[दीवान]Fwd: Re: गुलजार: बिरहा की रात का जलना

Ravikant ravikant at sarai.net
Tue Sep 16 17:46:54 IST 2008


sadan ji,

bachpan se lekar aaj tak mujhe bhi 'jeevan ke do pahloo hain hariyali aur 
rasta' ka matlab samajh mein nahin aaya hai. aapki pahli baat abstract mein 
sahi hai. lekin fan likh dene bhar se main aapke is ilzaam se sahmat nahin ho 
sakta. shukriya. vaise maza aa raha hai to likho

ravikant

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Subject: Re: गुलजार: बिरहा की रात का जलना
Date: मंगलवार 16 सितम्बर 2008 15:37
From: "Sadan Jha" <sadanjha at gmail.com>
To: ravikant at sarai.net

thanks. lekin main saayad baat aage badhaun. dekhiye kuch baatain
mujhe bhi paresaan karti hai. jab hum kisi lyricist se apne ko connect
karte hain to kya unki baat ko tarjih na dain jo parchewaaj aalochak
hote hain ( parchewaaj aalochak isliye ki aise logon ki aalochana
netao ke bhashan jaisi hoti hai. par unka bhi to apana ek wajood hota
hi hai.
dekhiye aage likh pata hun ya nahi.
haan kandhe ka til aapne sahi yaad dilaya, lekin un dino jab hum log
film baad main dekhte the aur geet pahle sunate the to saayad yah
jehan main nahi aata tha ki mardon ke sarir ke liye bhi upma ho sakti
hai. yah baat factual level par ekdam galat hai, aaj ki taarikh main
main saayad yadi jaankari ke taur par likhun to galat aur atpata hi
hoga. par un dino ki yaad, wo apane man hi main khichari pakaate
jaanaa kuch alag hi tha. hum log til hamesha heroin ke badan par hi
sochate the.
warmly,
sadan.

2008/9/16 Ravikant <ravikant at sarai.net>:
> बहुत ख़ूब सदन. सच में कुछ तो हमारे विषय का भी असर होता ही है कि कभी-कभी हम
> शायर हो जाते हैं, जैसा कि आप हुए जा रहे हैं. बतौर बेशर्म गुलज़ार फ़ैन मैं
> सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूँ कि 'काँधे का तिल' यहाँ अनुराधा पटेल कह रही है,
> नसीरूद्दीन शाह के लिए, अब चाँद जैसी ज़नाना उपमा का विपर्यय अगर गुलज़ार
> करेगा तो उसे तो महेन्द्र के मर्दाना, मांसल कंधे पर ही टिकाएगा न! सिर पर तो
> वैसे भी 'चंद्रशेखर' का क़ब्ज़ा सदियों से चला आ रहा था.
>
> और रही बात आपके दोस्त की, तो फ़क़त ईंट की क्रांति ऊन्हें मुबारक हो. उनकी
> हवा हवाई क्रांति के लिए हम गुलज़ार का ठोस रोमांस तो नहीं छोड़ेंगे! ठहरेपन
> की आवारगी का विरोधाभास भी ख़ूब रहा!
>
> रविकान्त
>
> मंगलवार 16 सितम्बर 2008 12:59 को, आपने लिखा था:
>> vatsanurag.blogspot.com
>> गुलजार को रवींद्र व्‍यास के जरिये पढ़ना दिलचस्‍प भी और टीस देने बाला
>> भी। बहुत अटपटा लगेगा गुलजार को चाहने बालों को मेरा यह कहना। मैं खुद
>> पेशोपेश में रहता हूँ, गुलजार को लेकर। यह उलझन इक बारगी तो बयाँ करती है
>> एक कवि के शब्‍दों की ताकत को, जहाँ अर्थोँ की बहुलता है, वह पुकारता भी
>> है, पुचकारता भी, दुलारता भी और लतारता भी, समाज को बदलने की बहुत
>> प्‍यारी सी लतार– चप्‍पा चप्‍पा चरखा चले…
>> मैं जब से गीत के बोल समझने लगा, जब से यह पता चला कि सनिमा के गीत में
>> कोई भाषा, कुछ अर्थ होते हैं, तब से गुलजार का मुरीद बन गया। दरभंगा जैसे
>> छोटे शहर, अस्‍सी का गुजरता दशक, मध्‍यवर्गीय शिक्षक का पारिवारिक माहौल,
>> पढ़ने लिखने की चाहत, लड़कियों को चुपके से देखने और फिर उनके छाते की
>> रँगों या कान के झुमके को सोचते हुए खुद में ही खुश होते मैं और मेरे चंद
>> दोस्‍त। शेखर और भुवन में अपने को तलाशते, पिताजी के कार्ड पर लनामिवि
>> विश्‍वविधालय पुस्‍तकालय से ए ए बेल संपादित फ्रायड के लेखन से उत्‍साहित
>> हमलोग दिन गुजार देते, गुलजार के बोलों पर– एक सौ सोलह चाँद की रातें और
>> एक अकेला काँधे का तिल। सँख्‍या के गणित में एक अनोखी, अबुझ अलसाया सा
>> रहस्‍य हमेशा शेष रह जाता था, भोर के सपने की तरह। तिल है तो मधुबाला की
>> तरह ओठों के नीचे क्‍यो नहीं, चाँद तो फिर एक सौ सोलह क्‍यों? गुलजार के
>> यहाँ सब कुछ समेटने की जिद नहीं थी, जो बचा-खुचा छुटा रह जाता है उसके
>> चौखट पर ठहर कर समय गुजारने की, उसके साये से लिपट कर समय को खो देने की
>> कशिश है। एक ठहरेपन की आवारगी।
>> तो ऐसे में टीस कहाँ से आता है?
>> 'लेकिन' में टूटी हुई चुड़ियोँ से कलाईयाँ जोड़ी जाती है तो 'इजाजत' ली
>> जाती है सावन के भीगे भीगे दिनों को लौटा देने की। ये यादें हैं बीते हुए
>> अहसासों की रवायतें जो मीठा मीठा दर्द देती हैं। लेकिन टीस तो कुछ अलग
>> हुआ, है ना?
>> मेरे एक दोस्‍त ने अपने तेवर वाले जमाने में कहा, गुलजार क्राँति की ईंट
>> खिसकाकर वहाँ रोमाँस की हवा भर देते हैँ।
>>
>> 2008/9/11 Ravikant <ravikant at sarai.net>:
>> > sabad nirantar se saabhar.
>> >
>> > cheers
>> > ravikant
>> >
>> > ----------  आगे भेजे गए संदेश  ----------
>> >
>> > Subject: सखा पाठ : २ : गुलजार बजरिए रवींद्र व्यास
>> > Date: बुधवार 10 सितम्बर 2008 20:28
>> > From: "anurag vats" <vatsanurag78 at gmail.com>
>> > To: Wednesday, September 10, 2008
>> > सखा पाठ : २ : गुलजार बजरिए रवींद्र व्यास
>> > ( वे पेंटर हैं, कहनियाँ लिखते हैं, हरा कोना नाम का उनका ब्लॉग है और
>> > हिन्दी के इस वर्चुअल वर्ल्ड में उनकी सजग उपस्थिति चहुँ ओर सराही गई है।
>> > जब हमने सखा पाठ स्तंभ शुरू किया था तो उसके पीछे किसी रचना से प्रेरित
>> > रचना को सामने लाने की अवधारणा थी। सबद में ही रिल्के पर छपे राजी सेठ के
>> > लेख के बाद बतौर बढ़त गिरिराज किराडू की कविता दी थी। उसके बाद यह सिलसिला
>> > थम सा गया। रवींद्र व्यास के माध्यम से वह फिर से शुरू हुआ है। उन्होंने
>> > गुलजार की कविता पर न सिर्फ़ पेंटिंग दी, बल्कि इसरार करने पर गद्य भी
>> > भेजा। हम उनके आभारी हैं। )
>> >
>> > एक और रात
>> >
>> > गुलजार
>> >
>> > चुपचाप दबे पांव चली जाती है
>> > रात खामोश है, रोती नहीं, हंसती भी नहीं
>> > कांच का नीला-सा गुंबद है, उड़ा जाता है
>> > खाली खाली कोई बजरा-सा बहा जाता है
>> >
>> > चांद की किरनों में वो रोज-सा रेशन भी नहीं
>> > चांद की चिकनी डली है कि घुली जाती है
>> > और सन्नाटों की इक धूल उड़ी जाती है
>> >
>> > काश इक बार कभी नींद से उठकर तुम भी
>> > हिज्र की रातों में ये देखो तो क्या होता
>> >
>> > ****
>> >
>> > ये देखो तो क्या होता है
>> >
>> > गुलजार की जमीन और आसमान सरगोशियों से मिलकर बने हैं। ये सरगोशियां
>> > खामोशियों की रातें बुनती हैं। इन रातों में कई चांद डूबते-उतरते रहते हैं।
>> > कई टंगे रहते हैं, अपने अकेलेपन में जिनकी पेशानी पर कभी-कभी धुआं उठता
>> > रहता है। दूज का चांद, चौदहवीं का चांद और कभी एक सौ सोला रातों का चां द।
>> > कभी ये चांद किसी चिकनी डली की तरह घुलता रहता है। ये चांद ख्वाब बुनते
>> > रहते हैं। ख्वाबों में रिश्ते फूलों की तरह खिलते रहते हैं और उसकी खुशबू
>> > पलकों के नीचे महकती रहती है। ये रिश्ते कभी मुरझा कर ओस की बूंदों की तरह
>> > खामोश रातों में झरते रहते हैं।
>> >
>> > वे किसी गर्भवती स्त्री की तरह गुनगुनी धूप में यादों को गुनगुनाते महीन
>> > शब्दों से मन का स्वेटर बुनते हैं। इसमें उनकी खास रंगतें कभी उजली धूप की
>> > तरह चमकती रहती है। कभी इसमें सन्नाटों की धूल उड़ती रहती है। इसकी बनावट
>> > और बुनावट की धीमी आंच में रिश्तों के रेशे अपने दिलकश अंदाज में आपके मन
>> > को आपकी देह को रूहानी अहसास कराते हैं।
>> >
>> > कहते हैं किसी की आत्मा पेड़ों में बसती है। किसी आत्मा एक फूल में बसती
>> > है। कहते यह भी हैं कि आत्मा एक पिंड में बसती है। और यह भी कि आत्मा एक
>> > स्वर्ग में बसती है, एक मुहूर्त में बसती है। क्या कहा जा सकता है कि
>> > गुलजार की गीतात्मा चांद में बसती है। और चांद यानी रात भी। और रात यानी
>> > तारे भी। और तारे यानी समूची कायनात। और इसके बीच वह भी जिससे हिज्र की रात
>> > में कहा जा रहा है कि काश इक बार कभी नींद में उठकर तुम भी ये देखो तो क्या
>> > होता है...
>> >
>> >
>> >
>> > इस नज्म की पहली लाइन में रात के बहाने अपनी स्थिति बताने का एकदम सादगीभरा
>> > जलवा है। कोई बनाव नहीं। कोई श्रृगांर नहीं। लुभाने-रिझाने का कोई अंदाज
>> > नहीं। अकेलेपन में रात का चुपचाप, एकदम खामोश गुजरनाभर है। यह एक इमेज है।
>> > कहने दीजिए गुलजार इमेजेस के ही कवि हैं। दूसरी लाइन में कोई आहट नहीं, कोई
>> > गूंज नहीं। न रोना, न हंसना। एक अनकहे को पकड़ने की कोशिश। एक जरूरी दूरी
>> > पर खड़े होकर। न डूबकर, न उतरकर। अपने को भरसक थिर रखते हुए। तीसरी लाइन
>> > में रात के जादू को आकार में पकड़ने का वही दिलकश अंदाज है। इसमें चार
>> > चीजें हैं-कांच है, नीला है, गुंबद है और वह उड़ा जाता है। कांच, जाहिर है
>> > यह रात को उसकी नाजुकता में देखने की निगाह है। रात नीला गुंबद है। अहा।
>> > क्या बात है। इसमें एक कोई देखी मुगलकालीन भव्य इमारत की झीनी सी याद है।
>> >
>> > यह रात को कल्पना से तराशने का सधा काम है। रात को एक आकार देना। उसे
>> > देहधारी बनाना। और यह गुंबद है, जो उड़ा जाता है। यानी एक एक मोहक और मारक
>> > गति है। एक उड़ती हुई गति। जाहिर है इस गति में रात की लय शामिल है। बीतती
>> > लयात्मक रात। यह मोहब्बत का स्पर्श है जो गुंबद के भारीपन को किसी चिड़िया
>> > की मानिंद एक उड़ान देता है। विश्व विख्यात मूर्तिकार हेनरी मूर को याद
>> > करिए। वे पत्थर में चिड़िया को ऐसे ढालते हैं कि पत्थर अपने भारीपन से
>> > मुक्त होकर चिड़िया के रूप में उड़ने-उड़ने को होता है। यह फनकार की ताकत
>> > है, अपने मीडियम से मोहब्बत है।
>> >
>> > पांचवी लाइन बताती है कि यह शायर रातों की जागता है और रोज ही रातों को
>> > निहारता है। इसी जागने से यह एक और रात बनी है जिसमें कहा जा रहा है कि
>> > चांद की किरनों में वो रोज-सा रेशन नहीं। यह आपकी इंद्रियों का जागना भी
>> > है। कलाकार यही करता है। वह सभी इंद्रियों के प्रति आपको सचेत करता है। यह
>> > देखना-दिखाना भर नहीं है। छठी पंक्ति में चिकनी डली है। स्पर्श का अहसास
>> > है। फिर घुलना है। यह एक और रात कि घुली जा रही है। कि पर गौर फरमाएं। है न
>> > कुछ बा त। और सातवीं लाइन में इन सबसे घुल-मिल कर एक सन्नाटा रात की तरह ही
>> > फैलता जा रहा है। वे इसे उड़ती धूल में पकड़ते हैं। महीन धूल। आठवीं और
>> > नौवीं लाइन मारू है। यह रात का जो जादू है, उसकी सुंदरता का जो भव्य
>> > स्थापत्य है, अकेलापन है, सन्नाटा है और खामोश गुजरना भर है, इसमें एक
>> > ख्वाहिश भी है कि कोई हिज्र की रातों में नींद से उठकर इसे देखे। यह भी कि-
>> > ये देखो तो क्या हो ता है।
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Sadan Jha
Assistant Professor,
Centre for Social Studies.
Vir Narmad South Gujarat University Campus. Udhna-Magdalla Road.
Surat. Gujarat. India.
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