवर्तन के लिए 
उपयुक्त नहीं है।`` 
 
वे पूरी स्थिति को बड़ी अच्छी तरह समझ चुके थे। उनके सुलझे हुए विचारों से मैं प्रभावित हुए बिना
 नहीं रह सकता था। मुझे उनमें ईश्वर का अंश दिखायी देता था। मेरा मानना है कि ईश्वर हमारी नि
र्बलता और अज्ञानता की उपज है। जब मनुष्य किसी चुनौती का सामना नहीं कर पाता है तो उसके
 पीछे किसी अलौकिक शक्ति का हाथ मान लेता है। इसी बार-बार की विफलता ने उसे ईश्वर की 
कल्पना में विश्वास करना सिखा दिया है। सुशांत की गूढ़ बातों के कारण मैं उन्हें भी 
बुद्धिमान, पराक्रमी और उच्चतर नस्ल का मानने लगा था। 

मुझे कलकत्ता और यहां की राजनीति में फर्क समझ नहीं आया किंतु उनके प्रति आस्था और बढ़ गयी।

वे अपनी व्याख्या से संतुष्ट थे।

मैंने अच्छे विद्यार्थी की भांति और समझने के लिए बात को आगे बढ़ाया, ''आपको ऐसा यों लगता है? 
मुझे त ऐसा नहीं दिखायी देता। शासन पर हमारी बातों का असर भी हो रहा है।`` 

''यहीं तो तुम भूल कर रहे हो।`` मैं सचेत हो गया। उन्होंने कहना जारी रखा, ''इन क्षणिक सफलता
ओं के उत्साह में हमें अपने दूरगामी लक्ष्य को नहीं भूलना चाहिए। ये तो सब घास-फूंस हैं। इन पर या 
इतराना। सोचो, हमारा असली लक्ष्य या है?`` 

मैं सगया। पराजित व्यक्ति को आदर्शोंा की छांव में बड़ी राहत मिलती है। मेरे सामने भी कोई विकल्प 
नहीं था। मैंने कहा,

''हम चाहते हैं कि हमारा समाज गरीबी, महंगाई, जाति, दहेज, स्त्राी-पुरुष असमानता आदि विका
रों से मुक्त हो जाए। अभाव न रहें, समानता हो।`` 

उन्होंने मेरी सरलता पर लेशमात्रा भी खेद नहीं जताया। बोले, ''नहसाथी, ये हमारे लक्ष्य नहीं हैं। 
ये तो रास्ते के कुछ पड़ाव हैं। दैट्स इट! इनको इससे ज्यादा महत्व मत दो। हमारा लक्ष्य तो समाज 
परिवर्तन करना है। इसे गांठ बाध लो।`` 

मैंने ऐसे उत्साह से सिर हिलाया जैसे मैं सब समझ गया हूं। मैं दोबारा बेवकूफ नहीं दिखना चाहता था।

उन्होंने घास में पर एक और चांद बना दिया था। अबकी उन्होंने दूसरी टांग भी फैला दी। चांद छुप
 गया। पीछे घास में कोहनी टिकाते हुए उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ायी, 

''देखो जब तक हम नैतिक स्तर पर समाज से बेहतर नहीं होंगे, जाति और दहेज जैसी कुरीतियों से खुद
 को आजाद नहीं करेंगे तब तक समाज के सामने आदर्श प्रस्तुत नहीं कर सकते। अभी तो हम धर्म-कर्म,
 टोने-टोटके से ही नहीं उबर पा रहे हैं। गाधी को 'गााधीजी' लिखते हैं, सन् सैंतालीस को आजादी 
कहते हैं। ये सब दक्षिणपंथी भटकाव के लक्षण हैं। बल्कि मेरा तो मानना है कि यही विकृतियां हमें नि
र्णायक कदम उठाने से रोक रही हैं।`` मानो रहस्य की बात कहने वाले हों, थोड़ा ठहर कर उन्होंने 
कहा ''समाज हमसे अपेक्षा रखता है साथी।`` 

संक्षेप में, उन्होंने समाज खामियों का जिक्र करते हुए सिद्घ किया कि यह ठेठ सामंती समाज है। साथी 
कार्यकर्ताओं की दुर्बलताओं के आख्यान के जरिए उन्होंने यह साबित कर दिया कि हमारे साथी अभी 
पूरी तरह डी-कलास नहीं हुए हैं। 

क्रांति का यह चितेरा कुछ काल के लिए ही हमारे कस्बे में अवतरित हुआ था। एक दिन धूमकेतु की भांति 
वहां से चला गया। इसके बाद बस चिट्ठी-पत्रके मायम से उनसे जरा-बहुत संपर्क बना रहा। इन्हीं
 पत्रों के माधयम से पता चला कि उन्होंने विवाह कर लिया है, कलकत्ता में ही नौकरी पा ली थी, 
जिसमें कुछ साल काम करके वे दिल्ली में प्रवक्ता के पद पर आ गए थे। 

यद्यपि उनके विवाह में मेरा कोई जानकार नहीं गया था लेकिन न जाने किसने यह अफवाह फैला दी कि 
सुशांत ने दहेज लिया है। मालूम हुआ कि विवाह पूरे धार्मिक रीति-रिवाज से संपन्न हुआ है। मुझे वि
श्वास नहीं हुआ। भक्तों की आस्था यूं नहीं डोलती। 

करीब पांच साल बाद किसी सरकारी काम से मुझे दिल्ली जाना हुआ। मैं उनसे मिलने चला गया। वे पहले 
की तरह गर्मजोशी से मिले।

चाय पीते हुए मैंने उन्हें खंगालना चाहा,

''सुशांतजी कस्बे के लोग बड़े जाहिल हैं। आपके बारे में अनर्गल बकते हैं।`` 

'' यों या हो गया?``

''कहते हैं आपने धार्मिक रीति से विवाह किया है।``

''मतलब?`` बात पुरानी हो चुकी थी इसलिए उन्हें इस प्रसंग की उम्मीद नहीं थी। संभलते हुए बो
ले, ''अरे या कहें। मिसेज़ के घर वाले बहुत पिछड़े हुए लोग हैं। माने ही नहीं।`` 

मैंने मान लिया। निश्चय ही होंगे। पर उनके स्पष्टीकरण से मुझे पूरा संतोष नहीं ''और आपके घरवाले?`` 
मैंने कुरेदा, ''वे तो काफी उदार विचारों वाले हैं, आप बताया करते थे।``

उन्होंने दाएं हाथ की मुट्ठी भींचते हुए कहा, ''साथी यह पूरा समाज ही पिडछ़ा हुआ है।`` 

''तो आप विद्रोह कर देते। उन्हें मानना पड़ता।``

बात को यूं खींचना उन्हें अखरने लगा था। बोले, ''उससे या होता?``

''होता या! आप फेरों के जाते।``

''यार तुम भी, देखो ये सब सवाल हमारे लिए लक्ष्य नहीं हैं।`` लगा अभी कहेंगे, ये तो सब घास-फूंस 
हैं। उन्होंने ऐसा नहीं कहा। उन्होंने ये कहा, ''ये सब टैकटकस के सवाल हैं। असली लक्ष्य तो इनके बा
द आता है।`` 

सही बात थी असली लक्ष्य तो इसके बाद ही था। अपनी प्रेमिका को छोड़ कर अमीर घर की 
बारोजगार कन्या तो फेरों के बाद ही मिलनी थी। क्रांतिके चक्कर में गरीब प्रेमिका से विवाह करना 
पड़ता। क्रांति छोड़ कर आटे-दाल के चक्कर में पिसना पड़ता। इससे भी क्रांति को ही क्षति होती। 

''छोटा सा समझौता कर ही लिया तो या हो गया।`` उन्होंने बहस की गुंजाइश पर विराम लगा दि
या था।

अब मुझे खुद पर खीझ सी होने लगी थी। मैं उनके आकर्षण से बाहर निकलने को छटपटा रहा था।

''और दहेज? सुना है आपनदहेज भी ले डाला।`` 

उन्होंने चाय की प्याली मेज पर रखते हुए कहा, ''यह सरासर झूठ है। मैंने कोई दहेज नहीं लिया। मि
सेज़ का जो मन था वह ले आयीं। मैं स्त्राी समानता का सदा समर्थक रहा हूं। बल्कि  उस समय तो 
हमारे पास शहर में अपना मकान भी नहीं था कि दहेज का सामान अपने पास रख पाते इसलिए स्वेच्छा 
से कुछ ले लेने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।`` 

इसी बीच उनकी पत्भी हमारे साथ आकर बैठ गयी थीं। उन्होंने भी बातचीत में हिस्सा लेते हुए बताया 
कि ''सुशांत की हठ के कारण हमारे कई महीने बड़े कष्ट में बीते। आखिरकार हमें यह मकान मिल गया 
तो हमें सिर छिपाने का ठौर मिला। अब किराए-भाड़े का कोई झंझट नहीं। मेरे नाम पर है यह मका
न।`` 

''हां, यह सब इन्हीं का है।`` सुशांत ने कहा। मैं समझ गया किसका है।

''और अपनी सुनाअो, सुशांत ने बात खत्म करने के इरादे से पूछा।

''चलता हूं।`` मेरा जी उकताने लगा था।

वापस लौटते हुए मैं लॉन से होकर जाने लगा तो सुशांत ने टोक दिया। 

''जरा साइड से निकलो। अभी नयी घास लगवायी है।``

मैंने देखा अब उनके जीवन में घास का मूल्य बहुत बढ़ गया है।

.....इति.....


More information about the Deewan mailing list