[दीवान]दिल्ली के कउआ ( लघुकथा ) - राजनन्दन

Ravikant ravikant at sarai.net
Wed Dec 24 17:23:57 IST 2008


अभी विजेन्दर ने अपने जनसत्ता के स्तंभ में ब्लॉग-जगत की बढ़ती भाषायी समृद्धि का ज़िक्र किया था. 
उसी सिलसिले में घूमते-फिरते भोजपुरी वेबसाइट भोजपत्र से साभार ..गोकि यह ब्लॉग नहीं है.  

http://www.bhojpatra.net/pathakrss.asp?a_id=112

रविकान्त

दिल्ली के कउआ (लघुकथा) - राजनन्दन  	

 
साहित्य विधा-वर्ग:: 	भोजपुरी कहानी 
विषय-वस्तु :: 	दिल्ली के कउआ (लघुकथा)
किसुना कबूतर अपना खोंता में दू गो बच्चा आ आपन मेहरारू का संगे चंपारण के चंपा वन में रहत रहे। खों
ता के रखवारी आ बच्चा लोगिन के संगहिरा के भार कबुत्तरी गउरी पर रहे आ ओह सभ प्राणी खातिर 
दाना-पानी जुटावे के भार असगरे किसुना पर।
जिनगी के गाड़ी आराम से चलत रहे,पहिया के धुरी में कवनो महत्वकांक्षा के तेल भा चिकनाई के जरुरत 
कबो महसूश ना होखे।
मगर समय-परिस्थिति केहु खातिर कबो एक जइसन ना रहेला,राजा-रंक,साधु-फ़कीर हर केउ के समय 
अजमावेला।
हिमालय के नदियन में जब पानी भरे लागल त बिहार में भारी तबाही लेके बाढ़ आ गईल। किसान लोगि
न के तइयार फसल,खेत-खरिहान आ सगरी धरती पानी में डूब गईल। लोग के घर-दुआर तक में पानी घुसि 
गईल त किसुना के भी दाना चुगे खातिर कवनो खाली धरती मिलल मुशकिल हो गईल। अब चार-चार
 जिउ खातिर दाना जुटावल किसुना पर भारी पड़े लागल।

सरकार के तरफ से पशु-पक्षी खातिर जे राहत आ सहायता राशन गिरावल जात रहे,ओह में से ज्यादा हि
स्सा आदमीय लोग हड़प के खा जात रहे। बाँचल-खोंचल आकाश के शेर कहावेवाला चील,बाज़,गिद्ध,कउआ 
आदि लोग झपटि लेत रहे। कबूत्तर,पंड़ुगी जइसन चिरई लोगिन के त चील, बाज़ जइसन पक्षियन से 
जानो-माल के खतरा रहेला एह से सरकारी राशन का तरफ एह चिरई लोगिन के देखहु के हिम्मत
ना होखे। बड़ी मुसीबत,उपास आ बईठारी के समय आ गइल रहे।

किसुना के एगो उपाय सूझल। काहे ना अन्हरा वन के सेठ उल्लूक महाजन से कुछ दाना
आ रुपिया-पइसा सूद पर कारजा लेके बाल-बच्चा खातिर रखि दिहल जाव आ तवले बिहार 
से बाहर जहवाँ बाढ़-पानी के समसिया नइखे उहवाँ से दाना चुग के ले आवल जाव। आखिर ई समूचा भारत 
देश त अपने बा। कहवों से कहवों आवे-जाए,दाना-पानी कमाए के अख्तियार त भारत के सरकार समान 
रुप से सभनी के देलहीं बिया। आबहीं जाए में न तनी मेहनत परेशानी बा दाना त मिलीये जाई।
इहे सभ बात सोंच विचारि के किसुना अन्हरा वन के सेठ उल्लूक महाजन से दुगुना ब्याज पर कारजा लेके 
रखि देलस आ बाल-बच्चा के ध्यान राखे खातिर आपन मेहरारू के समुझा-बुझा के आपन कुछ साथी-संघाती 
का संगे दाना-पानी के जोगाड़ मे दिल्ली के तरफ उड़ गईल।

उड़ते-उड़ते जब नखलऊ(लखनऊ)से कुछ आगा चहुँपल त पशु-पक्षी के बोली,बात-वेवहार आ हवा-पानी में कि
सुना के अंतर बुझाए लागल। कुछ पशु-पक्षी लोग के एह बात पर एतराजो रहे कि किसुना बिहार के 
कबूत्तर होके दिल्ली का तरफ काहे उड़ रहल बा। एह बात पर सबसे ज्यादा परेशानी कउआ लोगिन के 
रहे। काँव-काँव!...काँव-काँव!...
दिल्ली पहुँचत-पहुँचत केतना कउआ किसुना आ ओकरा संघतिया लोगिन पर आपन चोंच अजमा दिहले रहे। खैर 
केहु तरे बिहार के कबूत्तर लोग दिल्ली चहुँपल।
दिल्ली पहुँचि के एह लोगिन के पता चलल कि अगर इंहवा रहे के बा त कउआ लोगिन से दबिये के रहे के 
पड़ी। खोंता किराया पर मिलि जाई, आगे दाना-पानी खातिर मेहनत-मजूरी आ अवसर के कवनो कमी 
नईखे। जेतना जादा मेहनत ओतना जादा दाना इंहवा जुटावल जा सकत बा। मगर कउआ लोगिन के काँ
व-काँव... ... मजबुरी बा सहल जाई।

दिल्ली से पहिले बिहार में किसुना एक से एक धूर्त,चल्हाँक आ करिया-भूरिया कउआ देखले रहे मगर
 दिल्ली के कउआ ओह सभ पर बीस पड़त रहे। दिल्ली में किसुना के एगो आउर नया बात मालुम भईल कि 
दुनिया के सभ कउआ के रंग करिये ना होखे बलुक कुछ कउअन के रंग पठानी गोर भी होखेला।

समय के साथ किसुना जब दिल्ली में रम-गम गईल, कुछ रुपिया-पइसा हाथ में आ गईल त उल्लूक सेठ के का
रजा सधाके आपन मेहरारू,बच्चा सभनी के उड़ाके दिल्ली ले आइल। बचवन के नाम अंगरेजी इसकुल में 
लिखवा दिहल गइल आ सभे जनीं आराम से दिल्ली में रहे लागल। किसुना परिवार के देखि के दिल्ली के 
ढेर कउआ लोग काँव-काँव करे मगर बचवन सभ के पढे-लिखे, किसुना के दाना चुगे आ दिल्ली में एगो आपन 
खोंता किने से रोकल कवनो कउआ के कूवत भा वश में ना रहे।

पाँच बरिस बीत गइल मगर किसुना के समुझ में ई बात ना आइल कि बिहार के कउआ सभ त खाली गी
दड़,बिलाड,बिलाइ भा सँपनेउरीये के देखि के काँव-काँव करेला मगर ई दिल्ली के कउआ सभ कबूत्तर देखि 
के काहे चेंचिआला आ दुनिया के सभनी कबूत्तर के बिहारीये काहे बूझेला? आजुओ देखनीं ह दूगो 
यू.पी.वाला कबूत्तर के बच्चा इसकुल से लवटत देखि के पारक(पार्क)के बेंच पर बइठल दिल्ली के तीन-चा
र गो बूढ़ कउआ करत रहलें ह काँव-काँव!... काँव-काँव!...काँव..!!
बीच-बीच में हुँक्का के गुड़-गुड़ आ फेरु, काँव-काँव!... काँव-काँव!..काँव..


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