[दीवान]मोहल्ला

मोहल्ला avinashonly at gmail.com
Wed Jun 25 20:51:05 IST 2008


मोहल्ला

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मुझे कोई शर्मिंदगी नहीं है...
 
Posted: 25 Jun 2008 04:58 AM CDT
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पिछले दिनों एक परिचित का एसएमएस आया। उनसे बात एक साल से नहीं हो पा रही थी। वे इंडिया टीवी में थे, फिर कहीं और चले गये और वापिस इंडिया टीवी में आ गये। उन दिनों वे इस चैनल में ख़बरों को लेकर गैरसंजीदगी और ड्रामे-सेंसेशन-सेक्‍स वगैरा-वगैरा को लेकर अतिउत्‍साह से परेशान थे। मैंने यूं ही कहा था कि आप देखिएगा कि यही सब करते हुए इंडिया टीवी एक दिन नंबर वन चैनल होगा और आज जो तथाकथित ख़बर-केंद्रित चैनल माने जाते हैं, इंडिया टीवी को फॉलो करेंगे। कुछ हफ़्ते पहले जब एक टीआरपी रिज़ल्‍ट आया, तो सचमुच इंडिया टीवी नंबर था और उसकी यह जगह अब भी बनी हुई है। तो उनका एसएमएस था कि आपकी वो वाली बात याद आ गयी। पर ऐसा नहीं है कि इंडिया टीवी में जो हो रहा है - वह एक पॉपुलरिटी की कुंजी मिल जाने के चलते हो रहा है। बल्कि पॉपुलरिटी की गलियां खोजते रहने की कोशिशों का ही फल वे खा रहे हैं। रजत शर्मा, जो इस चैनल के मालिक हैं - इस मामले में उनकी दलीलें भी एकदम साफ-साफ है, जो तहलका को इंटरव्‍यू देते वक्‍त उन्‍होंने दी हैं।आखिरी पायदान से शीर्ष तक का सफर... अपनी यात्रा के बारे में कुछ बताएं?बहुत मुश्किलों भरी थी ये। आज से चार साल पहले जब मैंने इंडिया टीवी शुरू करने का फैसला किया था तब मेरे दोस्तों ने मुझसे कहा कि मैं एक ऐसे बाज़ार में छलांग लगाने जा रहा हूं जो पहले से ही खचाखच भरा हुआ है। एनडीटीवी, स्टार, आज तक, ज़ी, सहारा और डीडी जैसे न्यूज़ चैनल पहले से ही स्थापित थे। लेकिन मेरा विश्वास उन दर्शकों पर था जिन्होंने मेरे पूरे टेलीविज़न करियर के दौरान मेरा साथ दिया था। मुझे यकीन था कि अगर मैं अपना चैनल शुरू करता हूं तब भी वे मेरा साथ देंगे। इसमें काफी समय और ऊर्जा लगी। इस दौरान कई डरावने पल भी आए, जब मुझे लगा कि शायद मैं इसे कर ही न पाऊं। तीन मौकों पर मुझे तनख्वाहें देने के लिए अपनी संपत्ति तक को बेचना पड़ा। 20 सालों के करियर में मैंने जो भी कमाया था वो सब धीरे-धीरे गायब होने लगा। लेकिन परिस्थितियां बदली। जब पहला विदेशी निवेशक सामने आया तो उसने कंपनी की कीमत 300 करोड़ आंकी, अगले ने 600 करोड़ और अब निवेशक इसे 1000 करोड़ का बताते हैं। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि संकट के जो पल थे उनसे गुज़रना बेकार नहीं गया।आज तक और स्टार जैसे अपने निकट प्रतिद्वंदियों को पछाड़ने का आपका फार्मूला क्या है?मैं अपनी संपादकीय टीम से कहता रहता हूं कि टीवी का दर्शक वर्ग किसी क्रिकेट के खेल की तरह होता है। एक समय था जब टेस्ट मैच काफी पसंद किए जाते थे, गावस्कर हीरो थे। इसके बात सीमित ओवरों के क्रिकेट का जमाना आया और कपिल के रूप में नया सितारा चमका। अब ज़माना टी-20 का है। आज मैं ये थोड़े ही कह सकता हूं कि मुझे सुनील गावस्कर बन कर टी-20 खेलना है। ‘कान्‍टेंट’ को समय के साथ बदलना ही होता है फिर भले ही इसमें मीडिया के दूसरे साथियों की आलोचना क्यों न झेलनी पड़े। हमारे प्रतिस्पर्धी इसे लोकप्रियता की होड़ का नाम दे सकते हैं लेकिन हमारा असल सरोकार तो दर्शक से ही होता है। अगर दर्शक टी-20 देखना चाहते हैं तो मैं उन्हें टेस्ट मैच थोड़े ही दिखा सकता हूं।आलोचनाओं पर आते हैं... हिंदी चैनलों की सबसे ज्यादा आलोचना इस बात के लिए हो रही है कि उनकी काँटेंट का स्तर काफी गिर गया है।नहीं, ऐसा नहीं है। हमने न्यूज़ की परिभाषा बदल दी है। अगर लोग आज भी सोचते हैं कि फीता काटते नेता और संसद में भाषण देना ही ख़बर हैं तो वो दिन बीत गए। हिंदी के न्यूज़ चैनलों पर आरोप लग रहे हैं लेकिन अगर आप सभी बड़े अख़बारों के मुखपृष्ठ पर नज़र डालें तो आपको आईपीएल नज़र आएगा। सच्चाई ये है कि दो शीर्ष साप्ताहिक पत्रिकाएं भारतीय महिलाओं की यौन अभिरुचियों पर कवर स्टोरी छाप चुकी हैं, लेकिन उन्हें तो कोई कटघरे में खड़ा नहीं करता। तहलका को छोड़कर, जो कि एक अपवाद रहा, लगभग सभी लोकप्रिय पत्रिकाओं में आईपीएल को प्रमुखता दी गई। अगर आप पुरानी परंपरा के हिसाब से चलेंगे तो इस हफ्ते की कवर स्टोरी महंगाई होनी चाहिए थी। इसी तरह से टेलीविज़न न्यूज़ चैनलों की भी विषयवस्तु बदल गई है।राजनीतिक तबके के विचारों की आप किस हद तक परवाह करते हैं?बहुत ज्यादा। जिस तरह से राजनेता लोगों के प्रति जवाबदेह हैं उसी तरह हम भी हैं। हमारा काम ही है राजनीतिज्ञों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना। इसी सोच से प्रेरित होकर “आप की अदालत” का जन्म हुआ था। आज 16 साल बाद भी ये प्रोग्राम उतना ही पसंद किया जाता है। इंडिया टीवी इसी फॉर्मूले पर आधारित है। इसकी कोशिश है कि लोग जनता के प्रति जवाबदेह बनें, चाहे वो राजनेता हों, फिल्म स्टार हों या फिर क्रिकेटर।अगर मैं ये कहूं कि इंडिया टीवी भूत-प्रेत का पर्याय बन गया है तो आप क्या कहेंगे?ये छह महीने पहले की बात है। उसके बाद से हमने भूत-प्रेत की एक भी कहानी नहीं दिखाई है।लेकिन आपने टीआरपी की सीढ़ियां चढ़ने के लिए इसका सहारा लिया है।नहीं, हमने ऐसा नहीं किया। उन दिनों इसी तरह की कहानियां आती थीं। और लोग इन्हें पसंद करते थे। उदाहरण के लिए पिछले हफ्ते हमने पाया कि 51 फीसदी दर्शकों ने इंडिया टीवी देखा क्योंकि हमने विष्णु का इंटरव्यू दिखाया था, जो कि पहले राजेश तलवार के यहां काम करता था। हमारे रिपोर्टर ने उसे नेपाल में कहीं ढूंढ़ निकाला था। पिछले हफ्ते हमें रेटिंग में सबसे ऊपर जगह मिलने की वजह रही आरुषि हत्याकांड पर हमारी विस्तृत कवरेज। इसमें भूत-प्रेत या सांप-नागिन की कोई भूमिका नहीं थी। किस्मत से दूसरे ख़बरिया चैनलों ने वही पुराना फॉर्मूला अपनाया। शाहरुख ख़ान के शो पांचवीं पास... में लालू प्रसाद यादव मेहमान बन कर आए। ये राजनीति और मनोरंजन का शानदार मेल था। हम लोगों की पसंद के मुताबिक चल रहे हैं।आप ख़बरों के बाज़ार में हैं या मनोरंजन के?हम सिर्फ और सिर्फ ख़बरों के बाज़ार में हैं। मगर इन दिनों मनोरंजन भी बड़ी ख़बर बन गया है। समय बदल रहा है। आईपीएल क्रिकेट है, मनोरंजन नहीं। लालू एक राजनेता हैं, जनता के प्रतिनिधि, आप उन्हें मनोरंजनकर्ता नहीं कह सकते। इंडिया टीवी एक न्यूज़ चैनल है, आप इसे मनोरंजन चैनल नहीं कह सकते।सामाजिक जिम्मेदारियों पर क्या कहेंगे? क्या इंडिया टीवी खैरलांजी में हुई हत्याओं पर कोई अभियान चलाएगा?इंडिया टीवी अकेला चैनल है जिसने अभियानों को सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में चलाया है। मैं आपको तमाम उदाहरण दे सकता हूं। मैं विनम्रता से कुछेक के बारे में आपको बताता हूं। एक जादूगर बच्चे को हर महीने 60,000 रूपए का एक इंजेक्शन लगना था। हमारी स्क्रीन पर एक अपील तीन घंटों तक प्रसारित हुई और इसके बाद चेकों की बरसात होने लगी। मुंबई में अनाथ बच्चों के लिए एक सामाजिक संस्था थी। एक दिन भवन के मालिक ने उन्हें निकाल फेंकने का फैसला कर लिया। इंडिया टीवी वहां पहुंचा और वहां से सीधा प्रसारण शुरू कर दिया। अंतत: मालिक को अपना फैसला बदलना पड़ा। जब पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बढ़ोत्तरी की घोषणा की गई, हम दिन भर दिखाते रहे कि इस बढ़ोत्तरी का लोगों पर क्या असर पड़ने वाला है। जब भी सामाजिक, राजनीतिक या फिर दर्शकों के हितों के लिए लड़ने की बात आएगी दर्शक हमेशा हमारी जिम्मेदारी को महसूस करेंगे। इसीलिए इंडिया टीवी ने अब अपनी टैग लाइन बनाई है “आपकी आवाज़”। जनता की आवाज़ बनना ही हमारा लक्ष्य है।लेकिन ये बात तो सच है कि टीआरपी की लड़ाई में अपने प्रतिस्पर्धियों से आगे निकलने के लिए इंडिया टीवी ने भूत प्रेत का सहारा लिया?इंडिया टीवी ने समय की जरूरतों के हिसाब से खुद को बदला है। एक समय था जब हमने उड़ीसा के एक गांव में चुड़ैल के घूमने की ख़बर दिखाई थी। हमने अपने दर्शकों को खबर के माध्यम से बताया कि ये महज़ अंधविश्वास है।लेकिन इस बात से तो आप सहमत होंगे कि ये कोई ख़बर नहीं है?ये खबर ही है। मान लीजिए ठाणे में ये अफवाह है कि वहां कोई भूत घूम रहा है जो लोगों की हत्या कर रहा है। हम लोगों को बताते हैं कि ये कोई भूत नहीं है बल्कि कोई हत्यारा है जो ऐसा कर रहा है। हम इस तरह की ख़बरें लोगों को जागरुक करने के लिए दिखाते हैं।आप कह रहे हैं कि लोग जो चाहते हैं आप वही दिखाते हैं। पर आप को नहीं लगता कि आपको खुद भी एक मानक स्थापित करने की जरूरत है?इस देश का एजेंडा क्या है? क्या ये सिर्फ नेताओं को गाली देते रहना है? क्या सिर्फ लंबे-लंबे भाषण और फीते कटते हुए दिखाए जाएं? हमने मानक तय किए हैं। आज मैं आपसे पूरे गर्व के साथ ये कह सकता हूं कि हमारे पीछे सात चैनल हमारे नक्शेक़दम पर चल रहे हैं। वे हमारी काँटेंट ही नहीं बल्कि चैनल को प्रमोट करने का तरीका भी अपना रहे हैं। ये चैनल हमारे ग्राफिक्स, सेट्स, संगीत और विजुअल्स... सब की नकल कर रहे हैं। आज हम ट्रेंडसेटर बन चुके हैं। इसी वजह से हमें इतनी संख्या में लोग पसंद कर रहे है, लोग असल को देखना पसंद करते हैं, नकल नहीं।क्या आपका कोई फॉर्मूला है?मैं अपने संपादकीय दल के साथ रोज़ाना होने वाली बैठकों में कहता हूं कि “जाओ और खुद को झोंक दो”। ऐसी स्टोरी मत करो जिससे मुझे, चीफ प्रोड्यूसर को या तुम्हें खुशी मिलती हो। ऐसा करो कि जिससे दर्शकों को खुशी मिले। यही मेरा फॉर्मूला है। दर्शक के लिए करो, उनके लिए बोलो।आपके पास न्यूज़ और इन्वेस्टिगेशन के लिए लंबा-चौड़ा बजट है।जब हमने इन्वेस्टिगेशन पर ध्यान देना शुरू किया तो हमारे ऊपर “स्टिंग चैनल” का ठप्पा लग गया। जब हमने इसे रोक दिया तो लोग कहने लगे, रोका क्यों? ये तेज़ी से बढ़ने, नंबर वन होने की दुश्वारियां हैं। पिछले साल हमारी तरक्की की रफ्तार 110 फीसदी रही। हमारे प्रतिद्वंदियों की रही महज़ 2-4 फीसदी। लोग इस फॉर्मूले को जानना चाहते हैं। फार्मूला ये है कि मैं दिन में 18 घंटे अपने न्यूज़रूम में ही बिताता हूं, मैं अभी भी स्टोरी लिखता हूं। मैं गर्व से कह सकता हूं कि इस देश में ऐसा कोई नहीं है जो एक चैनल का मालिक होते हुए भी स्क्रिप्ट लिखता हो और तीन घंटे की प्रोग्रामिंग और प्रोमोज़ भी करता हो।शक्ति कपूर के स्टिंग ऑपरेशन की ये कह कर आलोचना हुई थी कि ये लोगों के निजी जीवन में ताकाझांकी थी। आपको लगता है कि वो एक ग़लती थी?नहीं, मुझे इस पर फख्र है। पिछले हफ्ते हमारे एक प्रतिद्वंदी ने कास्टिंग काउच पर एक कार्यक्रम चलाया। छह महीने पहले ही पूर्व में नंबर एक रहे एक चैनल ने भी इसे उठाया था। मुझे फिल्म इंडस्ट्री या फिर मीडिया की तरफ से होने वाली आलोचनाओं की चिंता नहीं थी। मेरे ख्याल से ये फिल्म इंडस्ट्री में आने को लालायित युवा लड़कियों को चेतावनी देने के लिए उठाया गया एक सही क़दम था।आपको टीआरपी के लिए कुछ भी करने और व्यावसायिक सफलता की अंधी दौड़ में ख़बरों को दरकिनार करने का दोषी ठहराया जा सकता है।मेरी रुचि कभी भी व्यावसायिक सफलता पाने में नहीं रही। मुझे पैसे ने कभी आकर्षित नहीं किया। लोगों का प्यार और लोकप्रियता ही हमेशा से मेरी कमज़ोरी रही हैं।आपको नहीं लगता कि आपने “कान्‍टेंट” का स्तर गिरा दिया है?बिल्कुल नहीं। अगर हमारी सामग्री इतनी घटिया है तो फिर बाकी सात चैनल इसकी नकल क्यों कर रहे हैं? जब भी लोग मुझसे टीआरपी की दौड़ में शामिल होने के बारे पूछते हैं तो मुझे बहुत आश्चर्य होता है। क्या आप सचिन तेंदुलकर से कभी पूछते हैं कि वो इतने सारे रन क्यों बनाते हैं? मेरा काम एक ऐसे चैनल की स्थापना है जो रेटिंग्स में शीर्ष पर हो। इस पर मुझे कोई शर्मिंदगी नहीं है।आज तक, स्टार न्यूज़ जैसे प्रतिस्पर्धियों में आपको क्या अच्छा लगता है और वो क्या चीज़ है जो आपको चिंता में डालती है?मुझे उनका जुझारूपन अच्छा लगता है। एकाध मौकों को छोड़ दिया जाए तो हम स्वस्थ प्रतिस्पर्धी रहे हैं। हमारा नंबर एक पर काबिज होना ऐसा था मानो हरभजन ने श्रीसंथ को थप्पड़ मार दिया हो। इससे पहले हमारी लड़ाई में दुर्भावना नहीं थी। मैं अवीक सरकार की तहेदिल से इज़्ज़त करता हूं जो इस समय स्टार न्यूज़ के मुखिया हैं। मैं अरुण पुरी का सम्मान करता हूं जो आज तक के प्रमुख हैं। इन लोगों ने भारतीय पत्रकारिता को नये-नये आयाम दिये हैं। अवीक सरकार ने ‘टेलीग्राफ’ की शुरुआत की और अरुण पुरी ने ‘इंडिया टुडे’ की। ये लोग पुरोधा हैं। जब हम उनके चैनलों को ऐसा करते हुए देखते हैं तो कष्ट होता है। लेकिन हम इस गंदे खेल में शामिल नहीं होंगे। हम न तो कोई जवाब देंगे न मखौल उड़ाएंगे और न ही उन्हें गालियां देंगे।






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इत्तफ़ाकन एक मुलाक़ात सच से, थोड़ी गुफ्तगू भी!
 
Posted: 24 Jun 2008 10:56 AM CDT
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अंशुमाली रस्‍तोगीसच की शपथ और सच का कारोबार आज अदालत से लेकर मीडिया तक अपने उत्‍कर्ष पर है। पिछले दिनों एनडीटीवी इंडिया पर नीता शर्मा की एक रिपोर्ट ने बताया कि कैसे न्‍यायाधीश भी घूस खाते हैं। लेकिन जिस गौरव से हम इस सच को दिखाने का दंभ भरते हैं, उतना ही गिरगिट रंग हमारी रगों में भी बसा हुआ है। हम जो मीडिया के तथाकथित लोग है, अक्‍सर दूसरों से ये बताया करते हैं कि सच हमारे बटुए में है। सच किस तरह भारत के आधुनिक मीडिया का हथकंडा और धंधा हो गया है, एक ज़बर्दस्‍त संवाद में इसे पेश कर रहे हैं अंशुमाली रस्‍तोगी।
पिछले दिनों राह चलते सच से छोटी-सी मुलाक़ात हुई। सच पहले से काफी तंदुरुस्त और मोटा-ताज़ा नज़र आया। मैंने पूछा, ‘यार! तुम तो एकदम बदल गये। बरसों पहले जब तुमसे मुलाक़ात हुआ करती थी, तब तो बेहद दुबले-पतले नज़र आते थे। अब अचानक ऐसा क्या हुआ कि ऊपर से नीचे तक की पूरी रंगत ही बदल गयी।’ सच ने खुल कर जो सच सुनाया, उसे आप भी ग़ौर से सुनें। किस्सा मज़ेदार है।

सच बोला, ‘पहले मैं पनप इसलिए नहीं पाता था क्योंकि मेरी ‘परवाह’ करने वाले लोग कम थे। जब जिसका दिल किया मुझसे ‘फ़ायदा’ उठा ले जाता था। मेरे सच से फ़ायदा वो उठाते थे, पैसा वो कमाते थे जिनके पास ‘अपना सच’ नहीं था। और मैं हर वक्त हाशिये पर पड़ा-पड़ा कभी उन्हें, कभी खुद को कोसा करता था। मेरे सच की सीढ़ी पर चढ़ कर यहां जाने कितनों ने अपने बैंक-खाते मोटे किये, जाने कितनों ने आलिशान घर-कोठियां बना लीं। मगर मैं जहां था वहीं का वहीं रहा। फिर मैंने सोचा ऐसा कब तक और कहां तक चलेगा! आख़‍िर पेट का भी तो सवाल है! अपने सच को इस तरह से लुटते-बंटते मैं भला कैसे देखता रहता। तब मैंने तय किया कि मैं अपने सच की क़ीमत हर एक से वसूलूंगा।

धीरे-धीरे समय बदला। चीज़ें अब अख़बार तक ही सीमित नहीं रहीं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चौबीसों घंटे चीख़ने-चिल्‍लाने लगा। मैं इस कदर ‘पॉपुलर’ होने लगा कि हर टीवी चैनल मेरी ‘क़सम’ खाकर ही अपनी शुरुआत करता। प्रत्येक टीवी चैनल हर ख़बर पर ‘सच’ दिखाने का दावा करता। वो सच को कभी ऊपर से, कभी नीचे से दिखाता। सच का नशा चैनलों पर इस कदर छाने लगा कि उन्हें कम कपड़ों में सच, हत्या-आत्महत्या में सच, जुए-सट्टे में सच, भगवान की मूर्ति-आंसू में सच... हर जगह सच ही सच दिखने व नज़र आने लगा। मित्र, इसका फायदा मुझे यह मिला कि मेरी टीआरपी का ग्राफ दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही चला जाने लगा। जब सभी मेरे सहारे बाज़ार को लूटने में लगे थे, तब भला मैं क्यों पीछे रहता! बाज़ार का असर देखते हुए मैंने भी अपना ‘सौदा’ करना शुरू कर दिया। अब मैं चैनलों व अख़बारों में खुल कर बेचा-ख़रीदा जाने लगा। अपराध की ख़बरों में तो मैं ‘राजा’ हो जाता हूं। पता नहीं लोग यह कैसे कह देते या मान लेते हैं कि सच को ख़रीदा-बेचा नहीं जा सकता? लेकिन मैं तो निरंतर हर रोज़, हर क्षण यहां-वहां ख़रीदा-बेचा जाता हूं। मुझसे बेहतर ‘मेरा सच’ कौन जान सकता है, भला।

मित्र, यह जो मेरी तंदुरुस्ती को देख कर तुम भौंचक्के रह गये, इसकी वजह मेरी ख़रीद-फरोख्त में ही निहित है। सच कहूं, अब मैं अपनी ख़रीद-बेच का ‘पूरा मज़ा’ लेता हूं। मेरी मार्केट-वैल्यू को देखते-परखते हुए ही सभी अख़बारों-चैनलों ने अपनी दरें तय कर दी हैं। हां, अभी भी दो-चार शुद्ध सत्यवादी हैं हमारे आस-पास, मगर जल्दी ही वे भी रास्ते पर आ जाएंगे।

दरअसल, अब सच में ताक़त नहीं, ताक़त में सच होता है। यही हमारे बाज़ार का क़ायदा भी है और फारमूला भी। मुझे कितना दिखाना चाहिए, कितना छिपाना - यह अब बाज़ार तय करता है - अख़बार या चैनल्‍स नहीं। बाज़ार को ‘पेज-थ्री वाला सच’ ही चाहिए। पेज-थ्री पर जो सच तुम-हम देखते-पढ़ते हैं, उसमें कोशिश रहती है कि कपड़े कम से कम हों। कम कपड़ों में लिपटा सच ज़्यादा ग्लैमरस और सेक्सी दिखाई देता है, ऐसी बाज़ार की मान्यता है।

सच आज पैशन और टशन का मिलाजुला क्लोन है। मैं अपनी निरंतर बढ़ती मांग को देख-सुन-पढ़ कर इतना उत्साहित हूं कि अपनी अगली पीढ़ी को भी मैं बाज़ार के साथ चलने-ढलने की सीख दे रहा हूं। जब ज़माना बदल रहा है, फिर मैं क्यों न बदलूं? पेज-थ्री वाला सच ही आज का सच है, जिसे आसानी से ख़रीदा-बेचा जा सकता है।’

तो बंधु सच से इस सच को सुन कर सन्न हूं। देखिए सच मोटा-ताज़ा हो रहा है, क्योंकि पेज-थ्री का चस्‍का उसको लग गया है। 

जय हो चैनलवालो! जय हो अख़बारवालो!! जय हो बाजारवालों!!!






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