[दीवान]कुसूरवार

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Wed Sep 19 02:24:38 IST 2007


जी कल्याण राव का नाम पहली बार तब सुना जब दो साल पहले उन्हें आंध्र प्रदेश
सरकार ने गिरफ़्तार किया था. उनके साथ कवि वरवर राव भी गिरफ़्तार किये गये थे.
पिछले साल किसी पत्रिका में यह कहानी पढी- उसी के आसपास प्रभात खबर में यह
कहानी छपी भी. तेलुगू के प्रख्यात कथाकार-लेखक और विरसम के अध्यक्ष
कल्याण रावकी एकमात्र रचना जो हमने पढी़ है. लीजिए, आप भी पढिए और याद
कीजिए कि हिंदी में
ऐसी कोई कहानी अंतिम बार कब पढी थी आपने. रीढ़विहीन लेखकों से भरी पडी़ हिंदी
आखिर कब तक उन्हें ढोती रहेगी?

कुसूरवार

जी कल्याण राव

जीना पाप नहीं है. जिंदगी जीने की चाह भी कोई कुसूर नहीं. जिंदगी के बारे में
इस बात को किसी बड़े बुद्धिजीवी या विद्वान के मुंह से सुनने की जरूरत भी नहीं
होती. यह कोई ऐसा बड़ा विषय भी नहीं कि कोई महात्मा आकर इसे हमें समझाये या
किसी ऊंचे मंच से तालियों के बीच आकर कोई लोग इस पर भाषण झाड़े.
आप जीने की चाह करते हैं. आपके चारों ओर जो लोग रहते हैं, वे भी जीने की चाह
करते हैं. ऐसा करके आप या वे कोई पाप नहीं करते, कोई कुसूर नहीं करते. आप ही की
तरह मैं भी जीना चाहती हूं. मेरा पति भी जीना चाहता है. लेकिन हम जिस तरीके से
जीना चाहते हैं, वह सामान्य से थोड़ा अलग है. हो सकता कि वह तरीका इस या इस
जैसी किसी सरकार को अच्छा न लगे. पर इन्हें अच्छा न लगने मात्र से न तो जीने का
वह तरीका दूषित कहा जा सकता है और न ही हम कुसूरवार करार दिये जा सकते हैं.
मुझे मालूम है, मेरे नाम को वे तीन बार पुकारेंगे. तीसरी बार जब पुकारा जायेगा,
मैं अंदर जाऊंगी. तब तक कठघरे में जो एक चूहा रहता है, वह मुझे देख कर भाग गया
होगा. मुझसे कुछ बुलवाने के लिए वे जोर आजमाइश जारी रखेंगे. लेकिन मैं कुछ नहीं
बोलती. कोई बात नहीं करती. इसलिए नहीं कि मुझे बोलना नहीं आता. इसलिए कि अब तक
मैंने जो कुछ भी कहा है, वह सब रिकार्ड किया गया है. इन चूहों के बीच, इनकी
चिल्लपों के बीच भेड़िया न्याय के लिए मेरी बातों को रिकार्ड किया गया है. वही
बातें मैं बार-बार दोहराना नहीं चाहती. बोलने से क्या फायदा?
मैंने इन्हें कई बार बताया है कि मैं जीवन से प्यार करती हूं. साथ ही जीवन
मूल्यों को. स्वयं जीवन के अस्तित्व को ही नष्ट करनेवाली इस व्यवस्था से नफरत
करती हूं. प्यार की खातिर जीना चहती हूं. नफरत की खातिर जीना चाहती हूं. लोगों
से प्यार करना दोष नहीं. शोषण से नफरत करना पाप नहीं. सारी धरती पर इससे बढ़ कर
मूल्यवान बात और क्या हो सकती है? ये बातें काफी हैं, मुझे रिहा करने के लिए.
मुझे अपने मुन्ने के पास जाने देने लिए, जिसे मैं बेहद प्यार करती हूं. अपने
पति की कब्र पर एक छोटा-सा गुलाब का पौधा लगा देने के लिए. मुझे मेरे अपनों के
साथ जीने देने के लिए. लेकिन मुझे मालूम है, वे ऐसा अवसर नहीं देंगे. मुझे वे
फिर उसी अंधेरी कोठरी में ...
कम से कम इतना भी कर देते तो अच्छा होता कि जिस कोठरी में मेरे पति को बंद रखा
था, उसी में मुझे भी बंद कर देते. वह कोठरी भी तो अभी खाली पड़ी है. उसकी
दीवारों पर उसके द्वारा अपने लहू से लिखे क्रांति के नारे अभी वैसे ही हैं. वह
तो मुझे काल कोठरी ही लगती है क्योंकि वहां तो मेरे पति के अद्भुत सपने संजो कर
रखे हुए हैं. वहां पर जिस स्वप्निल चांदनी की वर्षा होती रहती थी, उस चांदनी और
उस प्रकाश को मैं अब भी महसूस कर सकती हूं.
दूर-दूर तक फैले समुंदर के पानी के किनारे, बहुत बड़े और विस्तृत भूखंड में
फैले लंबे-लंबे पड़ों के बीच रेतीले टीलों के किनारे एक छोटा-सा गांव था. इलाके
के दूसरे गांवों की तरह वह गांव भी बहुत गरीब था. हमारी पहली मुलाकत उसी गांव
में हुई थी. उस समय हमारे ऊपर आसमान और सामने जैसे रोता हुआ समुंदर. पीछे ताड़
के पत्तों के छोटे-छोटे घरों में टिमटिमाते दीये जल रहे थे. उस समय उसने जो कुछ
कहा था वे बातें मेरे सीने पर लिखी हैं.
`प्रकाश देनेवाला सूरज, चांदनी देनेवाला चंदा और सबको अन्न देनेवाली यह धरती-ये
तीनों दोषी हैं. मनुष्य मात्र के लिए दोष मैं भी कर रहा हूं. अगर तुम भी इस दोष
की भागीदार बनो तो हमारा स्नेह स्थायी बन सकता है.'
ये थीं उसकी बातें. मैंने कहा-प्यारे दोस्त, तुम्हारे इस संघर्ष का आधा भाग मैं
हूं. ऊंची लहरों की तरह प्रवाहित होनेवाले मानव जीवन प्रवाह में मैं भी जी रही
हूं. कितना भी मजबूत बांध बना कर जिस तरह समुद्र का प्रवाह नहीं रोका जा सकता,
उसी तरह प्रतिबंध और दमन के बल पर इस जीवन संघर्ष को भी नहीं रोका जा सकता. जब
संघर्ष रोका नहीं जा सकता तो मेरा यह जीवन भी झुकनेवाला नहीं. यह जीवन अजेय है
इसलिए कि यह जीवन है. जीवन होने के नाते यह अजेय है. और यह जीवन मृत्यु से बहुत
बलवान है. अगर उसे किसी एक जगह दबा भी दिया जाता है तो दूसरी जगह यह जमीन फाड़
कर ऊपर आ जाता है.'
जब मैंने यह सब कहा तो उसने मुस्कराते हुए मेरी तरफ देखा. उसने मेरा हाथ थामा.
समुंदर के पानी से भीगी रेतीली पगडंडियों पर हमारे कदमों ने जो निशानियां
बनायीं, वे मेरे मन में अंकित हो गयीं.
अगर आपका जीवन पर से भरोसा उठ गया है तो गांधी मार्ग के 16 नंबर का दरवाजा
खटखटाइए. वहां के पुलिस अफसर से पूछिए कि पार्वती की चीजें कहां रखी हैं. पर
पुलिस आपको उन चीजों को दिखायेगी नहीं. अगर भूल से दिखा भी दिया तो उनमें एक
फोटो आपको दिखेगा. उस फोटो के पीछे लिखे अक्षरों को पढ़िए-`जीवन हमेशा सुंदर
रहा है. संघर्षरत जीवन और भी सुंदर होता है. इसीलिए हमारी यह मुलाकात इतनी
सुंदर है.'
महीने का यह आखिरी दिन है. मैं अपने पति का इंतजार करती उसकी राह देख रही हूं.
उसे 10 बजे तक आना था. पर देर से आना या ज्यादा काम पड़े तो एक -दो दिन घर न
आना कोई नयी बात नहीं है. लेकिन उस दिन तो उसे जरूर आना था. मैं एक-एक पल गिन
रही हूं. समय कटता नहीं है. एक-एक लम्हा भारी लग रहा है. क्रांतिकारी आंदोलन
में शामिल होने के बाद रात-रात भर अकेले रहना मामूली-सी बात हो गयी है. मुन्ने
के पैदा होने के बाद कुछ दिन तक तो अकेले होने पर रात-रात भर उससे बातें करते
ही गुजार देती. वह सोता तो उसकी नन्हीं-नन्हीं हथेलियों को सहलाती रहती. जब मैं
ऐसा करती तो वह सोते-सोते ही मुस्कुराता रहता.
कुछ बड़ा होने पर मुझे मालूम हुआ कि पुलिस ने मेरी बड़ी बहन के घर पर हमला
किया. बहन और बहनोई को भी छह-छह महीने जेल काटनी पड़ी. मालूम नहीं अब मेरा
मुन्ना कहां है. शायद वह भी चांद और सूरज की तरह ही कुसूरवार है.
मुरगे ने पहली बांग दी. कड़ाके की ठंड है. बाहर पत्तों पर टप -टप गिरनेवाली
बूंदों के शब्द सुनाई पड़ रहे हैं. इतने में दरवाजा खटखटाने की आवाज हुई.
`पार्वती'- कोई पुकार है.
मेरा पति मुझे कभी भी` पार्वती' नहीं पुकारता था. वहां मेरा नाम परमिला है.
दरवाजा खटखटाने का तरीका भी एक दम अलग है. कौन हो सकता है? अभी सोच ही रही थी
कि दरवाजा तोड़ कर 10 पुलिसकर्मी उस छोटे से कमरे में घुस आये. मेरे दोनों हाथ
बांध दिये गये हैं. मैंने गुहार लगाने की कोशिश की तो एक पुलिसिये ने मेरे मुंह
पर ऐसा घूंसा मारा कि लगा जैसे मैं मर जाऊंगी. पुलिसियों ने उस छोटे से कमरे की
हर चीज को तहस-नहस कर दिया. कमरे में रखी सारी किताबों को सामने डाल कर वे बैठे
हैं. यह संदर्भ मुझे नया नहीं लगा क्योंकि ऐसी बातें हमे हमेशा सुनाई पड़ती
रहती हैं. सुबह एक साथी शहर से आनेवाला है. अगर वह यहां आता है तो पुलिस के हाथ
पड़ जायेगा. इसके अलावा मेरे पति को देने के लिए एक पत्र आया है जिसे मैंने एक
किताब में रखा है. अगर वह पुलिस के हाथ लग जाता है तो... होनेवाले अनर्थ की
चिंता होती है.
यह समय रोने-पीटने, हैरान होने या सोचने का नहीं है. झटपट कुछ करने का समय है.
मेरे हाथ बंधे हैं. मैं हाथों का इस्तेमाल नहीं कर सकती हूं. मेरा मुंह तो खुला
है. मैं जोर-जोर से बोलना शुरू क रती हूं. मैं कभी अश्लील बातें मुंह से नहीं
निकालती. पर उस समय मैं भद्दी और गंदी गालियां देने लगती हूं. गालियां देने पर
वे जानवर भी मुझ पर टूट पड़े और मुझसे अधिक जोर -शोर से गलियां देने लगे. साथ
ही मुझे मारने लगे. वे जितना जोर-शोर से गालियां दें, उतना ही अच्छा है. मैं
उन्हें जितना उकसा सकूं, उतना ही उच्छा है. क्योंकि मेरा पति आनेवाला है... और
शहर से साथी भी आनेवाला है. वे दोनों घर में होनेवाले इस शोर-शराबे को अगर सुन
लें तो भाग कर अपने को बचा सकते हैं. इसी मकसद से मैं पूरी ताकत लगा कर गालियां
दे रही हूं. मुझसे बढ़ कर जोर-शोर से गालियां वे भी बक रहे हैं. एक बूढ़ा सियार
मेरे पति के लिए मृत्यु के रूप में दीवार की आड़ में खड़ा इंतजार कर रहा है.
मैंने उसे भी गालियां देनी शुरू की हैं. वह हांफता हुआ मुझ पर आ गिरा. इसके बाद
क्या हुआ, मुझे मालूम नहीं लेकिन मैं जीवित हूं. समुद्र-तल से भींगी उन रेतीली
पगडंडियों पर मैं और मेरा पति, दोनों चल रहे हैं. अभी-अभी निकाले गये हमारे
फोटो के पीछे दोनों सही कर रहे हैं. मेरा नन्हा-मुन्ना नींद में हंस रहा है.
कितनी अदभुत है वह हंसी. मेरे पांवों को कोई खींच रहा है, कमरे में इधर-उधर
बिखरी चीजों से मेरे पैरों के लगने से अगर आवाजें निकलतीं तो कितना अच्छा होता.
वे जानवर मुझे गालियां दे रहे हैं. मुझे कुछ भी मालूम नहीं पड़ रहा है. इसके
सिवा और कुछ नहीं मालूम हो रहा है कि ... सारी दुनिया में मुझ जैसी बहनें पेट
के लिए कड़ी मेहनत कर रही हैं... कीचड़ में उतर कर धान की पौध रोप रही हैं. खेत
की मेंड़ों पर या पेड़ों की डालियों पर डाले झूलों में उनके बच्चे दूध के लिए
रो रहे हैं. ओ मेरे नन्हे-मुन्ने बच्चों, मैं तुम्हारे लिए मौत को गले लगा रही
हूं. मैं अपने आप से कह रही हूं कई बार..
वे मेरे नाम की पुकार लगा रहे हैं. अभी दो बार और पुकारेंगे. आपके और मेरे बीच
की दूरी नहीं है. चट्टान जैसे कलेजे पर लोहे के बूटों की लातें फिर भी यह सब
आपके और मेरे दरमियान बाधा नहीं बन सकता . मैं चुप हूं...
फिर भी... मैंने और मेरे पति ने जिस गांव को बेहद प्यार किया है. उस गांव के
लोगों. मैं तुम सबसे बातें कर सकती हूं. तुमलोगों की निगाहें मेरी निगाहों से
मिल रही हैं. वे दूसरी बार मेरे नाम की पुकार लगा रहे हैं. शायद अब मेरे
मुकद्दमे को खारिज भी कर सकते हैं. मुझे गोलियों से उड़ा भी सकते हैं.उनकी
मरजी.<http://bp3.blogger.com/__ZySD_hi8E4/RuyokJ4FRMI/AAAAAAAABEM/GsWB_Hq4iBI/s1600-h/SSB-456-1114.jpg>ओ
मेरे गांववासियों. हम दोनों तुम्हारे गांव में कहां से आये हैं, यह तुम्हें
मालूम नहीं फिर भी तुम लोगों ने हमें भरपूर प्यार दिया है. हमारे लिए मुट्ठी भर
चावल के दानों का इंतजाम किया है. थोड़ा-सा चावल-मांड हमारे लिए छुपा कर रखा
है. अपने फटे -पुराने बिस्तरों पर हमें जगह दी है. गरीबी से मारे तुम लोगों ने
अपने दिल में जगह दी है. हमारे लिए`सेंट्री' की ड्यूटी (पहरेदारी) की है. हमें
गले लगाया है. रोया है. कितने अद्भुत इनसान हो तुम लोग. तुम लोगों से प्यार
करना क्या कुसूर है? क्या इस कारण हम कुसूरवार होते हैं?
तुम लोगों से कुछ दूरी पर, उस पेड़ के नीचे दो बूढ़े बैठे हैं. तुम लोग उनको
नहीं जानते. वे मेरे मां -बाप हैं. पिता यीशू के भक्त हैं. उन्होंने मेरे लिए
आंसू बहाते हुए यीशू से शायद दुआ भी मांगी होगी. मेरी मां ने भी दुआ मांगी
होगी, लेकिन वे नहीं जानते कि हमारे ये शासक रोमन शासकों से भी ज्यादा दुष्ट,
अत्याचारी और जुल्मी हैं. मेरे मां-बाप से कुछ दूरी पर जो दो बूढ़े बैठे हैं.
वे मेरे माधव के माता-पिता हैं. माधव की मां, मेरी सास बड़ी निष्ठावान स्त्री
हैं. बिना स्नान -पूजा के खाना पकाती तक नहीं. फिर भी, मेरी सास मेरे पास आयी.
मेरे माधव ने जिन आंखों को बहुत प्यार किया था उन आंखों की तरफ अपलक देखती
रहीं. फिर उसने मेरे गालों को चूम कर मुझे अपने प्यार से सराबोर कर दिया.
तीसरी बार मेरे नाम की पुकार लगायी गयी है. लोहे के बूट मेरी बगल में ठक-ठक
शब्द कर रहे हैं. कोर्ट हॉल में मान्यवर आंखें मेरे लिए इंतजार करती होंगीं.
मैं अब जा रही हूं प्यारे, दोस्तों अब मैं रुख्सत होती हूं.
ओ मेरी मां. मेरे गालों पर एरंड का तेल मलनेवाली मेरी मां, मेरे गालों को
चूमनेवाली सासू मां, मेरे पिताजी, इस देश के करोडों-करोड़ लोगों में ही
तुम्हारे बच्चे हैं. इस देश की जनता की आखों में ही हमारी आंखों को देख लीजिए.
उनकी हंसी में हमारी हंसी छिपी मिलेगी...
जीना कुसूर नहीं है. जीने की चाह करना दोष नहीं है. हमने जीवन से प्यार किया
है, शोषण से नफरत की है. इसके लिए हम इस देश में कुसूरवार हुए हैं. इस तरह का
मूल्यवान और महत्वपूर्ण कुसूर हम जिंदगी भर करते रहेंगे.
अलविदा. कुसूरवार की कब्र पर गुलाब का पौधा लगाना भूलियेगा नहीं.


-- 
REYAZ-UL-HAQUE__________________________
prabhat khabar, old bypass road, kankarbagh, patna-20
Ph - 0612234881
- -
http://hashiya.blogspot.com
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