[दीवान]बिहारवाद बबुआ धीरे-धीरे आयी
avinash das
avinashonly at gmail.com
Wed Jan 16 15:35:11 IST 2008
*बिहारवाद बबुआ धीरे-धीरे
आयी*<http://mohalla.blogspot.com/2008/01/blog-post_2443.html>
उर्फ दिल्ली में एक अकेली लड़की
*अपराजिता की टिप्पणी** और उनका आशय जो भी रहा है, लेकिन सच यही है कि सभ्य
शहरी मन के लिए बिहार जैसी जगहों को लेकर एक डर तो है ही। इस डर की कहानी के
बहुत सारे पाठ होंगे, जिसकी जड़ें शायद बिहार से आये हुए कामगारों से जुड़ी
होंगी। ब्लॉगिंग को निहायत व्यक्तिगत गतिविधि के रूप में पारिभाषित करते हुए
इसकी सामूहिक चेतना पर व्यंग्य और शक करने वाले
**मसिजीवी*<http://masijeevi.blogspot.com/2008/01/blog-post_15.html>
* जैसे लोग भी इस डर से आक्रांत लगते हैं और अपनी उलझी हुई शैली में
संत-आख्यान देने की कोशिश करते हैं। मैं न तो अपराजिता की टिप्पणी को बहुत
गंभीरता से ले रहा हूं, न ही उस पर आयी प्रतिक्रियाओं को। लेकिन एक अनुभव को
मैं दरकिनार नहीं कर पा रहा, जिसे दिल्ली में रहने वाली एक लड़की ने झेला। दिन
पूरा चढ़ जाने के बाद आज जब सोकर उठा, तो दीप्ति दुबे का ये अनुभव चंद वाक्यों
में तब्दील होकर हमारे मेलबॉक्स में पड़ा था। **दीप्ति
दुबे*<http://mohalla.blogspot.com/2007/12/blog-post_2744.html>
* सीएनईबी (कंप्लीट न्यूज़ एंड इंटरटेनमेंट ब्रॉडकास्ट) में काम करती हैं,
जो अभी ऑनएयर नहीं हुआ है। भोपाल की रहने वाली हैं और वहीं माखनलाल चतुर्वेदी
पत्रकारिता संस्थान से डिप्लोमा कर चुकी हैं।*
**
*अविनाश <http://dilli-darbhanga.blogspot.com>*
*
**एक ऑटो।* नौ सवारी। एक अकेली मैं लड़की। बाकी सारे उत्तर भारतीय। शायद सभी
बिहारी। मैं बीचों-बीच बैठी हुई थी। मेरे मन में कुछ अपना ही गुणा भाग चल रहा
था। तब ही अचानक रेडियो पर आरजे ने कहां कितनी सेफ़ है दिल्ली। लड़कियां अपनी
बातें फ़ोन कर कर के बता रही हैं। मेरा दिमाग अपने में ही है। तब ही अचानक एक
सवाल - ऑटो में कितनी सेफ़ है दिल्ली की लड़कियां ऑटो में। मेरे कान खड़े हो
गए। मैंने चारों ओर नज़र घूमाई और मैं डर गई। कपड़ों से सभी किसी फ़ैक्ट्री के
मज़दूर लग रहे थे। मेरे दिल की धड़कन बढ़ गई। तभी अचानक रेडियो पर पोल खत्म हुआ
और लालू की आवाज़ में मिमिक्री हुई और बिल्लो रानी गाना शुरू हो गया। ऑटो में
बैठे सभी लोग हस पड़े। मेरा डर और बढ़ गया। मैं कुछ हिली डुली। मेरे साथ वाले
अंकल बोले - बेटाजी तकलीफ़ है। हम साइड हो जाएं। वहां बाल बराबर खिसकने की भी
जगह नहीं थी। मैं कुछ नहीं बोली। गाना खत्म हुआ और फिर लालू की मिमिक्री शुरू
हुई। सबसे डरावना था एफ़ एम की टेग लाईन - चिपक के बैठो। सब फिर हस पड़े। मैं
एकदम चुप। तभी मेरे पास बैठे लड़के ने कहा - आप कही हमसे डर तो नहीं रही है। हम
बिहारी है बुरे नहीं। और फिर सब हस पड़े। मुझे तब से खुद पर शर्म आ रही है। पता
नहीं क्यो। आप बताएं।
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