[दीवान] TZP

mihir pandya miyaa_mihir at yahoo.com
Thu Jan 24 18:55:16 IST 2008


बेहतरीन आलेख! मैं नरेश के इस विचार से पूरी तरह सहमत हूँ कि 'तारे ज़मी पर' बाल फिल्म नहीं है. यह फिल्म वयस्कों के लिये है, उन्हें ही सम्बोधित है. खासतौर पर एक बच्चे के 'आत्म' को जिस बारीकी से पकडा गया है वह काबिलेतारीफ है. जिस दृश्य में पिता घर छोडकर जाने का ड्रामा करते हैं और फिर माँ ईशान को कहती है कि पिता तो दफ्तर के काम से जा रहे हैं वहाँ पहले ईशान का रोना/ गिडगिडाना और फिर पिता को
 देख्कर उसका गुस्सा होना à¤
नायास ही उस 'आत्म' को पकड लेते हैं. यहाँ मुझे मोहनदास गाँधी की कही ये बात याद आ जाती है, "विश्वास कीजिये, मैं सैंकडों नहीं हज़ारों बच्चों के निजी à¤
नुभव के आधार पर कह रहा हूँ कि हमारी à¤
पेक्षा बच्चों में आत्मसम्मान की बडी सूक्ष्म à¤
नुभूति होती है. à¤
गर हममें विनम्रता हो तो हम जीवन के महानतम पाठ तथाकथित à¤
बोध बच्चों से सीख सकते हैं, उनके लिये बडी उम्र के
 विद्वानों के पास जाने की आवश्यकता नहीं है."
पहले हाफ का चमत्कार दूसरे हाफ में नहीं रहता और मुझे आमिर खान के संवाद बहुत सपाट लगे. ऐसा लगता है कि आमिर सब बोलकर कह देना चाह्ते हैं. ऐसी फिल्म के लिये उपदेशात्मकता एक रोग है. और फिर वो रोते भी कुछ ज़्यादा ही हैं. फिर भी ईशान के साथ बिताए पल हमेशा याद रहेंगे. बस उसकी आखिरी जीत में आप उसकी शुरुआती ऊब ना भूल जायें.

naresh goswami <naresh.goswami at gmail.com> wrote:  'तारे ज़मीं पर' कई वजहों से देखी जानी चाहिए. एक, यह फ़िल्म बच्चे के बिखरते
आत्म का बेहद संवेदनशील कोलाज है. पर इसे बाल-फ़िल्म नही कहा जा सकता. दो,
फ़िल्म का सूत्रधार एक ऐसा पात्र है जो फ़िल्म के आख्यान की सरंचना और प्रवाह
का हिस्सा बनकर नही बल्कि एक वैकल्पिक परिप्रेक्ष्य से आता है. तीन, यह फ़िल्म
बॉलीवुड में मजबूत हो रहे उस ट्रेंड की परिचायक है जिससे पता चलता है कि भारतीय
समाज की सामूहिक चेतना à¤
ंततः किशोर यौनिकता के बाड़े से निकल कर सचमुच की ठोस और
परिपक्व दुनिया की ओर बढ़ने लगी है- एक ऐसी खुली दुनिया की ओर जिसमें एक गाने
में सत्तर बार कपड़े बदलने और हरी-भरी वादियों में सहवास के सांकेतिक खेल खेलने
के à¤
लावा और भी गम हैं.
एक बच्चे को किताब में छपे à¤
क्षर समझ नही आते. वह शिक्षक के निर्देश सुनने के
बजाय सड़क पर भरे पानी से गुज़रते वाहनों को देखना चाहता है. वह पेड़ की फुनगी
पर फुदकती चिडियों का कलरव सुनना चाहता है और तितलियों के साथ उड़ना चाहता है.
उसकी कल्पना रंगों पर सवार हो कर किसी ऐसी दुनिया कि यात्रा पर जाना चाहती है
जहाँ न बात-बेबात à¤
ध्यापक का डंडा चलता हो, न माता -पिता के क्षुब्ध चेहरे
à¤
पने प्यार का प्रतिदान मांगते हो. बुनियादी शिक्षा के पहले पायदान पर खड़े इस
बच्चे को उसके माता-पिता ही सफल नही देखना चाहते, स्कूल की संस्था भी इसी
भागीरथ प्रयत्न में लगी है. और कमाल यह है कि दोनों ही पक्षों को समझ नही आता
कि बच्चे की दिक्कत क्या है. माता-पिता मानते हैं कि वह मेहनत से जी चुराता है
और स्कूल वाले उसे प्रोब्लम चाइल्ड घोषित कर देते हैं. इसके बाद बच्चे के साथ
एक त्रासद प्रयोग किया जाता है. उसे एक ऐसे बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया जाता
है जिसमें बकौल एक à¤
ध्यापक "एक से एक बिगडैल घोड़े" को ठीक कर दिया जाता है.
'तारे ज़मीं पर' इस इकहरी और निर्मम रूप से सफलता-केंद्रित मानसिकता में
बेआवाज़ कुम्हलाते बचपन की इबारत है. पर यह फ़िल्म बच्चों के लिए नही, बडों के
लिए है. ईशान à¤
वस्थी का दुःख एक प्रौढ़ और कथित तौर पर परिपक्व आदमी को ,
फ़िल्म के बाद घंटो भी à¤
वसन्न किए रखता है. इस मायने में यह फ़िल्म वयस्कों को
ही संबोधित है. यही शायद इसकी सीमा भी है. लेकिन इसके बावजूद फ़िल्म सफलता
और प्रतिभा से मुताल्लिक़ सामाजिक मान्यताओं को एक बड़े फलक पर विश्लेषित करने
का जोखिम उठाती है. यहाँ मुख्य कथा के बाहर खड़ी एक और सरंचना का भी सुराग मिलता
है. पता नहीं आमिर खान ने यह सोचा होगा कि नही पर उसने फालतू की बारीकी में पड़े
बिना उपभोक्तावाद की कथित निर्विकल्पता पर बहुत कायदे से सवाल उठाया है.
फ़िल्म का घटना का प्रवाह दर्शकों से लगातार जिरह करता है कि सफलता और प्रतिभा
की सामाजिक सोच के पीछे वह कौन सी संरचना है जो व्यक्ति को à¤
पने ही प्रियजनों
के प्रति इतना निर्मम और क्रूर बना देती है. फ़िल्म का कथा कौशल शायद इस बात
में निहित है कि वह दर्शक को इस संरचना के मुहाने पर ले जाकर छोड़ देता है. इसके
बाद दर्शक को ख़ुद होमवर्क करना पड़ता है. इस होमवर्क के बाद उसे पता चलता है
कि दरà¤
सल परिवार और स्कूल की संस्थाएं नव-उदारवाद व बाज़ार की उन वृहत्तर
प्रक्रियाओं में फंसी हैं जिसके चलते मनुष्य की चरित्रगत विशिष्टता
उपभोक्तावाद के तर्क से तय होने लगती है. पता नहीं यह बात बेधक ढंग से कही जाए
या नहीं पर à¤
ंतत बाज़ार मनुष्य को एक विवेकहीन इच्चाधारी उपभोक्ता बनाकर ही
छोड़ता है. ईशान à¤
वस्थी का बचपन जिस à¤
वसाद से गुज़रता है वह इस व्यवस्था की
à¤
निवार्य परिणति है.
दरà¤
सल ईशान à¤
वस्थी की कथा का सिरा उपभोक्ता सुविधाओं और सामाजिक दंद-फंद की उस
संस्कृति से जुडा है जिसमे बच्चे à¤
भिभावक की à¤
पूर्ण और कुंठित लालसाओं के
वेक्टर बनकर रह जाते हैं. बच्चों के लिए माँ घर में सबसे पहले उठ जाती है और
सबसे बाद में बिस्तर का रूख करती है. पिता à¤
गर मलाईदार नौकरी में हों तो दोनों
हाथों से पैसा कूटने में लगे रहते हैं. इक बेहद आम कामकाजी आदमी भी à¤
पने बूते
से बाहर जाकर बच्चों के कथित बेहतर भविष्य के जुगाड़ में लगा रहता है. पर गौर
करें कि माता-पिता जिसे बच्चों की 'बेहतरी' समझते हैं उसका चाप उन्हें रचनात्मक
या आज़ाद ख़याल नागरिक बनाने पर नही बल्कि बेहतर उपभोक्ता बनाने पर टूटता है.
इंजीनियरिंग, डॉक्टरी या मैनेजमेंट जैसे व्यवसाय हमारे समाज में इसलिए
श्रेयस्कर समझे जाते हैं क्योंकि इन्ही पेशों से जुड़े लोग सबसे
ज्यादा मजे करते दिखते हैं. सुविधाओं की आकांक्षा न à¤
नैतिक है न गैर जरूरी.
मेहनत के बाद आदमी को सुख मिलना ही चाहिए. पर ऐसा क्यों है कि एक औसत आदमी
उन्ही सुखों को सुख मानता है जिन्हें उपभोक्तावाद का प्रचार-तंत्र पैदा करता
है?
à¤
ब ज़रा फ़िल्म के दूसरे पहलू पर विचार किया जाए.
पिटाई, à¤
पमान और à¤
वहेलना झेलते झेलते ईशान एक सहमी हुई चुप्पी में बदल जाता है.
हिन्दी वाले सर को कविता की डिफाल्ट व्याख्या चाहिए. à¤
ंग्रेज़ी वाले सर बच्चों
को समझाने के बजाय à¤
पनी रफ्तार ज्यादा दिखाते हैं. और मैथ्स वाले सर तो बाकायदा
उसकी हथेलियों पर डंडे बरसाते हैं. पीटी वाले टीचर भी इतने ही पत्थर हैं. गौर
करिये ये लोग स्कूल में पहले से ही पढा रहे हैं. ये सब स्थायी à¤
ध्यापक हैं.
पक्के और लगे-बंधे. यानी स्कूल के प्रबंध-तंत्र को उनकी काबिलियत पर पूरा भरोसा
है.
यह शायद संयोग नहीं है कि फ़िल्म में ड्राइंग के टीचर - रामशंकर निकुम्भ का
परिचय एक टेम्परेरी यानी à¤
स्थायी à¤
ध्यापक के रूप में दिया जाता है. यह परिचय
भी हमें बच्चों से ही मिलता है. हम सब à¤
पने à¤
नुभव से जानते हैं कि स्कूल में
ड्राइंग का टीचर खानापूर्ति के लिए ही होता है. न छात्र इस विषय में रुचि लेते
हैं न सहकर्मी à¤
ध्यापकों की नज़रों में ड्राइंग के टीचर का कोई महत्व
होता है. यह विषय और उसका à¤
ध्यापक स्कूल व पाठ्यक्रम के हाशिये पर होता है. कई
बार तो जब गणित या विज्ञान जैसे 'महत्वपूर्ण' विषयों का à¤
ध्यापक स्कूल नही आ
पाता तो बच्चों को सँभालने की जिम्मेदारी ड्राइंग के इस टीचर को ही दे दी जाती
है. हम यह भी जानते हैं कि इस जिम्मेदारी का मतलब à¤
क्सर बच्चों एक घंटा चुप
रखना होता है.
क्या फ़िल्म में रामशंकर निकुम्ब का à¤
स्थायी होना खास मायने नही रखता? आख़िर
ईशान की दिक्कतों और à¤
वसाद को हिन्दी के à¤
ध्यापक श्री तिवारी जी क्यों नही समझ
पाते ? कहीं ऐसा तो नही है कि सत्ता और महत्ता की इस व्यवस्था में वही लोग
'स्थायी' हो पाते हैं जिन्हें विविधता और बहुलता देखना नागवार गुज़रता है. कहना
न होगा कि एक वंचित- यहाँ बच्चे की तकलीफ को à¤
पनी जाती जिम्मेदारी मानने वाला
नागरिक इस निर्णय-तंत्र की परिधि पर ही रह सकता है. तभी तो रामशंकर को स्कूल के
प्रिंसिपल से विशेष à¤
नुरोध करना पड़ता है कि ईशान को आगे पढने का एक और मौक़ा
दिया जाए. स्कूल के स्थायी और ताक़तवर लोग ईशान की आंखों की उदासी क्यों नही
पढ़ पाते? यह जिम्मेदारी 'à¤
स्थायी' को ही क्यों उठानी पड़ती है?
फ़िल्म में ड्राइंग का टीचर निकुम्ब ही बदलाव की एजेंसी है. यानी वह जो स्कूल
के प्रबंध-तंत्र का बाज़ाप्ता à¤
ंग भी नही है. कोर्पोरेट भाषा में कहें तो इस
समूचे मामले में वह स्टेक होल्डर भी नही है. इस सन्दर्भ में रिचर्ड ऐट्नबरो की
फ़िल्म 'गाँधी' का वह दृश्य बरबस याद आ जाता है जिसमे हाल में à¤
फ्रीका से लौटे
और साबरमती में आश्रम स्थापित करने के बाद गांधीजी कांग्रेस के जलसे में भाग
लेने आए हैं. उनके हाथ में चाय की ट्रे है. कांग्रेस का नेत्रत्व संवैधानिक
बहसों में à¤
टका है. माहौल पूरी तरह उत्सवमय है. जनता इतिहास के ठहराव और
मानसिक जकडन की गिरफ्त में है. गाँधी जी भी कांग्रेस के इस जलसे में 'बाहर' के
आदमी हैं. निकुम्ब की तरह वे भी इस प्रक्रिया के हाशिये पर ही हैं. लेकिन उनकी
ठंडी शांत आँखे इस गतिरोध को पढने की कोशिश कर रही हैं. एक बच्चे की तकलीफ में
रामशंकर निकुम्ब भी यही करता है.
नरेश गोस्वामी
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