[दीवान] barhate shahar
Ravikant
ravikant at sarai.net
Thu Jun 28 18:31:35 IST 2007
sarai ki purani saheli, Khadeeja Arif ki meherbani se praapt. khadeeje ab bbc
mein kaam karti hain.
ravikant
http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2007/06/070627_unfpa_report.shtml
यूनाइटेड नेशन पॉपुलेशन फंड (यूएनएफ़पीए) की साल 2007 की रिपोर्ट के मुताबिक ये बदलाव दुनिया
की तस्वीर बदल सकता है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि विकासशील देशों में बढ़ता शहरीकरण विकास के लिए घातक नहीं है.
आशंकाएँ
भारत में यह रिपोर्ट केंद्रीय शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी ने बुधवार को जारी की.
उन्होंने कहा, "बढ़ते शहरीकरण को लेकर जताई जा रही शंकाएँ बेकार हैं. साफ़ है कि शहरों की आबादी
इसलिए भी बढ़ रही है कि औद्योगिकीकरण की रफ़्तार यहीँ सबसे तेज़ है."
रिपोर्ट में कहा गया है कि नीति निर्माता आमतौर पर बढ़ती शहरी आबादी को ठीक नहीं मानते और
उनकी कोशिश रहती है कि शहरों की ओर हो रहे पलायन को रोका जाए.
िपोर्ट के अनुसार “ये नीतियां कारगर नहीं रही हैं. इन्हीं नीतियों से ग़रीबों के लिए आवास घटे हैं
और झुग्गी-झोपड़ियों का दायरा बढ़ता चला जा रहा है.”
शहरों की तस्वीर दिन पर दिन बदल रही है, इस पहलू से तो लगभग सभी वाकिफ़ थे, लेकिन शहर
इतनी खामोशी के साथ आबादी के मामले में गाँवों को पीछे छोड़ देंगे, इसका अंदाज़ा कम ही लोगों को
था.
रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2008 में शहरों की आबादी तीन अरब 30 लाख हो जाएगी और 2030 में ये
आंकड़ा पाँच अरब को पार कर जाएगा.
पलायन नहीं वजह
दिलचस्प बात ये है कि शहरी आबादी में बढ़ोत्तरी की वजह गाँवों से शहरों की ओर पलायन को
नहीं माना जा रहा है. कहा जा रहा है कि इसका कारण शहरों में जन्म दर बढ़ना और मृत्यु दर में
कमी आना है.
रिपोर्ट के अनुसार शहरी जनसंख्या बढ़ने से परेशानियाँ तो बढ़ेंगी, लेकिन इससे संभावनाओं का दरवाज़ा
भी खुलेगा.
भारत में यूएनएफ़पीए की प्रतिनिधि ईना सिंह कहती हैं, “स्वाभाविक है लोग ज़्यादा होंगे तो दबाव
बढ़ेगा. लेकिन दूसरे नज़रिए से देखा जाए तो शहरों में बढ़ती आबादी राष्ट्र के आर्थिक विकास में अहम
योगदान कर सकती है. व्यावसायिक अवसर बढ़ेंगे. सांस्कृतिक विकास और बदलाव से औरतों की स्थिति
भी सुधरेगी.”
सवाल
सवाल ये है कि क्या भारत जैसे देश इस बदलाव को झेलने के लिए तैयार हैं. घर, बिजली, पानी और चि
कित्सा जैसी मूलभूत सुविधाएँ इस आबादी को मिल पाएँगी.
रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया की 37 फ़ीसदी झुग्गी झोपड़ियाँ चीन और भारत में हैं और हालात
सुधारने के लिए इन देशों को ठोस नीतियां बनानी होंगी.
यूएनएफपीए के प्रतिनिधि नसीम टुमाकी कहते हैं, “हमें भविष्य को देखकर रणनीति बनानी होगी. भा
रतीय शहरों में बेरोजगारी की समस्या तो है ही सार्वजनिक सुविधाओं का भी अभाव है. पीने के
पानी, साफ-सफाई, आवास, शौचालय और लोगों को सुरक्षा मुहैया कराने के लिए नीतियां बनाने की
ज़रूरत है.”
ेकिन ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो इस रिपोर्ट से पूरी तरह सहमत नहीं है. दिल्ली के
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अमिताभ कुंडु का मानना है कि रिपोर्ट को अपुष्ट आंकडों
के आधार पर तैयार किया गया है.
वो कहते हैं, “इन आंकड़ों को जुटाने का तरीक़ा सही नहीं है. ये आंकड़े संयुक्त राष्ट्र की प्रोजेक्शन
रिपोर्ट पर आधारित होते हैं और संयुक्त राष्ट्र के प्रोजेक्शन पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा
सकता.”
उन्होंने कहा, “फिर भी शहरों की बढ़ती आबादी को लेकर समाज का ऊँचा तबका सुविधाओं पर बढ़ते
दबाव का जो हौवा खड़ा कर रहा है, उसमें कोई दम नहीं है.”
शहरी आबादी बढ़ेगी या घटेगी इस मुद्दे पर बहस मुमकिन है, लेकिन विकासशील देशों के शहरों में आधा
रभूत सुविधाओं की भारी ज़रुरत है इस पर आमराय बनाना मुश्किल नहीं है.
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