[दीवान]मीडियानगर ः एक आवश्यक पहल
chandma1987 at gmail.com
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Wed May 21 13:52:17 IST 2008
समीक्षा
मीडियानगरः एक आवश्यक पहल
कैलाश दहिया
मीडियानगर ऐसे सामूहिक प्रयास का नतीजा है जो चीज़ों को अलग ढंग में देखना
चाहती है। हिन्दी मे ऐसी पत्रिका की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। जिसे सराय ने
भरने की कोशिश की है। सराय अर्थात् 'विकासशील समाज अध्ययन पीठ का कार्यक्रम'
इसका यह तीसरा अंक है जो नेटवर्क-संस्कृति की विशद व्याख्या पर आधारित है। इससे
पहले इसके दो अंक क्रमशः दिल्ली पर एकाग्र और उभरता मंज़र थे। नेटवर्क-संस्कृति
के इस विशेष अंक में सिनेमा, संगीत, इश्तहार, मीडिया पायरेसी और हिन्दी जासूसी
उपन्यासों की भी पड़ताल की गई है। सिने माहौल शीर्षक के अंतर्गत तीन लेख शामिल
किए गए हैं जिसमें रवि वासुदेवन का लेख सिनेमा में शहरी बेचैनी पर गंभीर आलेख
है। इसमें 'जंज़ीर' से लेकर 'सत्या' तक के पात्रों के माध्यम से इस बेचैनी को
देखने की कोशिश की है। लेकिन मिहिर ने प्रसून जोशी पर टिप्पणी में थोड़ी जल्द
बाज़ी दिखाई है। अभी कबीराई कुछ और समय की माँग करती है। इसी तरह संगीत
संस्कृति में हरियाणा में कैसेट संस्कृति पर दीपक काद्यान ने अपने लेख में
ख़ासी रिसर्च की है।
वीडियोलीला में खदीज़ा आरिफ़ का लेख ज़ाकिर नगर की गलियों से गुज़रते हुए लगभग
हर गली क़स्बे की रिपोर्ट है। उस समय हर जगह यही चल रहा था। लेकिन यह कथन कि
केबल आने से वीडियो हाउस को फ़ायदा ही हुआ अतिशयोक्तिपूर्ण है। बल्कि केबल ही
वह व्यवसाय है जिसने वीडियो हाउस का बोरिया बिस्तर गोल कर दिया। जैसा कि अब डी.
टी.एच. केबल को समेटने की ओर अग्रसर है। और रहमत भाइयों से तो यह शहर भरा पड़ा
है। इन रहमत भाइयों ही ने तो फ़िल्म, संगीत, प्रकाशन और ऐसे ही धंधों की बैंड
बजा रखी है कॉपीराईट इनके आगे धूल चाटता है और हम इन्हें हाइलाइट कर रहे हैं।
असली रहमत भाई कभी समाने नहीं आते।
मीडियाचार में सम्मिलित लेख महत्त्वपूर्ण हैं। आनंद प्रधान ने नागरिक
पत्रकारिता के विभिन्न पहलुओं को बताते हुए उसकी संभावना की चर्चा की है। ऐसे
ही अरूंधति राय ने प्रायोजित ख़बर के बहाने जो ताना-बाना बुना है, वह बहुत से
सवाल खड़े करता है। इसी बहाने वे नई ख़बर की आड़ में पुरानी हुई महती ख़बर के
लिए आगाह करती हैं। स्वयं अरूंधती लिखती हैं अब होने यह लगा है कि सरकारें संकट
को तब तक टालती रहती हैं जब तक वह ख़ुद ही निष्प्राण नहीं हो जाता। दरअसल
सरकारें यह बात जानती हैं कि संकट अल्पजीवी ही होता है। वे यह बात भी जानती हैं
कि मीडिया एक संकट के बारे में बहुत दिनों तक बात नहीं कर सकता। उसे जिन्दा
रहने के लिए हमेशा अगले संकट का इंतज़ार रहता है। जिस तरह व्यावसायिक घरानों को
एक वक़्त के बाद अपनी पूँजी दूसरी जगह लगानी पड़ती है उसी तरह मीडिया को भी एक
समय के बाद नए संकट की दरकार होती है। इसी खंड में फ़िल्म मेकर संजय काक का
इंटरव्यू डॉक्यूमैंट्री फ़िल्मों के बहाने नए तथ्यों की ओर इशारा करता है जिससे
हमें परिचित होना चाहिए।
पर्दे पर ख़बर खंड में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की हरकतों का प्रदाफ़ाश किया गया है,
चाहे ब्रेकिंग न्यूज़ की हक़ीक़त हो या चैनलों की भाषा। वैसे ब्रेकिंग न्यूज़
की समझ अब कुछ-कुछ दर्शकों को भी होने लगी है। ख़बरों की ख़बर के लिए लोग अभी
भी दूरदर्शन पर ही भरोसा करते हैं, यह भी तथ्य है। रमोला की प्रेम कहानी के
बहाने चैनलों की अच्छी पोल खोली गई है। कैसे एक कुतिया के पिल्लों के जन्म का
लाइव टेलीकास्ट किया गया।
इश्तहारनामा पर एक अलग खंड है जिसमें सम्मिलित लेखों में सैलवोज एडवटाईज़िंग
लेख में मह्त्वपूर्ण जानकारी है। सैलवोज ऐडवटाईज़िंग अर्थात् सिनेमा हॉल में
दिखाए जाने वाले विज्ञापन। इसमें उनकी कमर्शियल वैल्यू के साथ-साथ उसके बाज़ार
की पड़ताल की गई है। एक तथ्य इसमें यह भी है कि सिनेमा हॉल की स्थिति, उसमें
मिलने वाली सुविधाएँ और फ़िल्म रिलीज़ होने की तारीख़ के अनुसार ही उस हॉल को
मिलने वाले विज्ञापन दरों को निर्धारित करते हैं, दुकानों मार्किट में लगे साइन
बोर्डों के बारे में लेखक का एक मह्त्वपूर्ण कथन है मैंने यह पाया कि साइन
बोर्डों की क्वालिटी व उस पर लिखे संदेश फ़ैशन के साथ-साथ इस बात से प्रभावित
होते हैं कि वहाँ कैसे ग्राहक आ सकते हैं। इसलिए सदर बाज़ार की बड़ी-बड़ी थोक
की दुकानें जंग खाते पुराने साइन बोर्डों से काम चलाते दिखते हैं, जबकि करोलबाग
के छोटे-छोटे दुकानदार भी चमकीने और प्रकाशित साइनबोर्ड रखते हैं। इसी अध्या
में एक तथ्य यह भी है कि दिल्ली के लोग चीज़ों को ज्यादा कौतुहल अंदाज़ से
देखते हैं बजाए पटना या हाजीपुर के। और बग़ैर उन्वान के जैन क्लीनिक तो हर छोटे
-बड़े शहर में भरे पड़े हैं।
शीर्षक खंड जो नेटवर्क-संस्कृति पर आधारित है। इसके पहले लेख नेटवर्क के
सिद्धांतः आलोचनात्मक इंटरनेट संस्कृति में गीर्यट लोविंक नेटवर्क के बनने और
बिगड़ने की प्रक्रियाओं एवं चरणों का ज़िक्र करते हैं। इसका दूसरा अध्याय 'कला
कर्म x टीके' एक महत्त्वपूर्ण आलेख है जिसमें 'इक्कीसवीं' सदी के नव मज़दूरों
की पड़ताल की गई है। ये मज़दूर कॉल सेंटरों की चमकती दुनिया में काम करते हैं।
यह एक रोटक व्याख्या है। ज़रा देखें इक्कीसवीं सदी का मज़दूर भी कलाकार है
क्योंकि वह मायने रचकर मूल्य पैदा करता है। अपने रूटीनी काम के तहत वह रचना, शोध
व व्याख्या इस तरह करता है कि उसे शोधार्थी या कलाकार माना जाए, ख़ास तौर पर तब
जब शोधार्थी या कलाकार से हमारी मुराद ऐसे किरदार से हो जो अर्थ या ज्ञान की
रचना करे। सूचना तक़नीक से चालित कॉल सेंटर और रिमोट डेटा आउटसोर्सिंग उद्योग
में कार्यकत मज़दूरों की दशा इसकी बेहतरीन मिसाल है, जिसने मज़दूरी की एक नई
वैश्विक संरचना गढ़ी है, और तथाकथित वैश्वीकरण को कलात्मक मंच और रुझान दिया
है। इस अध्या में एक अलग तरह की ज़िद है जो नई आकृतियाँ बनाने और संवाद आरंभ
करने पर ज़ोर देती है। यह एक महत्त्वपूर्ण आलेख है।
इबारत-ए-शहर नामक खंड में 1940 के दशक में कानपुर की अख़बारी राजनीति के ज़रिए
उस समय की राजनीति की पड़ताल की गई है। इन पंक्तियों के सहारे हम लेख के महत्व
का अंदाज़ा लगा सकते हैं 'चालीस' के दशक के मध्य तक आते-आते पाकिस्तान के विचार
के जन्मदाता की छवि के सिवाय जिन्ना की कोई और पहचान बाकी नहीं बची थी।
पाकिस्तान के हवाले से जिन्ना को एक ऐसे बालक की तरह पेश किया जाता था जो अपने
बाप का बाप बनने की कोशिश कर रहा है। दूसरी तरफ़ गाँधी मोटे तौर पर हिन्दुओं का
नेतृत्व कर रहे थे जो वर्तमान की राय में उदासीन, सुप्त राष्ट्रवादियों का
समुदाय था, एक ऐसा समुदाय जिसका 'राजनीतिक आचरण कायरता में, और धार्मिक उत्साह
काहिली में डूबा हुआ है और जो सामाजिक तौर पर छिन्न-भिन्न है।' संक्षेप में, एक
ऐसा समुदाय, जो अपनी अकर्मणयता को सहिष्णुता का नाम देकर गंगा नहा लिया था। इसी
खंड में हिन्दी में जासूसी उपन्यास लेखन का इतिहास खंगाला गया है। जिसका
निष्कर्ष यह है कि अगर जासूसी साहित्य हिन्दी में न आया होता तो आज हर ओर
अश्लील पुस्तकों का बोलबाला होता। वैसे इस आलेख का अलग भाग लिखे जाने की
गुंजाईश लेखक ने छोड़ी है, जो मेरठ पर केन्द्रित होने की संभावना है।
अपने कलेवर और आकार में मीडियानगर पूरे पुस्तकाकार में है। साज-सज्जा आकर्षक
है। जहाँ तक आलेखों की बात है, कई बहुत महत्त्वपूर्ण हैं तो कई पुराने होने की
वजह से अप्रासंगिक हो गए हैं। अधिकांश लेख अनुवादित हैं, जिसमें कई लेखों में
जटिलता आ गई है। सराय से उम्मीद है कि अगले अंकों में मूल हिन्दी आलेखों को
ज़्यादा स्थान मिलेगा, फिर भी हिन्दी पाठक के लिए मीडियानगर पठनीय एवं
संग्रहणीय अंक है।
--
Chandan Sharma
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