[दीवान]कारंथ पर हृषीकेश सुलभ
Ravikant
ravikant at sarai.net
Tue Aug 12 11:19:05 IST 2008
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Saturday, August 09, 2008
रंगायन : कारंथ पर हृषीकेश सुलभ
( कारंथ वट वृक्ष थे. उनका विरुद सैंकड़ों पन्नों में गाया जा सकता है. गाया गया भी है. सुलभजी ने
उनके रंग-व्यक्तित्व के महत्व का बखान यहाँ थोड़े में करने की कोशिश की है. इस क्रम में उनके बारे में
बहुत कुछ अनकहा-अलक्षित भी सामने आया है. बहरहाल, हमें खुशी है कि कुछ देर से ही सही उन्होंने
सबद के लिए स्तंभ लिखना शुरू कर दिया. वे भारतीय रंगमंच के मूर्धन्यों पर हर बार अपना लेखन एका
ग्र करेंगे. अगले रंग-व्यक्तित्व नेमिचंद्र जैन होंगे. )
बोयण्णा से बाबा तक का सफर
हृषीकेश सुलभ
भारतीय रंगमंच के दुर्लभ व्यक्तित्व ब. व. कारंथ का पूरा नाम बहुत कम लोगों को मालूम है। ब. व.
या बी. वी. कारंथ को बाद के दिनों में लोग ‘बाबा’ कहकर बुलाने लगे थे। बाबूकोड़ी
व्यंकटरामन कारंथ को बचपन में घर पर सब ‘बोयण्णा’ कहते थे। उन्हें अपनी सही जन्म तिथि नहीं मा
लूम थी। 19-09-1929 के बारे में उनका कहना था कि अंक 9 की पुनरावृत्ति के कारण इसे याद रखने
में सुविधा होती इसलिए इसे हाईस्कूल के फ़ार्म में भर दिया। बाद में उनकी माँ ने उन्हें बताया कि
उनका जन्म सन् 1928 में हुआ था।
कारंथ अपने रंगकर्म के लिए जितना जाने जाते हैं, उतना ही अपनी यायवरी और अपने व्यक्तित्व
के विरोधाभासों के लिए भी। वह एक जगह टिक कर कभी नहीं रहे। वह निरंतर बेचैन रहते। हमेशा
लगता, जैसे उनके भीतर कोई हाहाकार मचा हो। इसी आकुलता ने उन्हें स्थान, काल और अपनी ही
रचनात्मकता का अतिक्रमण कर जीने और रचने का हुनर और साहस दिया। उनके रंगकर्म की
तमाम विषिष्टताओं के सूत्र उनके विरोधाभासों में ही छिपे हैं।
कारंथ का जन्म मंगलूर के तटीय क्षेत्र के एक छोटे-से गाँव मंची में हुआ। केरल की सीमा पर कर्नाटक का
यह गाँव छोटी-छोटी पहाड़ियों और घने वृक्षों से घिरा है, जिनके शीर्ष से विशाल समुद्र के जादू को
निहारा जा सकता है। गाँव से कुछ मील की दूरी पर बहती थी नेत्रवती नदी। उन्होंने तीसरी कक्षा
में पढ़ते हुए ही अभिनय की शुरुआत ''भागवत और पंडित की मुठभेड़'' नामक नाटक में पुजारी की
भूमिका से की थी। फिर पुटप्पा के लिखे बाल नाटक मेरा गोपाल में अभिनय किया। आठवीं तक पढ़ने के
बाद पिता ने पढ़ाई बंद करा दी और एक ज़मींदार के घर पढ़ाने के काम पर लगा दिया। मंगलूर के इस
इलाके़ में यक्षगान की समृद्ध परम्परा रही है। पर्व-त्योहार, उत्सव-अनुष्ठान और जीवन के हर
व्यवहार में गीत-संगीत रचा-बसा था। इसी परिवेश से कारंथ ने लोक-संस्कार ग्रहण किया। इसी लो
क-संस्कार से उन्होंने अपने रंग-संस्कार को विकसित किया।
उनके इलाक़े में गुब्बी थिएटर कम्पनी नाटक करने आती थी। एक बार कम्पनी का नाटक देखने के लिए का
रंथ घर से भागकर मीलों दूर पुत्तूर चले गए थे। उन्हें बचपन में चोरी की लत लग गई थी। वह अपने गाँ
व में प्रतियोगिताएँ आयोजित करते और चोरी के पैसों से पुरस्कार बाँटते। यही कारण था कि पिता ने
पढ़ाई बंद करवा दी और गाँव से दूर ज़मींदार के घर पढ़ाने के काम पर लगवा दिया। कारंथ ने वहाँ
भी चोरी की और उन पैसों से संगीत और संस्कृत सीखा और साहित्य की पुस्तकें ख़रीदकर पढ़ना
शुरु किया। पर वह पकड़े गए और बहुत लज्जित हुए। फिर वह घर से भागकर मैसूर पहुँचे। उस समय मैसूर
में गुब्बी कम्पनी का प्रदर्शन चल रहा था। कारंथ गुब्बी कम्पनी में भर्ती हो गए। यहाँ उनके
रंग-संस्कार को संगीत की विविधताओं से तैयार नई ज़मीन मिली।
रंगमंच के लिए किसी भी प्रकार का शुद्धतावाद घातक होता है। यही कारण है कि रंगसंगीत के क्षेत्र
में अपनी प्रयोगधर्मिता से उन्होंने हर बार नया प्रतिमान स्थापित किया। उनका रंगसंगीत नाटक के
गर्भ से उपजता था और संगीत की पारम्परिकता का अतिक्रमण कर रंगभाषा में तब्दील हो जाता था।
कई बार उन्होंने पारम्परिक वाद्यों को छोड़कर मंच-सामग्री से संगीत घ्वनियों की रचना की। उन्हों
ने थिएटर में संगीत के स्वतंत्र अस्तित्व को नकारते हुए उसके रंग और नाटकापेक्षी होने पर बल दिया।
उनके नाटकों में चरित्र के भावों की स्थिति को बनाए रखने के लिए संगीत का उपयोग हुआ है। उन्होंने
चरित्र की एकान्विति के लिए संगीत रचा। कुछ सालों तक इधर-उधर भटकने, हिन्दी प्रचारक बनने
और तरह-तरह के कामों में उलझे रहने के बाद कारंथ वाराणसी पहुँचे और विश्वविद्यालय में
पंडित हज़ारीप्रसाद द्विवेदी के छात्र हो गए। उन्होंने वाराणसी में ही पंडित ओंकारनाथ ठाकुर
से संगीत की शिक्षा प्राप्त की। एम. ए. करने के बाद शोधकार्य अधूरा छोड़कर उन्होंने राष्ट्रीय ना
ट्य विद्यालय में दाख़िला लिया। इस बीच प्रेमा से उनका विवाह हो चुका था। राष्ट्रीय नाट्य वि
द्यालय से प्रसिक्षण प्राप्त करने के बाद का उनका जीवन रंगमंच की दुनिया में एक खुली क़िताब की
तरह है।
एक बेचैन आत्मा की तरह भटकते हुए कारंथ का रिश्ता रचनात्मकता से हमेशा जुड़ा रहा। अपनी अस्थिर
प्रकृति के कारण उन्हें निरंतर आलोचना का सामना करना पड़ा। पर एक सच यह भी है कि इसी अस्थि
रता के बीच से वह अपने लिए हठ भी चुनते थे और कई बार उनके हठ ने उनसे महत्त्वपूर्ण काम करवाए।
प्रसाद ने हिन्दी रंगमंच को जो चुनौती दी थी, हिन्दी रंगमंच लम्बे समय तक उससे भयभीत रहा।
असफलता के भय से अधिकांश रंगकर्मियों ने प्रसाद के नाटकों को छूने का साहस नहीं किया। फलतः
प्रसाद के नाटकों को अमंचीय और दुरूह मान लिया गया।
कारंथ ने प्रसाद की इस चुनौती को स्वीकार किया और अपनी प्रयोगधर्मिता और रंगचेतना से उनके ना
टकों को फिर से आविष्कृत करने का प्रयास किया। उन्होंने सबसे ज़्यादा प्रसाद के नाटकों को मंचित
किया। स्कंदगुप्त का मंचन उनके जीवन की सबसे बड़ी सफलता थी। दर्शकों और उनके आलोचकों ने इसकी
मुक्तकंठ से प्रशंसा की। कारंथ ने स्कंदगुप्त के अलावा चंद्रगुप्त, विशाख और कामना को मंचित किया।
यक्षगान की रंगयुक्तियों के साथ रघुवीर सहाय द्वारा किए गए मैकबेथ के रूपांतर बरनम वन को मंचित
किया। इस मंचन ने लोक रंगमंच की युक्तियों के साथ आधुनिक रंगकर्म के सम्बन्धों पर चल रहे विमर्श
को नए आयाम दिए।
भारतेन्दु के नाटक अन्धेर नगरी के मंचन से कारंथ ने हिन्दी रंगमंच को नई त्वरा दी और अपने आलोचकों
को विस्मित किया। इस प्रस्तुति ने अपनी प्रतीकात्मकता और कल्पनाशीलता से नई अर्थछवियों को
दर्शकों तक संप्रेषित किया। कालिदास के नाटकों मालविकाग्निमित्र, विक्रमोवर्शीयम और कन्नड़ में
रघुवंशम को मंचित किया। कारंथ ने कन्नड़ और हिन्दी में लगभग सौ नाटकों के अलावा उर्दू, पंजाबी,
संस्कृत, गुजराती, मलयालम, तेलगू आदि भाषाओं में भी नाटकों को मंचित किया। वह बच्चों के रंगमंच के
प्रति भी बेहद संवेदनशील और उत्सुक थे। उन्होंने हिन्दी और कन्नड़ में तीस से ज़्यादा बाल नाटकों को
निर्देशित किया। प्रतिभा के धनी कारंथ को भोपाल में विवादों का भी सामना करना पड़ा, पर वह
इस आग में तपकर कुन्दन की तरह बाहर निकले और अपनी रचनात्मकता और गहरी संवेदनषीलता के बल
पर दर्शकों की आशाओं का केन्द्र बने रहे।
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