[दीवान]कसप पर...भाग-3

Ravikant ravikant at sarai.net
Sat Mar 3 16:51:48 IST 2007


संवेद और रचनाकार से साभार.... रचनाकार पर कुछ चित्र भी उपलब्ध हैं.

http://rachanakar.blogspot.com/
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गतांक से आगे...

किरदार के हिसाब से डीडी अपने वक़्त की पैदाइश है, बौद्धिक लेकिन बिल्कुल देवदासाना,
 पर नायिका के चित्रण में जोशीजी ने एक बार फिर कई परंपराओं को ध्वस्त कर दिया है। याद कीजि
ए वह प्रसंग, जब डीडी-बेबी न बोलने की हिदायत पर अमल करते हुए स्लेट-पेंसिल पर लिखकर वार्ता
लाप करते हैं, और जब नींबू को लेकर विवाद उठता है, नायक भावुकतावश नींबू के नायिका द्वारा 
नमक लगाकर चट कर दिए जाने की संभावना से प्रतिहत है - प्यार के अमर-अमोल उपहार का ऐसा 
दैनंदिन इस्तेमाल! - जोशीजी नायक को जैसे समझाते हैं - " अरे यह तो शुरुआत है। जब पराकाष्ठा पर 
पहुँचेगा तेरा प्यार, तब नायिका तेरा चुराकर दिया नींबू क्या, स्वयं तुझे दही-नमक से खा जाएगी। 
भक्षण प्रेम का अंतिम चरण है। कितना तो प्यारा लग रहा होता है चूहा बिल्ली को, जिस समय वह 
पंजा मार रही होती है उस पर।" भोज्य/भोक्ता, शिकार/शिकारी की कैसी भूमिका-पलट करते हैं जो
शीजी, यह साफ़ हो गया होगा। पर मेरे इस लेख के ताल्लुक से महत्वपूर्ण पंक्ति है - 'भक्षण प्रेम का 
अंतिम चरण है'। कामायनी मुझे ठीक-ठीक याद नहीं पर उर्वशी का मशहूर प्रेम-काम,
 देह-अदेह का द्वैत कितनी सफ़ाई से, फ़ैसलाकुन लहज़े में समाप्त होता है, यह विचारणीय है। 'रूप की 
आराधना का मार्ग आलिंगन नहीं तो और क्या है'! बात तो वही है, पर भूमिका-विपर्यय दर्शनीय 
है।
'भक्षण प्रेम का अंतिम चरण है'। वह उपन्यास ही क्या जिसमें इस तरह की सार-गर्हित, चिर-स्मरणी
य और बहु-उद्धरणीय इकलाइनाँ जुमले न हों। प्रसंगेतर आनंद और प्रसंगातीत उपादेयता ऐसी लाइनों की 
ताक़त है। निवेदन है कि जोशीजी इस कला के महारथी हैं। आइए देखें उनकी कुछ चुभती हुई पंक्तियाँ,
 जिन्हें आप श्रद्धानुसार जुमले, फ़िक़रे या सूक्तियाँ कह सकते हैं:

- ज़िन्दगी की घास खोदने में जुटे हुए हम सब कभी चौंककर घास, घाम और खुरपा तीनों भुला देते हैं तो 
प्यार का जन्म होता है।(पृ.11)

- असंभव के आयाम में ही होता है, प्‍यार रूपी व्‍यायाम। (16)

- प्रेम कालजयी होने का एक दुस्‍साहसी पर कुल मिलाकर दयनीय कर्म है। मानव कितना भी कैसा भी 
यत्‍न कर ले काल हमेशा से प्रेमजयी रहा है।(280)

- प्यार होने के लिए न विपुल समय चाहिए, न कोई स्थूल आलंबन! उसके लिए कुछ चाहिए तो आक्रान्त 
हो सकने की क्षमता।

- प्‍यार वह भार है, जिससे मानस-पोत जीवन सागर में संतुलित, गर्वोन्‍नत तिर पाता है। (119)

- क्या वही लोग हमें प्रीतिकर नहीं होते जिन पर हम हँस सकें, जो हमें हँसा सकें?(121)

- बेबी बैडमिंटन में ज़िला-स्तर की चैंपियन है, यह बात अलग है कि इस जिले में बैडमिंटन स्तरीय नहीं। 
(14)

- विफल दाम्पत्य संवादहीनता को जन्म देता है। सफल दाम्पत्य संवाद की अनावश्यकता को। क्या मौन 
ही विवाह की चरम परिणति है?(200).

- साहित्यिक लोगों की बातचीत में इस तरह का घपला हो जाता है। उनमें शब्‍दों के बहुत अर्थ निका
लने की प्रवृत्ति जो होती है। फिर जब डीडी ने अपना मसला दो-टूक बयान किया, तो ऐसे समझाने 
पर तो साहित्यकार तक समझ जाते हैं। (102)

- 'अस्मिता का प्रश्न शेष रह जाता है।' 'जो शेष रह जाता है, कहीं उतनी ही अस्मिता तो नहीं।' 
(87).

- वर्षों-वर्षों बैठा रहूँगा इसी तरह इस गाड़ी में जिसका नाम आकांक्षा है...संघर्ष का टिकट मेरे पा
स होगा, सुविधा का रिजर्वेशन नहीं। (84)।

- नियति लिखती है हमारी पहली कविता और जीवन-भर हम उसका संशोधन किये जाते हैं।(72).

- मुख से न बोलने की मुनादी क्या आँखों पर भी लागू होती है? इन लाउड-स्पीकर आँखों पर!

- "भीतर जाती है कि नहीं?", ठुल'दा सुर्ख़ियों में चीखते हैं।(51).

- अपने वर्त्तमान पर लानत भेजने का युवाओं को वैसा ही अधिकार है, जैसा मेरे जैसे वृद्धों को अतीत
 की स्मृति में भावुक होने का।

- यौवन गुलनार का बीत चुका है, लेकिन वह उसे साग्रह बनाए हुए है, इसलिए उसके संदर्भ में 
यौवन-भार-मंथरा विशेषण का प्रयोग करते हुए मेरी लेखनी हिचकती नहीं।(111)

- वैसे विधाता के विनोदी स्वभाव का परिचय देने के लिए यह पर्याप्त नहीं कि उसने मल-निष्कासन 
और काम-क्रीड़ा के लिए अलग-अलग अंग बनाना अस्वाभाविक समझा?(231)

- मनोविज्ञान, समाजशास्‍त्र, सामाजिक प्राणिशास्‍त्र - सब औसत सत्‍य   के शास्‍त्र   हैं. 
इनका औसत सदा दूसरों पर लागू होता है। हम सब अपनी दृष्‍टि में अनुपम हैं। (176)

तो जोशीजी के भाषाई तरकश में इसी तरह के असंख्य छोटे-छोटे पर नुकीले तीर हैं, गंभीर घाव करनेवा
ले। यह भी ज़ाहिर है कि वह अपनी बौद्धिक विरासत से, सामाजिक संस्कार से दो-दो हाथ कर रहे 
हैं, उनसे सतत शास्त्रार्थरत हैं। वे संस्कृति की राजनीति को अहम मानते हैं, और इसीलिए अपने 
ज़हर-बुझे व्यंग्य-बाण की बौछार कर पुरातनपंथी रिपुसैन्यदल को मर्माहत कर देते हैं। सेक्स-विषयक 
प्रसंगों में वे काफ़ी कुछ लिख जाते हैं, पर जो नहीं लिख पाते उसके लिए गेंद सुधी-समीक्षकों के पाले में 
डाल जाते हैं - 'है कलम बंधी स्वच्छंद नहीं' वाले अंदाज़ में। मुझे लगता है कि जोशीजी ने अपने साहसि
क पूर्ववर्तियों के कड़वे तजुर्बे से बहुत-कुछ सीखा है - इस तरह के आरोप नज़ीर अकबराबादी और मंटो 
से लेकर तमाम आंचलिकों पर तो लगाए ही गए, सुरेन्द्र वर्मा जैसे समकालीनों को एक हद तक नज़रअंदा
ज़ करने के पीछे भी वही समझ हो सकती है। अपनी बात जोशीजी के मार्फ़त पुष्ट करने के लिए एक
 आख़िरी लंबे उद्धरण की इजाज़त चाहूँगा, जिसमें उनका अपना राजनीतिक रुख़ भी साफ़ हो जाता है:

नायक के पौरुष के आगे प्रश्नचिह्न-सा लगा होने के बावजूद सैद्धांतिक स्तर पर यह शंका 
उठ सकती है कि यह कथानक परुषसत्तात्मक हुआ जा रहा है। अस्तु, नायिका की ओर से कुछ निवेदन करने 
की अनुमति चाहूँगा। किन्तु कुछ और कहूँ, इससे पूर्व यह स्वीकार करना अपना कर्त्तव्य समझता हूँ कि 
नायिका के निरूपण में मेरा स्वयं पुल्लिंग होना बाधक है।
इस विषय में हुए साहित्यिक शास्त्रार्थ में से तीन स्थापनाओं का उल्लेख कर देना श्रेयस्कर होगा।पहली 
यह कि पुरुष अपने साहित्य में स्त्रियों की भूमिका सीमित रखते हैं और उस सीमित भूमिका का निरूपण 
भी पुरुषसत्तात्मक मानकों के अनुसार करते हैं। दूसरी यह कि हिन्दी कथाकार नारी को पूज्या मानते 
हैं(कभी पुष्प-गन्धाक्षत और मन्त्रोच्चार से, कभी लात-घूँसे और गाली-गलौच से), अतएव उस सामान्य 
नारी का निरूपण करना उनके लिए असंभव है जो न चण्डी है, न रण्डी। तीसरा यह कि हिन्दी-लेखक 
का सहवास का अनुभव इतना सीमित और दरिद्र होता है कि अपने में यही अनंत आश्चर्य का विषय है 
कि नारी पर लिखने के लिए उसका कलम भी कैसे उठ पाता है।
कलम किसी तरह उठ ही गया है तो नायिका के संदर्भ में कुछ लिखना ही होगा। (पृ. 78)


ज़ाहिर है कि जोशीजी परंपरा को प्रश्नांकित करते हुए ख़ुद को भी सर्वज्ञता की निर्भ्रम कोटि में 
नहीं रखते। अपने दृष्टिकोण को पाठकों के रू-ब-रू खोल कर रख देते हैं। हिचकिचाहट दर्ज करने के बाद 
दैहिक विषयों में भी पूरे मनोयोग से लगते हैं, उन्हें 'भदेस' की पराकाष्ठा तक ले जाते हैं - चाहे वह 
बेबी का अपने 'लफड़-दफड़ बूबुआ' से लाड़-भरी नाराज़गी का प्रसंग हो, या गुलनार की संयत पेशेवर
 कार्यशीलता के साथ-साथ उसकी बिंदास दैहिकता के प्रति बौद्धिक डीडी की असहजता या फिर मंदि
र के पास उस सुरम्य पवित्र स्थल पर बेबी-डीडी का एक-दूसरे को देखते-दिखाते हुए पेशाब करना, जि
सका अंत 'लतावेष्टिक' आलिंगन में होता है - इन प्रसंगों में जुगुप्सा कहीं नहीं, हास्य-रसाभिषिक्त 
वर्णन है क्योंकि सेक्स के चित्रण को जोशीजी उसके नैसर्गिक अटपटेपन और हमारे 'लाटे' नायक के अना
ड़ीपन के साथ प्रस्तुत करते हैं। शायद यह भी अहम है कि नायक-नायिका का झगड़ोपरान्त बिछोह बि
स्तर पर ही, ऐन पराकाष्ठा के बिंदु के पहले नायिका के उघड़े बदन पर नायक द्वारा चादर डाल देने 
पर होती है। चादर डालने का यह क़िस्सा भी जोशीजी ने रघुवीर सहाय की असली ज़िन्दगी से उठाई 
है।6 परन्‍तु इस चदरिया को वह कितना खींचते हैं, ग़ौरतलब यह है। इस एक चादर के वितान में जैसे 
पूरा सभ्यता-विमर्श लिपटा चला आता है - नेहरू की पंचवर्षीय योजना से लेकर गांधीजी के क़ब्ज़ तक, 
कामायनी से लेकर गोदान तक, ब्रह्मबीजीय सृष्टि-मिथक से लेकर 'बिग बैंग' तक। और क़िस्सागोई
 ऐसी कि इन सारे कार्य-कारण घटकों को कहानी की वैकल्पिक परिणतियों की कसौटी पर कसकर छाँ
टते हुए चादर द्वारा लाज-ढँकाउ अंत के चुनाव के औचित्य से जोड़ देने का करतब दिखाते हैं। निवेदन है 
कि मेरी जानकारी में जोशीजी के पहले इतनी अर्थच्छायाओं वाली चादर सिर्फ़ कबीर ने ओढ़ी थी या 
फिर समकालीनों की बात करें तो मात्र सलमान रुश्दी ने मिड्नाइट्स चिल्ड्रेन में छेदिल चादर के पर्दे 
के पीछे इतने असरदार जादुई तमाशे का आयोजन किया है।

बहरहाल, जोशीजी इस प्रेम-कहानी का पटाक्षेप यहीं नहीं कर देते, शॉट फ़्रीज़ न करके उसे आगे बढ़ा 
देते हैं। ऐसे परिपाटी-पोषित अंत उन्हें पसंद नहीं, जिनसे पाठक सीधे-सादे सुखांत का सुख उठाए या 
दुखांत की सुखमय पीड़ा झेले। बल्कि यह कहानी जहाँ ख़त्म होती है, वहाँ से एक 'सीक्वेल' का भी 
बख़ूबी आरंभ हो सकता है। पर मैं इस तरह की भाषा का इस्तेमाल यहाँ सिर्फ़ इसलिए कर रहा हूँ कि 
अपने पाठकों का ध्यान कैमरे से लिखे गए इस उपन्यास की ओर खींच सकूँ। रेणु के बारे में किसी सुधी
 समीक्षक ने सही फ़रमाया है कि उन्होंने हिन्दी भाषा को पार्श्व-संगीत दिया। उसी तर्ज़ पर कहा 
जा सकता है कि जोशीजी ने अपनी कहानियों में कई मौक़ों पर सिनेमाई मंज़रनामे लिखे और इस 
तरह हिन्दी को एक अभिनव, चलचित्रोपम, मुहावरा दिया। 'चालीस दिनों की शूटिंग' में समाप्त 
कसप में इसके नायक के अपने प्रशिक्षण व व्यवसाय के अनुरूप कथात्मक काव्यात्मकता है तो सिनेमाई ना
टकीयता भी। अक्सर वर्तमान-काल में घटती घटनाएँ हैं, पर उन्हें अलग-अलग कोणों से देखती आँखें है,
 जो दृश्य-बंध बनाती चलती है। आँखों से आँखों के बनते त्रिकोण हैं, तो उनको तोड़ते कट भी हैं। दृश्यों 
का संपादन तो पाठकों व सुधी समीक्षकों को बता-बताकर किया ही गया है। मैं जो पहला सीन
 अपकी स्मृति में री-प्ले करने की इजाज़त चाहूँगा वह है डीडी द्वारा नारियल न लिए जाने वाला,
 जिसमें लॉङ्‍ग शॉट भी है, क्लोज़ अप भी, लोग-बाग तो रस्मी संवाद बोल ही रहे हैं, पर बीच में
 शास्त्रीजी द्वारा देने और नायक द्वारा न लेने के चलते एक गोला भी लुढ़क रहा है सीढ़ियों से नारि
यल का, बैटलशिप पोटेंप्किन के मशहूर ओडेसा-स्टेप्स के दृश्य की तरह, पीछे से सीढ़ियाँ उतरती 
नायिका के पाजेब भी बज रहे हैं, और जैसा कि मैंने ऊपर कहा, नयन-कोण तो बन-टूट ही रहे हैं।(पृ. 
148-49). या फिर इसके फ़ौरन बाद होल्डॉल पर एक-दूसरे से पीठ-टिकाए बैठे मौनव्रतधारी पर 
स्लेट-संभाषण-रत नायक-नायिका का ही दृश्‍य याद कीजिए जिसमें बात नींबू-भक्षण से शुरू होकर 
ओंठ-भक्षण की ओर जाती है:

और जब नायिका ने लगभग काट दिया है उसका निचला ओंठ, नायक अनुभव कर रहा है कि नीहारिकाओं 
के मध्य जो है झंझावात, उसी की सहानुभूति में झंकृत हो उठा है मेरा समस्त स्नायु तंत्र।

एक-दूसरे को टोहते-टटोलते इन दो को, जो एक हो जाना चाहते हैं, किसी बात की सुध नहीं है, 
किन्तु मैं आशंकित-सा देख रहा हूँ इस कक्ष के द्वार को, जिस पर यह गन्दा-सा पर्दा पड़ा है।

कहीं कोई इन्हें देख न ले!

और कोई नहीं देख रहा है - इस तथ्य से आश्वस्त होने के बाद मैं अपनी आश्वस्त मुद्रा पर स्वयं हँसता 
हूँ। उसने तो देखा ही होगा और कितनी तो ईर्ष्या है उसके मन में, अपनी ही माया से।

अधिक भौतिक धरातल पर यह कि इस कमरे में बाहर से कोई आ रहे हैं। उनकी आहट पाते ही ये एक-दूसरे 
से अलग हुए। गुड़िया देखकर सकपकायी, उसके पीछे से आती पड़ोस की लड़कियाँ मुस्कुरायीं। पूछा गुड़िया 
ने स्वयं लजाकर, "ये क्या हो रहा है?"

"गणित सीख रही हूँ।" कह रही है नायिका स्लेट दिखाकर और हँस रही है। गुड़िया और लड़कियाँ पढ़ 
रही हैं गणित का विचित्र-सा सवाल - "चखा नहीं तो कैसे मालूम?"

अब आप ही देख लीजिए साहब कि फ़िल्म की पूरी रिहर्सल हो चुकी है या नहीं, चुंबन वग़ैरह के दृश्य से 
ही बोल्ड शुरुआत है, जो आजकल तो सेंसरवाले भी पास कर ही देते हैं, बस अपना कैमरा उठाइए और शूट 
कर लीजिए। इतना ख़याल रहे कि इस दृश्यावली में लेखक भी मौजूद है, अपनी तमाम भाव-भंगिमाओं के 
साथ, सो दूसरा कैमरा उस पर भी होगा। कैमरे में अगर क़ैद नहीं हो सकती तो वह निराकार आँख जो 
सर्वदर्शी ईश्वर की है, जिसको लेखक-दिग्दर्शक पूरी स्क्रिप्ट के दौरान जोशीजी यथासंभव
 जलाते-भुनाते और जला-कटा सुनाते रहते हैं, पर हिन्दी सिनेमा में तो अदृश्‍य    को दृश्‍य  मान 
करने के लिए पार्श्वसंगीत का युक्तिसंगत विधान है ही, लिहाज़ा आप आकाशवाणी करा दें कि:

ख़ुदा भी आसमाँ से जब ज़मीं पर देखता होगा...!

तो यह है जोशीजी का फ़न, उनकी ख़ुदी की बुलंदी, जिसका एक ट्रेलर ही मैं यहाँ पेश कर पाया हूँ, 
अपनी सर्जना-शक्ति के बूते जो ईश्वर तक को मसख़रा साबित कर देता है, जो क़ब्र में लेटे मंटो की 
तरह यह सोचने का साहस करता है कि हम दोनों में बड़ा कथाकार कौन है। प्रश्न याकिवादी है - 
वह परम-लीलाकार याकि यह 'बदमास' जोशी!

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संदर्भ-

1 मनोहर श्याम जोशी, रघुवीर सहाय: रचनाओं के बहाने एक स्मरण, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 
2003.

2 http://www.wikipedia.org/metafiction

3 भारत यायावर(सं.) मैला आँचल: वाद-विवाद और संवाद, आधार प्रकाशन, पंचकूला, (हरियाणा), 
2006.

4 भारत यायावर(सं), मैला आँचल के कुछ आलेख.

5 रोलाँ बार्थ, अ लवर्स डिस्कोर्स: फ़्रैग्मेण्ट्स, फ़्रासीसी से अनुवाद: रिचर्ड हावर्ड; हिल ऐण्ड 
वाङ, 1977.

6 मनोहर श्याम जोशी, रघुवीर सहाय


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