[दीवान]कहानी मन में ही चुक सकती है
Ravikant
ravikant at sarai.net
Fri Aug 22 17:26:04 IST 2008
सबद से साभार
http://vatsanurag.blogspot.com/2008/08/blog-post_20.html
Wednesday, August 20, 2008
बही - खाता : संजय खाती
( सबद में कहानी को लेकर कोई बात नहीं हो रही थी। इस बाबत कुछ स्नेही बंधुओं ने उलाहना भी दि
या। हमने आश्वस्त किया था कि जल्द ही कथा की बात होगी। कथाकारों से आग्रह किया कि वे
अपनी रचना-प्रक्रिया पर एकाग्र गद्य हमारे पाठकों के लिए लिखें ताकि उनकी कथा-कहानी की कुछ
और सिम्तें खुलें। 'बही-खाता' नामक यह स्तंभ हम हिन्दी के महत्वपूर्ण कहानीकार संजय खाती से शुरू
कर रहे हैं। इनकी कहानियां बेसब्र प्रतीक्षा के बाद सामने आती हैं और चाव से पढ़ी जाती हैं।
'पिंटी का साबुन' और 'बहार कुछ नहीं था' दो संग्रह प्रकाशित हैं। )
कहानी मन में ही चुक सकती है
संजय खाती
रचना प्रक्रिया पर जितना मैं सोचता हूं, यह पहेली उलझती जाती है। जिस मन से हम रचते हैं, क्या
हम उसके स्वामी हैं ? जो हम रचते हैं, क्या वह हमारी कृति है ? जैसा कि हम जानते हैं मानव मस्ति
ष्क कुदरती विकास की देन है और अब इस बात के ज्यादा से ज्यादा सबूत साइंटिस्ट पेश कर रहे हैं कि
दिमाग का जो कोर है, वह लगभग स्वायत्त तरीके से काम करता है। एक मन अपनी प्रतिभाओं के साथ
हमें दे दिया गया है, जो माहौल से विकसित होता है और हम ज्यादा से ज्यादा जो कर सकते हैं, वह
यही कि उसे पहचानें और उसके खिलने के लिए माहौल तैयार करते रहें।
कला जब जन्म लेती है, तो क्या होता है ? आनंद ने जब कथा सुननी चाही, तो बुद्ध ने कहा था कि
मानवों की कोई कथा नहीं हो सकती, क्योंकि वहां दुःख ही दुःख है। देवताओं की भी कोई कथा नहीं
हो सकती, क्योंकि वहां सुख ही सुख हैं। यानी कहानी तभी हो सकती है जब सुख और दुःख के बीच की
कोई स्थिति हो, यानी कलाकार एक ऐसी भावभूमि का जीव होता है, जो मर्त्यलोक और देवलोक के
बीच कहीं अवस्थित है। हर कथा एक मानवीय दैवीय अनुभूति है, लेकिन वह धर्म नहीं है, क्योंकि वह
निर्वान की कामना नहीं कर सकती, क्योंकि उसे बीच के उस झुटपुटे में टिके रहना है -- अपने आनंद
और अभिशाप के साथ।
मेरी कहानी स्मृतियों से शुरू होती है -- किसी बिन्दु या विचार की तरह, जो किसी छवि की तरह
उभरता है। फिर उसे कथा में बदलना एक मानवीय श्रम है -- बहुत लंबा मानवीय श्रम। मैं कभी कोई
कहानी एक सिटिंग में एक ड्राफ्ट में नहीं लिख सका। मेरे लिए यह श्रमबहुल कार्य है, जिसे मैं भरसक
टालता हूँ, क्योंकि श्रम से दूर और आराम की तरफ भागना मन का सहज व्यवहार है। कहानी को मन
में बुनना जितना आनंददायक है, उतना उसे शब्दों में उतारना नहीं -- और कई बार यह हो सकता
है कि मन में ही उसका होना चुक जाए, आस्वाद पूरा हो जाए और कहानी कभी पैदा न हो सके। शा
यद यह कविता के ज्यादा अनुकूल है, लेकिन मैंने कथा को चुना है और इसलिए मुझे बार-बार विचार की
उस लौकिकता की ओर ख़ुद को धकेलना पड़ता है, जो श्रम शक्ति और समय की मांग करती है।
अपनी प्रेरणाओं में मैं बहुत से लोगों को पाता हूँ। लगभग सभी को जिनका लिखा और कहा मुझे किसी नए
विचार या अनुभव की रोशनी देता है। यहाँ तक कि जे के रोलिंग्स को भी, इसलिए कि बिना ओछे हुए
रहस्य का वितान गढ़ लेना एक दुर्लभ गुण है। मैं लगभग हर चीज़ पढ़ता हूँ, बल्कि साहित्य से ज्यादा,
क्योंकि विचार की दुनिया बहुत बड़ी है, उस पर साहित्यकारों की मनोपली नहीं है। असल खोज
अंतर्दृष्टि की है -- उस चाबी की, जो यथार्थ में एक सुराख बनाती है और हमें मानवता के मर्म की
झलक देती है। साहित्य ही नहीं, सारा ज्ञान-विज्ञान इसी खोज में लगा है। मेरा मानना है
कि साहित्यकारों को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि वे ही सारे सवालों का जवाब दे देंगे। उन्हें
ज्ञान के तमाम अनुशासनों से रोशनी चुरानी चाहिए और तब उसे जीवन से जोड़ने का काम करना चाहि
ए, जो सिर्फ़ वही कर सकते हैं। साहित्य मानवीय नियति का दस्तावेज़ है, लेकिन वह कोई टापू नहीं
है।
मैं उपन्यास नहीं लिख सका, जबकि कहा जाता है कि उपन्यास मानव नियति का आख्यान है। शायद यह
ग़लत है। मानव नियति की सबसे अच्छी पहचान हमें छोटी-छोटी बोधकथाएं कराती हैं। महाकाव्यों से
ज्यादा हमें दो लाइन की कविताएं और एक लाइन की सूक्तियां रास्ता सुझाती हैं। एक छोटा सा
चुटकुला संसार पर सबसे अच्छा कमेंट हों सकता है और व्यास और वाल्मीकि तमाम दैवीय सहायता के बा
वजूद एक लतीफा नहीं लिख सकते। मैं उसी सूक्ष्म और सरल की ओर लौटना चाहता हूँ -- कहानियों से
भी लघु कथा की ओर।
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