[दीवान]कहीं कुंठा की बलि न चढ़ जाए ब्लॉगजगत
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Sun May 4 22:38:26 IST 2008
अवीनाश, भडास, एन डी टी वी ओर हिन्दी ब्लोगजगत
<http://www.blogvani.com/Redirect.aspx?redi=56435&rediURL=http://khulkeybol.blogspot.com/2008/05/blog-post.html>पोस्ट
में खुल के बोल <http://khulkeybol.blogspot.com/> ने लिखा कि
हिंन्दी ब्लॉगिंग के 5000 ब्लॉग्स मे से सिर्फ दो – मोहल्ला और भड़ास ही दर्शकों
तक पहुँचाये गये । इसके अलावा अविनाश के करीबी यार रवीश , का ब्लॉग कस्बा का
पता दिखाया गया ।
उनकी शिकायत है कि बाकी लोग कहां गए।...
खुल के बोल की जो पीड़ा है, इसे मैं पीड़ा न कहकर मलाल कहूं तो ज्यादा बेहतर
होगा क्योंकि पीड़ा खुल के बोल को बहुत ही निरीह और असहाय बना देगा जो कि वो
हैं नहीं। खैर, खुल के बोल का जो मलाल है वो हिन्दी समाज के लिए नया नहीं है।
हिन्दी समाज इसका पुराना मरीज और मुरीद रहा है। आप एक राउंड लगा आइए हिन्दी
वालों के बीच आपको इसका अंदाजा लग जाएगा कि हिन्दी समाज में ९० प्रतिशत से
ज्यादा लोग मलाल और कुंठा में जीते हैं और इस बीच अगर कुछ लिखते भी है तो इससे
गुजरते हुए। स्थापित तो स्थापित जिन्हें अभी लिखना शुरु किए जुम्मा-जुम्मा चार
दिन भी नहीं हुए वो आपको कहता मिल जाएगा-
देखिए जी, दस कहानियां लिख चुका, अभी तक राजेन्द्रजी ने कहीं कुछ कहा ही नहीं
मेरे बारे में। पचासों कविताएं छप चुकी है, नामवरजी ने कभी नोटिस नहीं ली। अब
तक पता नहीं किस मसले पर लिखता रहा लेकिन जैसे ही उसके दिमाग में ये बात आनी
शुरु हो जाती है कि उसकी कोई नोटिस नहीं ले रहा, आगे से चाहे वो जिस किसी
मुद्दे पर लिखे, उसमें जाने-अनजाने कुंठा,मलाल, नोटिस होने की छटपटाहट घुलने
लगा जाती है। ये कितना सही है या गलत, पता नहीं लेकिन किताबी ज्ञान की बात करुं
तो मम्मट, भामह से लेकर नए आचार्यों ने रचनाकार की उपलब्धि में बाकी चीजों के
साथ यश की प्राप्ति बताया है। कोई बंदा इनके शास्त्र न भी पढ़ा हो तो
लिखनेवालों के बीच यश पाने की लालसा जन्मजात होती है, यानि जब से वो लिखना शुरु
करता है। इसका नतीजा होता है कि कई बार लिखनेवाले की रचना उसके मुद्दे और लिखने
की वजह से खिसकते चले जाते हैं। कई उभरते रचनाकार इस हादसे के शिकार हो चुके
हैं। जिन्हें इस बात का एहसास होने लगा कि नोटिस होने के लिए कुछ अलग लिखो,
उटपटांग भी लिखो यो फिर नोटिस में आ गए हो तो नोटिस में बने रहने के लिए लिखो।
ऐसे में वो अपने भीतर ही आए दिन अपने से लड़ता है, अपनी कुंठा से लड़ता है।
मैंने अपने एम.ए की पढ़ाई के दौरान कुछ ऐसे भी मास्टरों से शिक्षा ली है जिनका
मलाल बना रहा कि उन्होंने कविता पर और वादों ( इज्म) पर इतनी सारी किताबें लिख
दीं लेकिन साहित्य के इतिहासकारों ने उनके बारे में एक भी शब्द नहीं लिखा. एक
दो ऐसे विद्वान और हिन्दी के बाबा मिल जाएंगे जिन्हें इस बात का मलाल है कि
उनसे टटपूंजिए लोग प्रोफेसर बन गए और वो रीडर से ही रिटायर हो गए।... और उनकी
ये कुंठा और मलाल इनकी राइटिंग में इतनी हावी हो जाती है कि वो हमें बता ही
नहीं पाते कि वो कहना क्या चाह रहे हैं. मुद्दे से फिसलना इसे ही कहते हैं।
खुल के बोल जिस बात को आज रख रहे हैं कि ५००० ब्लॉगों के बीच केवल तीन ही चार
ब्लॉग हैं जिसकी चर्चा एक नेशनल चैनल में की जानी चाहिए, ये मसला भी नहीं है।
इनकी तरह मैं भी जब नया-नया ब्लॉग की दुनिया में आया तो नीलिमा के एक लेख पर
गहरी आपत्ति दर्ज की थी कि उन्होंने करीब आठ-दस पन्ने में जो लेख लिखा उसमें
मोहल्ला जैसे चर्चित ब्लॉग की कहीं कोई चर्चा ही नहीं की। मैं इस बात को पचा ही
नहीं पा रहा था कि इतने पॉपुलर ब्लॉग को कोई कैसे छोड़ सकता है र तब मैंने
मोहल्ला पर ही पोस्ट लिखी। वो लेख भी देशभर में बिकनेवाली नए विमर्शों की
त्रैमासिक वाक् में छपी थी।... लेकिन धीरे- धीरे मैं समझने लगा कि हम या हम
जैसे कोई भी नए लोग जब ब्लॉग की दुनिया में आते हैं तो उसे बहुत ही मासूम और
इन्सेंट माध्यम मानने लगते हैं। इसी क्रम में,
कलम छोड़कर जब लोगों ने कीबोर्ड थामा तो एकबारगी तो ऐसा लगा कि अब हिन्दी समाज
हीनता की ग्रंथि जल्द ही मुक्त हो जाएगा। क्योंकि अब कतरन फाड़कर दिखानेवाले भी
औकात में आ जाएंगें जो अबतक मुनादी किए फिरते थे कि देखोजी, हमारा छपा है। यहां
तो मामला एकदम से साफ है कि जिसको लिखना है लिखे, जैसा चाहे लिखे। जिसमें औकात
होगी, उसे लोग पढ़ेंगे। संपादक जैसे किसी भी नॉलेज ब्राकर की जरुरत नहीं है। आप
ही लेखक, आप ही संपादक और जो कुछ भी आर्थिक मुनाफा होगा, उसके हकदार आप ही।
लेकिन, फिर उस कहावत का क्या होता-
*चल जाओ चाहे नेपाल, रहेगा वही कपाल।*
आमतौर पर हिन्दी समाज में कोई विचारधारा या तकनीक आती है तो उससे इस बात की
उम्मीद कर ली जाती है कि अब क्या, इसके आते ही सारी झंझटें दूर हो जाएंगी।
परिवार से लेकर व्यक्तिगत कुंठा तक सारी चीजें दूर हो जाएंगी। जबकि सच्चाई ये
है कि जब भी हम किसी चीज को अपनाते हैं तो उसे अपनी मानसिकता के साथ शामिल करते
हैं। इसलिए माध्यम के बदल जाने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता।
हिन्दी समाज में पॉपुलर होने का बहुत ही सीधा फंड़ा है। शुरु में लात खाओ और
बाद में लात मारने की कला सीखो और फिर लात मारने और गलती से खा लेने पर
बर्दाश्त करने की कला सीखो। इसे आप बने रहने का बेसिक फंड़ा भी कह सकते हैं और
इसी में अगर बरकत होती रही तो बने रहने से आगे की स्टेप जिसे अपनी भाषा में
मठाधीशी भी कहते हैं। इस फार्मूले के तहत लिखते-पढ़ते रहने से कभी मलाल नहीं
होता, कुंठा कभी पनपने नहीं पाती।
खुल के बोल वाले भायजी अगर आप इतनी बात समझते हैं, समझते तो हैं ही, बस ध्यान
से उतर गया होगा तो अब आपको समझने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि पांच हजार
के ब्लॉग के बीच तीन ही क्यों।...और जबाब मिलते ही मलाल थूक दीजिएगा, प्लीज....
।।।
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