[दीवान]मोहनदास: जितनी अच्छी कहानी उतनी घटिया फिल्म

Rakesh Kumar Singh rakesh at sarai.net
Sat Jul 19 12:49:15 IST 2008


मित्रों

पिछले अगस्त में यश भाई (मालवीय) आए थे. तब नागासाकी और हिरोशिमा की बरसी पर 
युद्धोन्माद के खिलाफ़ तिमारपुर में एक काव्य गोष्‍ठी हुई थी. यश भाई ने उस गोष्‍ठी में 
अन्य गीतों और कविताओं के अलावा 'नदी में ये चंदा किसे ढूंढता है ...' सुनायी थी. तब 
उन्होंने ये बताया था कि ये गीत उदयप्रकाश की कहानी 'मोहनदास' पर आधारित फिल्म 
'मोहनदास' के लिए लिखा है. अगर ठीक-ठीक याद हो तो उन्होंने ये कहा था इसकी 
रिकॉर्डिंग भी हो चुकी है.
बहरहाल, कल सिरीफ़ोर्ट ऑडिटोरियम में ओसियान फिल्म समारोह के दौरान मोहनदास देखने के 
बाद मेरे मन में जो सवाल कुलबुला रहे हैं, मैं उन्हें यहां आपसे बिन्दुवार साझा कर रहा हूं.


1. फिल्म में पात्रों के चयन को देखकर निर्देशन बेहद कमज़ोर लगी. नाम याद नहीं कि 
मोहनदास का किरदार किन्होंने निभाया है, पर मेरी राय है कि वो पूरी फिल्म के सबसे ढीले 
पात्र रहे हैं. मोहनदास की भूमिका तो कहीं से भी उन पर नहीं जम रही थी. मध्यप्रदेश के 
किसी पिछड़े से गांव का एक ग़रीब दलित जिसका घर का ख़र्चा हाट-बाज़ार में बांस की बुनी 
हुई टोकरी बेचकर चलता है, - उसके कपड़े हमेशा झकाझक कैसे रहते हैं. झकाझक ही नहीं अन्य 
सभी पात्रों से धवल. कितना गोरा है ये मोहनदास!

2. मोहनदास की पत्नी कस्‍तूरी बेमिसाल सुंदर है. ठुड्डी में तीन काले तिल, अरूणा इरानी 
की याद दिला जाते हैं. तीन तिल: यही ग्रामीण, मज़दूर दलित स्त्रियों का प्रतिनिधि 
चेहरा है?

3. जिस स्कूल में मोहन पढ़ता है वहां के बच्चे साफ़-सुथड़ी वर्दी तो पहन ही रहे हैं साथ में 
टाई भी लटक रही है बच्चों के गले में. हो सकता है निर्देशक महोदय को मध्यप्रदेश में वैसा 
स्कूल मिल गया होगा, अपन तो तीन बार गए नर्मदा बचाओ आंदोलन' के इलाक़े में पर कोई भी 
सरकारी स्कूल ऐसा नहीं दिखा.

4. दारोगाजी, कहीं से दारोगा नहीं लगते. और तो और अपने पोषाक से भी नहीं. ऐसा 
ढीला-ढाला मरियल दारोगा, ना जी ना. कोल माइन्स तो क्या दूर-दराज़ में रहने वाले भी 
ऐसे दारोगा को कभी भाव नहीं देंगे. एक तो ढीली कद-काठी उपर से अंगोछा ओढ़े : लग रहा 
था मानो पैसे लेकर स्कूली बच्‍चों को धमकाने का काम करता है.


5. सकारात्मक बातें भी है पात्र-चयन और पात्रों की भूमिका को लेकर. मुझे तो सबसे अच्छी 
भूमिका लगी स्ट्रींगर अनिल यादव (उत्तम) की. चयन भी ठीक था यहां.


और भी बातें है जो ये बताती हैं कि फिल्म कितनी कमज़ोर बनी है और निर्देशन कितना कमज़ोर 
है. शायद मित्रों ने थोड़ा कुरेदा तो वो भी बक दूंगा.


फिलहाल फिल्म का एक गीत सुनें जो हमारे भाई यश मालवीय ने पिछले अगस्त में पहली बार 
सुनाई थी. अरे हां, इसके लिए आपको क्लिक करना होगा http://haftawar.blogspot.com.

शुक्रिया
राकेश


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