[दीवान]हिन्दी समाज का कोट और लंगोट कल्चर
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Thu Aug 21 15:08:01 IST 2008
परसों मैनेजर पाण्डेय ने कहा कि साहित्यिक गोष्ठियों में जो विषय रखे जाते हैं,
उसे कुछ लोग विषय के बजाय खूंटी समझ लेते हैं और उसमें कोट से लेकर लंगोट तक
लटकाने लग जाते हैं। इस मजाकिया अंदाज में बोलकर पाण्डेयजी भले ही थोड़ी देर के
लिए ऑडिएंस का ध्यान अपनी ओर खींचना चाह रहे हों लेकिन हिन्दी समाज की एक बड़ी
सच्चाई तो जरुर सामने आ जाती है।
हिन्दी समाज में साहित्यिक या फिर दूसरे विषयों पर बोलने वालों में एक बड़ी
बीमारी है जिसे आप कभी न बदलनेवाली लत भी कह सकते हैं कि वो दुनियाभर की बात
करेंगे। संभव है वो इतिहास, समाजशास्त्र और साइंस पर लम्बा बोल जाएं लेकिन उस
विषय पर कुछ भी नहीं बोलेंगे जिस पर बोलने के लिए उन्हें बुलाया गया है, जनता
जिन्हें सुनने के लिए गिरते-पड़ते १२- १४ किलोमीटर तक बस में धक्के खाकर आती
है। आत्म-मुग्धता के शिकार ये वक्तागण बार-बार ये साबित करने की फिराक में होते
हैं कि वो हिन्दी में भले ही हैं लेकिन उन्हें बाकी विषयों की भी उतनी ही गहरी
समझ है जितनी कि और लोगों को होती है। एक ही साथ कई विषयों पर सरमान अधिकार
साबित करने के चक्कर में ऑय-बॉय कुछ भी बोल जाते हैं। कहीं एक-दो अंग्रेजी
अखबार से रेफरेंस दे दिया, कोई रशियन या फिर फ्रेंच लेखक की एक-दो पंक्ति झोंक
दी।...और विद्वान कहलाने की दावेदारी ठोकने लग गए।
दिन-रात हिन्दी में ही आंख गड़ाए रखनेवाले श्रोता आतंकित होते हैं, प्रभावित
होते हैं और आंखे फाड लेते हैं। बीए और एमए के बच्चे तो एकदम से घबरा जाते हैं
कि- यहां बारह-चौदह घंटे हिन्दी पढ़कर पचपन प्रतिशत नंबर बनाना मुश्किल होता है
और येलोग हिन्दी में रहकर भी अंग्रेजी और फ्रैंच कैसे पढ़ लेते हैं। जो लोग
लेखक और लेक्चरर बनने की प्रक्रिया में होते हैं औऱ संयोग से वक्ता उन्हीं की
लॉबी का हो तो वे हो-हो करके एक स्वर में कहने लग जाते हैं- अरे यही तो इनकी
खासियत है, अंग्रजी उतना जानते हैं जितना कि एडहॉक में अंगरेजी पढ़ानेवाले लोग
भी नहीं जानते हैं। सभागार में भय और आतंक का महौल बनता है, वक्ता भीतर ही भीतर
मुस्कराते हैं, चलो कुछ तैयारी नहीं भी करके आने पर जादू चल गया। अघोरी वाला
काम किया है और अंदर ही अंदर मुदित हो रहा है कि तीर मार दिया है. कैसे इन
लोगों को घिन नहीं आती है कि सालों से एक ही माल को फेंट-फाट कर चला रहा है,
डिब्बा तक बदलने की जरुरत नहीं समझता।
कुछ रेगुलर और कुछ समझदार लोगों को सारी बातें तो समझ में आ जाती है कि वक्ता
वही सब बोलेंगे जो वो तय करके आए हैं, आयोजक चाहे जो भी विषय रख दे। हां ये बात
समझने में थोड़ी परेशानी जरुर हो रही है कि पाण्डेयजी ने कोट किसे कहा और लंगोट
किसे कहा।
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