[दीवान]second posting
girindra nath
girindranath at gmail.com
Tue May 1 19:38:06 IST 2007
सिलिंग अभियान के पिछे की बातों को रखने के लिए पहले धन्यवाद्. जहां तक
अलग-अलग पार्टियो की इस अभियान को लेकर पकती खिचडियां थी उसे तो सब जानते
ही हैं.खासकर मीडिया के रोल को लेकर काफी बातें सामने आ सकती है.आशा है
कि आपकी अगली पोस्टींग इसी के आस पास घुमेगी और कई बातो को सामने
प्रस्तुत करेगी.
गिरीन्द्र
www.anubhaw.blogspot.com
On 5/1/07, ajeet dwivedi <dajeet at gmail.com> wrote:
> दिल्ली की सीलिंग और यमुना पुश्ते के विस्थापन के मीडिया कवरेज पर दूसरी किश्त
> दोस्तो दिल्ली में अवैध निर्माण तोडने और सीलिंग लागू करने के अभियान की मीडिया
> कवरेज यमुना पुश्ते पर हुये विस्थापन की कवरेज से किस तरह और कितना भिन्न है
> इसे समझने के लिये यह जानना जरूरी है कि ये दोनों घटनायें क्यों और किन
> परिस्थितियों में शुरू हुईं. इसके साथ-साथ यह जानना भी जरूरी है कि आखिर इससे
> सबसे अधिक प्रभावित होने वाले लोग कौन हैं.
> सबसे पहले सीलिंग की बात करते हैं. २००५ के साल में दिसंबर का महीना था. दिल्ली
> की सर्दी अपने पूरे शबाब पर थी. तभी अदालत के फरमान से दिल्ली में सीलिंग की
> शुरुआत हुई. वैसे दिल्ली के अवैध निर्माण को लेकर कई याचिकायें काफी पहले से
> दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित थीं. दिसंबर २००५ में सुनवाई के बाद अदालत ने सख्त
> रुख अख्तियार करते हुये आदेश दिया की अवैध निर्माण तोडने की प्रक्रिया तत्काल
> शुरू कि जाये और सारे अवैध निर्माण जिनकी सूची दिल्ली नगर निगम यानी एमसीडी के
> पास है उन्हें एक महीने के भीतर तोड दिया जाये. १८ दिसंबर २००५ को एमसीडी ने
> दिल्ली पुलिस की मदद से अवैध निर्माण तोडना शुरू किया. इस अभियान से पूरी
> दिल्ली में हंगामा मच गया. यह एक दोहरा अभियान था, जिसमें न सिर्फ अवैध निर्माण
> तोडा जाने वाला था, बल्कि रिहायशी इलाकों में चल रही कारोबारी गतिविधियों को भी
> बंद किया जाना था. अवैध निर्माण और रिहायशी इलाकों में कारोबारी गतिविधियां
> चलाने वाले वे लोग थे, जिनकी सामाजिक-आर्थिक स्थितियां इतनी बेहतर थीं कि वे
> अवैध काम कर सकते थे. दिल्ली में रहने वालों को पता है कि यहां कोई भी अवैध
> निर्माण करना कितना कठिन होता है. इसके लिये हमेशा आपके साथ रहने का दावा करने
> वाली दिल्ली पुलिस को साधना होगा, एमसीडी के अधिकारियों को पटाना होगा, फिर
> पानी और बिजली वाले विभाग के अधिकारियों को भी किसी न किसी तरह से साथ मिलाना
> होगा तब जाकर बात बनेगी. ये सारे काम या तो पैसे के दम पर होंगे या किसी बहुत
> ऊंची पैरवी के दम पर. बगैर किसी पक्के आकलन के कहा जा सकता तमाम या ज्यादातर
> अवैध निर्माण उन लोगों के थे, जिनके पास अवैध और अनाप-शनाप पैसा है. क्योंकि
> अपनी मेहनत की कमाई को अवैध निर्माण मे नहीं लगाता, दूसरे कोई बैंक अवैध
> निर्माण के लिये कर्ज भी नहीं देता. इसलिये जाहिर है कि अदालत के निर्देश पर
> शुरू हुये इस अभियान का नकारात्मक असर इस महानगर के अगर सबसे प्रभावशाली नहीं
> तो कम से कम प्रभावशाली वर्ग के उपर पडना था और कायदे से अगर ये अभियान चलता
> रहता तो दिल्ली के भू माफिया, बिल्डर लाबी, भ्रश्ट अधिकारियों और नेताओं का
> गठजोड उजागर हो जाता. इससे स्पश्ट है की जिन लोगों को इस अभियान से नुकसान होना
> था वे ऐसे लोग थे जिनके हितों को बचाने की जिम्मेदारी नेताओं, अधिकारियों और
> काफी हद तक मीडिया की भी थी.
> जो लोग इस अभियान के खिलाफ सडकों पर उतरे उन्हें देखकर तस्वीर और साफ हो जाती
> है. भाजपा नेता सबसे प्रमुखता से सडक पर उतरे. कांग्रेस के नेता चाह कर भी ऐसा
> इसलिये नहीं कर पाये क्योंकि दिल्ली और केन्द्र दोनों जगह उनकी सरकार थी. लेकिन
> परदे के पीछे से उन्होंने यह व्यवस्था कर दी कि यह अभियान दम तोड दे. सीलिंग का
> शिकार हो रहे वर्ग और उसके खिलाफ खडे लोगों के हित एक थे और चूंकि मीडिया के
> हित भी इसी वर्ग से जुडे हैं (प्रत्यक्ष भी और परोक्ष भी) इसलिये इस विरोध को
> इतना मुखर स्वर मिला.
> पुश्ते के विस्थापन की स्थितियों, उससे प्रभावित हो रहे लोगों की वर्गीय
> हैसियत, इसके प्रति सीलिंग के विरोध में खडे वर्ग का नजरिया और उसमें मीडिया की
> भूमिका पर अगली किश्त बहुत जल्दी.
> अजीत द्विवेदी
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