[दीवान]शहाबुद्दीन और उसके बाद का बिहार

reyaz-ul-haque beingred at gmail.com
Wed May 9 02:40:05 IST 2007


 समाज की अपनी एक गति होती है. वह बुरी चीज़ों को बहुत देर तक स्वीकर नहीं करता.
उसमें अच्छे को बुरे से अलग करने की एक प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है. इतिहास
का कूडे़दान यहीं आकर प्रासंगिक बनता है. एक समय था जब डान और अपराधी अपने समाज
में बडी़ प्रतिष्ठा के साथ सामने आये. कुछ जातियों ने उनमें अपनी जातिगत पहचान
भी तलाश की. मगर अब वह दौर लगता है कुछ कम हो रहा है. अब वह स्वीकृति उतने
निर्बाध तरीके से नहीं मिल रही है बाहुबलियों को. मगर यह भी नहीं है कि यह एकदम
खत्म ही हो गया है. वे अब भी हैं और अपनी जगहों पर मज़बूती से जमे हुए हैं.
शहाबुद्दीन को सज़ा सिर्फ़ उनके घटते रुतबे को दरसाती है. मगर हमारा यह कहना भी
है कि इस सज़ा से ज़्यादा उत्साहित होने की ज़रूरत नहीं है. हमारी व्यवस्था का जो
चरित्र है उसमें अंतत: वे बच निकलेंगे. यह व्यवस्था सिर्फ़ अपने विरोधियों को
सज़ा देने में यकीन रखती है, 'अपनों' को नहीं. शहाबुद्दीन जो भी हों, उसके अपने
ही हैं. वह उसका बाल भी बांका नहीं होने देगी, जैसे वह पंढेर का नहीं होने दे
रही है. खैर देखते हैं अनिल जी क्या कह रहे हैं.
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