[दीवान]मीडिया घोटाला इन इंग्लिश जर्नलिज्म

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Mon May 19 16:31:16 IST 2008


इंडियन ऑथिरिटी अभी तक जिन घोटालों को मानने से इन्कार करती आयी है, ये उससे भी
बड़ा घोटाला है। मुझे नेताओं से ज्यादा गुस्सा उन पत्रकारों पर आया। द टाइम्स
ऑफ इंडिया भारत का सबसे बड़ा अखबार है और उसने जीविका के लिए भोपाल से दिल्ली
आए लोगों के बार में एक शब्द नहीं लिखा.
( The fact that the Times of India, which is the biggest paper here, never
said a word about the bhopal survivors coming to delhi...I find it more of
scandal than the indian authorities who refused to receive them. i'm much
angier at them than at the poiticians.
DOMINIQUE LAPIERRE, interview with Raghu Karanad, tehelka. vol 5, page no-
45 issue 20, 24 MAY 08)
25 वर्षों से भोपाल और देश के दूसरे हिस्सों में लगातार काम करनेवाले, सिटी ऑफ
ज्वॉय, फ्रीडम एट मिडनाइट और फाइव पास्ट मिडनाइट इन भोपाल के लेखक डॉमिनिक
लैपीअरे ने देश के एक बड़े अखबार के रवैये पर टिप्पणी करके भारत में काम कर रही
मीडिया के सच को हमारे सामने लाकर रख दिया.
लैपीयरे को इस साल पद्म भूषण से नवाजा गया है। वो पिछले पच्चीस साल से भोपाल,
बंगाल और देश के दूसरे हिस्सों में लगातार सेवा का काम करते आ रहे हैं।
हिन्दुस्तान की स्थिति और यहां की संभावनाओं पर किताब लिखते रहे हैं। हममें से
सब ए सिटी ऑफ ज्वॉय के कायल रहे हैं। अपनी अभिव्यक्ति और काम के मामले में वो
उतने ही भारतीय हैं जितने कि आप और हम। इसलिए अगर उनकी बात को एक भारतीय की भी
बात के रुप में शामिल करके समझें तो मुझे नहीं लगता कि कोई परेशानी है।
लैपीअरे ने भोपाल गैस कांड के बाद अपनी जीविका के लिए भोपाल से पलायन कर दिल्ली
आकर रोजी-रोजगार खोजनेवालों के बारे में बात करते हैं। उनकी परेशानियों को
समझने की कोशिश करते हैं और इसी बीच उन्हें एक बड़ी सच्चाई हाथ लगती है कि द
टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे अखबार ने इन लोगों की परेशानियों के बारे में एक शब्द भी
नहीं लिखा। आप इसे क्या कहेंगे। कोई चूक, नजरअंदाज कर जाना, अखबार में स्पेस की
कमी होना या फिर ऐसी खबरों का कोई खास मतलब नहीं होना। या फिर कुछ और....
लेकिन लैपीअरे के हिसाब से ये घोटाला है। उन घोटालों से भी बड़ा घोटाला जिसे कि
सरकार या प्रशासन तंत्र पचाने की कोशिश करती है, दबाती है, मानने से इन्कार
करती है या फिर जांच के नाम पर कालीन के नीचे दबा देती है...और जब पत्रकार भी
कुछ इसी तरह की कोशिशें करते हैं तो लैपीअरे को नेताओं से ज्यादा गुस्सा
पत्रकारों पर आता है।
नेताओं पर गुस्सा आना एक इस्ट्रीम पोजिशन है। उससे ज्यादा गुस्सा आपको किसी पर
भी नहीं आ सकता. क्योंकि हमारे सामने उनकी छवि ऐसी है कि हम मानकर चलते हैं कि
उनसे ज्यादा कोई भ्रष्ट नहीं है लेकिन लैपीअरे को उससे भी ज्यादा गुस्सा आता है
इन पत्रकारों पर जो कि मुद्दों को दबाने का काम करते हैं। आप इन पत्रकारों को
क्या कहेंगे.......?
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