[दीवान] Fwd: [BBC] nida fazli
Ravikant
ravikant at sarai.net
Mon Nov 10 15:34:58 IST 2008
शुक्रिया शशिकान्त जी
जिन लोगों ने बीबीसी हिन्दी पर निदा फ़ाज़ली के हालिया आलेख नहीं देखे हैं, वे यहाँ जाकर देख सकते
हैं.
रविकान्त
कल्चर तालाब का ठहरा हुआ पानी नहीं
http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2007/09/070927_nida_column.shtml
निदा फ़ाज़ली
शायर और लेखक
मेरी बेटी का नाम तहरीर है. तहरीर अरबी भाषा का शब्द है.
यह शब्द अरब के रेगिस्तान से चल कर गंगा के मैदान में आया और हिंदुस्तानी बोली में घुलमिल गया. इसे
फारस में दस्तावेज़ और आम जुबान में लिखावट भी कहते हैं, ये तीनों शब्द साथ-साथ एक ही शब्द कोष
में रहते हैं.
इनमें से लिखने वाले को इबारत के अनुसार जो लफ्ज़ जँचता है उसे आसानी से इस्तेमाल कर लेता है. इस
चयन में कोई राजनीतिक मतभेद का दबाव नहीं होता, लेखक की समस्या केवल अभिव्यक्ति होती है.
कौन सा शब्द कहाँ से चलकर कहाँ आता है और कैसे किस भाषा का हिस्सा बन जाता है, यह क़िस्सा
भाषा विज्ञान का है.
शब्दों के इस आदान प्रदान में शब्दों के उच्चारण भी बदल जाते हैं और कभी-कभी इनके अर्थ भी तब्दील
हो जाते हैं. ग़ालिब के समकालीन लखनऊ के ख्वाजा हैदर अली आतिश थे. उनकी गज़ल की पंक्ति है, ‘मैं
जहाँगीर हूँ तू नूरजहाँ बेगम है’
उनके युग में एक जानकार ने उनपर शब्द को ग़लत इस्तेमाल करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा, यह
शब्द तुरकिस्तान का है और तुर्की भाषा में इसे ‘बेगुम’ बोला जाता है. आतिश का जवाब था मैं तुर्की
नहीं, अपने देश की भाषा में इसे लिख रहा हूँ. इसलिए बेगम उचित है.
उलट अर्थ
एक शब्द है गुमान, फारसी में इसे यक़ीन से उलट शक के अर्थ उपयोग किया जाता है. मीरा बाई ने एक
कृष्ण-गान में इसे गर्व के अर्थ दिए हैं. 'मुरलिया काहे गुमान भरे'.
शब्दों का मेलजोल, कल्चर के व्यापक रूप का एक अंग है और कल्चर तालाब का ठहरा हुआ
पानी नहीं होता, लहरों में बहता सागर होता है, जिसमें विभिन्न दिशाओं से नदियाँ आती हैं और सा
गर में सागर बनती जाती है. नदियों के नाम अलग-अलग होते हैं परंतु सागर को हमेशा एक नाम से ही
पुकारा जाता है, जो सांस्कृतिक शुद्धता का राग आलापते हैं वे अपने एक डेढ मीटर के गज़ से धरती के
विस्तार को नापते हैं. जो ग़लत है
अंग्रेज़ों ने 1857 से 1947 तक भारत पर राज किया. हमने विदेशियों देश छड़ने पर विवश किया लेकिन
उनके शब्द स्टेशन, साइकिल आदि उनके साथ नहीं जाने दिया. शब्दों का मेलजोल, कल्चर के व्यापक रूप
का एक अंग है और कल्चर तालाब का ठहरा हुआ पानी नहीं होता, लहरों में बहता सागर होता है,
जिसमें विभिन्न दिशाओं से नदियाँ आती हैं और सागर में सागर बनती जाती है. नदियों के नाम
अलग-अलग होते हैं परंतु सागर को हमेशा एक नाम से ही पुकारा जाता है, जो सांस्कृतिक शुद्धता का
राग आलापते हैं वे अपने एक डेढ मीटर के गज़ से धरती के विस्तार को नापते हैं. जो ग़लत है.
हमारे रहन-सहन, खान-पान, नियम कायदे वक़्त के साथ बदलते रहते हैं, देशी-विदेशी, प्रभाव इनमें
चलते रहते हैं. आलू लंदन से आया और हमारे भोजन का ज़रूरी हिस्सा हो गया. मिर्च पुर्तुगाल से चलकर
आई और हमारे स्वाद में शामिल हो गई. सिख धर्म का पावन ग्रंथ भारत में एक में अनेकता की झाँकी
की सबसे बड़ी मिसाल है, इस ग्रंथ में प्रथम पांच गुरूओं के उपदेशों के साथ भाषा और क्षेत्रीयता
की सारी सीमाओं से दूर होकर, इसमें बनारस के कबीर भी हैं और चालपटन के फरीद भी हैं
मराठी भाषी नामदेव भी है...इस तरह इसमें विभिन्न प्रांतों और संस्कृतियों की कुछ बोलिया शरीक
हैं. फिराक़ साहब कल्चर की पलपल बदलती इस प्रकृति को बहुत सुंदर शब्द दिए हैं.
सरजमीने-हिंद में अकवामे आलम (संसार की कौमें) के फिराक़
कारवां आते गए हिंदोस्ताँ बनता गया
फिराक़ के इसी शेर के ख़याल को मजरूह ने अपने अंदाज़ में यूँ पिरोया है
मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया
हर तहज़ीब आते-जाते कारवाँ के मेल-मिलाप की कहानी सुनाती है और सुनने वाले को यह समझाती है कि
मानव जीवन किसी कालखंड में लगी हुई तस्वीर नहीं है. चलते हुए समय के साथ बदलती हुई तहरीर है.
इस तहरीर को पढ़ने के लिए खुली आँखों और रौशन दिमागों की ज़रूरत होती है. जो हमारे
देश में शिक्षा की कमी या शिक्षा के राजनीतिकरण के कारण कम ही दिखाई देते हैं.
राजनीति को सोचने वाले ज़ेहनों से अधिक बिना सोचे चलने वाली भेड़ बकरियों की ज़रूरत होती है,
भेड़-बकरियों को इंसान बनाने का खतरा मोल लेना कोई नहीं चाहता, इन्हीं भेड़-बकरियों के सहारे
जब धर्म के नाम पर देश का विभाजन हुआ और पाकिस्तान वजूद में आ गया तब जिन्ना भी पाकिस्तान
की प्रथम लोकसभा में क़ायदे आज़म की सेक्यूलर तकरीर पर टिप्पणी करते हुए, पाकिस्तान के ही एक
इतिहासकार शाहीद जावेद बर्क़ी ने अपनी पुस्तक 'फिफ्टी इयर्स ऑफ़ नेशनहुड' (पाकिस्तान निर्माण
के पचास साल) में लिखा था, "क्या जिन्ना उस दो कौमी नज़रिए को नकार रहे हैं जो पाकिस्तान
की बुनियाद है...क्या इससे यह नतीजा निकाला जाए कि जिन्ना ने मज़हबी दीवानगी को हवा देकर
भारत को टुकड़ों में बँटवाया", इस टिप्पणी में शाहिद जावेद ने कई चुभते हुए सवाल पूछे थे, लेकिन जि
न्ना अपने जीवन के अंत तक इन प्रश्नों के सीधे जवाब नहीं दे पाए.
गुमनामों की सिर्फ़ गिनती है उनके नाम नहीं होते. पहले की तरह आज भी लोगों को बुश या सद्दाम
हुसैन के दो नाम ही याद है. इराक या अफगानिस्तान में जो लाखों बेकसूर ख़त्म हुए उसकी कोई फहरि
स्त आज तक सामने नहीं आई
राजनीति के पास अपने कार्यों के तर्क होते भी नहीं...जिन्ना साहब की यह तकरीर उस वक़्त की है
जब वह उद्देश्यपूर्ति के बाद, ली़डर से इंसान बने थे. लीडर से इंसान बनने के अंतराल में जो कुछ हुआ
वह अब इतिहास का किस्सा है. इस किस्से में थोड़ा सा मेरा भी हिस्सा है. अपने इस हिस्से को मैं
अपनी शायरी में टुकड़ा-टुकड़ा बयान करता रहता हूँ. कभी बिछड़ी हुई माँ के बहाने, कभी कराची में
कब्र बने पिता के बहाने कभी उधर से उधर होते हुए लाखों के कत्लों ख़ून के ज़रिए.
गुमनामों की तलाश
लीडर या शासक के इन्सान बनने की यात्रा सराही जाती है और ऐसा होना भी चाहिए. लेकिन इस
परिवर्तन से पहले जो कुछ हो चुका होता है उसकी प्रशंसा नहीं होती उस पर केवल आंसू ही बहाए जा
सकते हैं. सम्राट अशोक भी अशांति से निकलकर शांति की ओर आए थे, लेकिन उनका यह
सफ़र कालिंग की युद्ध में तीन लाख जीती-जागती लाशों से गुज़रने में पूरा हुआ था. यह और बात है इति
हास में अशोक सम्राट हुए और तीन लाख उधर और उधर के सिपाही बारहबाट हुए. मेरा एक शेर है,
तारीख़ में महल भी है हाकिम भी तख़्त भी
गुमनाम जो हुए हैं वह लश्कर तलाश कर
इन गुमनामों की सिर्फ़ गिनती है उनके नाम नहीं होते. पहले की तरह आज भी लोगों को बुश या सद्दा
म हुसैन के दो नाम ही याद है. इराक या अफगानिस्तान में जो लाखों बेकसूर ख़त्म हुए उसकी कोई
फहरिस्त आज तक सामने नहीं आई. कही शिया-सुन्नी के विवाद पर आम आदमी मरते हैं, कही
हिंदू-मुस्लिम बनकर जान से गुज़रते है...कहीं ईसाइयत और इस्लाम को जंग का मुद्दा बनाया जाता है
कहीं कोल-सफ़ेद का झंडा उठाया जाता है-मगर यह सारा खेल तमाशा मुट्ठी भर लोगों के द्वारा रचा
या जाता है.
मेरी बेटी तहरीर की माँ गुजरात की हिंदू है. वह जिस स्कूल में जाती है उसे ईसाई मिशनरी चलाती है
और वह बिल्डिंग में जिन अपनी उम्र के बच्चों के साथ वक़्त बिताती है उनके माता पिता कई धर्मों,
कई भाषाओं और प्रांतों के हैं. इस हिसाब से उस की परवरिश में थोड़ा सा हिंदुत्व है, थोड़ा सा
इस्लाम है थोड़ी सी ईसायत है, थोड़ा सा बौद्धमत है और थोड़ी सी गुरुनानक की रूहानियत है. और
वह जिन मूल्यों के साथ बड़ी हो रही है उनका नाम इंसानियत है.
अंग्रेज़ी भाषा के कवि वर्ड्सवर्थ की एक कविता की पंक्ति है, 'चाइल्ड इज़ दी फ़ादर ऑफ मैन' (बच्चा
बड़ो का उस्ताद होता है) यह पंक्ति जब पढ़ी थी उस समय इसका अर्थ साफ़ नहीं था, लेकिन एक दि
न तहरीर की बात सुनी तो पंक्ति का अर्थ भी खुला और कवि की सच्चाई पर यकीन भी आया.
हुआ यूँ, एक दिन वह मेरे घर के किचन में, अपनी माँ के छोटे से मंदिर के सामने हाथ जोड़े नज़र आई. मैं
जब अपनी लाइब्रेरी की तरफ़ जा रहा था तो मेरी नज़र उस पर पड़ी. उसे इस रूप में देखकर मैंने उससे
मजाक़ में पूछा...क्या कर रही है, उसने आँखे खोलकर गंभीरता से उत्तर दिया, "जयजय कर रही हूँ."
मैंने उसके जवाब को सुनकर आवाज़ बदल कर कहा, "जयजय नहीं अल्ला-अल्ला करो". मेरी बात सुनकर
वह उस वक़्त तो खामोश रही...लेकिन जब मैं अपनी लाइब्रेरी में यगानाचंगेज़ी की एक ग़ज़ल का मक़्ता
( वह शेर जिसमें शायर अपना उपनाम इस्तेमाल करता है) पढ़ रहा था,
कृषण का हूँ मैं पुजारी अली का बंदा हूँ
यगाना शाने ख़ुदा देखकर रहा न गया
तो वह खामोशी से मेरे पास आई और उसने कहा, "पापा अल्ला और जयजय एक ही होते हैं."
More information about the Deewan
mailing list