[दीवान]दिल्‍ली घेटो के एनकाउंटर की एक साइडलाइन रपट

Ravikant ravikant at sarai.net
Mon Sep 22 18:01:44 IST 2008


दोस्तो,

मैं इसके जवाब में विजेन्द्र का पहला पोस्ट भी डाल रहा हूँ मसिजीवी से उठाकर जो उन्होंने ग़ुस्से में 
आकर, विवेक खोकर लिखा है, वे ऐसा सोचते हैं. पर उन्होंने दोनों ही पोस्टों में विवेक की ही बातें 
की हैं. आसान नहीं है ऐसे समय में विवेक से बँधे रहना, पर जो लोग दीख रही, दिखाई जा रही,
 सच्चाई से दूर जाकर देख पाते हैं, अपने तजुर्बों के आईने में, अलोचनात्मक मेधा या प्रज्ञाशक्ति के बल 
पर वे निश्चय ही श्लाघ्य हैं. 

लेकिन मुझे दोनों पोस्टों पर की गई टिप्पणियाँ भी काफ़ी दिलचस्प लगीं. कुछ अपवादों को छोड़ दिया 
जाए तो यह बात कई लोगों ने स्वीकार की कि वे टीवी नहीं देखते, ऐसे ही कारणों से, ऐसी ही
 रिपोर्टिंग की वजह से. मैंने ख़ुद को अपने अंतरंग मीडिया-मित्रों से पिछले महीने दो महीने में यह 
कहते पाया है कि वह दिन दूर नहीं कि वे किसी चौक-चौराहे पर लोगों के ग़ुस्से का शिकार
 हो जाएँ. क्योंकि विवेक तो दरअस्ल वे खो देते हैं, पत्रकारिता का बुनियादी धर्म उन्हें याद 
नहीं रहता, अपनी नाक से आगे नहीं देखते, जो पिलाया जाता है गटक लेते हैं ख़बरों में डुबकी नहीं लगा
ते, चीख़ते-चिल्लाते हैं, रेटॉरिकल हो जाते हैं. तो विजेन्द्र जी मीडिया से दुराव महसूसने वाले सिर्फ़ 
अल्पसंख्यक नहीं हैं इस देश के - आप के पोस्ट पर की गई प्रशंसात्मक टिप्पणियों में सबसे ग़ौरतलब बात 
मुझे यही लगी. शुक्रिया

रविकान्त 

Saturday, September 13, 2008
दिल्‍ली के ये बम मीडिया के लिए सौदा हैं

http://masijeevi.blogspot.com/2008/09/blog-post_13.html

ये पोस्‍ट बेहद गुस्‍से में लिखी गई है, विवेक की उम्‍मीद न करें।

दिल्‍ली में इस वक्‍त कुछ बम विस्‍फोट हो रहे हैं। लोग मारे जा रहे हैं' ये दुकानदारी का समय है 
चैनलों के लिए। जिस पैमाने पर गैर जिम्‍मेदाराना रिपोर्टिंग अभी चल रही है, उसके बिना पर तो 
खुद इन चैनलों पर आतंकवाद फैलाने का मुकदमा चलना चाहिए। मौके पर खड़े पत्रकार शोर सुनते ही शो
र मचा रहे हैं नेशनल मीडिया में कि मानव बम मिला ... कमबख्त मुड़कर जॉंच भी नहीं रहे कि खबर 
है या अफवाह... दो ही मिनट बाद गुब्‍बारे वाला बच्‍चा- मानव बम नहीं .. सबसे अहम गवाह
 हो जा रहा है। मुझे तो लगता है कि मीडिया वालों से तो कहीं ज्‍यादा जिम्‍मेदार व पेशेवर खुद वे 
आतंकवादी हैं जिन्‍होंने बम प्‍लांट किए। उनका काम है आतंक फैलाना और वे वहीं कर रहे हैं। लेकिन ये 
कम्‍बख्‍त पत्रकार व चैनल क्‍या इनका काम भी आतंक फैलाना है..अगर नहीं तो वे क्‍यों ये कर रहे 
हैं।  कोई इन्‍हें बंद करो नहीं तो ये देश में आग लगवा देंगे- 



रविवार 21 सितम्बर 2008 11:15 को, Vijender chauhan ने लिखा था:
>  दिल्‍ली घेट्टो के एनकाउंटर की एक साइडलाइन
> रिपोर्ट<http://masijeevi.blogspot.com/2008/09/blog-post_20.html>
>
> मैंने एनकाउंटर की टीवी रिपोर्टिंग नहीं देखी थी, उस रिपोर्टिंग की
> रिपोर्टिंग<http://nitishraj30.blogspot.com/2008/09/blog-post_4757.html>जो
> ब्‍लॉग पर हुई उसे जरूर पढ़ा है। मुझे टीवी पर समाचार न देख पाने पर अब
> कोई
> मलाल नहीं होता, इस बार भी नहीं हुआ। पर मीडिया की भयानक तौर पर गिर गई साख से
> हो रही हानि को गहरे तौर पर बाद में अनुभव किया।
>
> सुबह स्‍टाफरूम में प्रवेश किया तो हवा में कुछ बदलाव था, महसूस करने में कुछ
> देर लगी। चुप्‍पाचुप्‍पी की फुसफुसाहट थी। मेज पर अखबार बिछे हुए थे...खबरों
> में एनकाउंटर ही छाया था। दरअसल कम से कम 10-12 शिक्षक साथी उसी इलाके से आते
> हैं जहॉं ये एनकाउंटर हुआ। उनका कहना था कि उस क्षेत्र के निवासियों की साफ
> राय ये है कि एनकाउंटर फर्जी था। जिन लड़कों को आतंकवादी कहकर मारा गया
> उन्‍हें दो दिन पहले ही उठा लिया गया फिर वापस लाकर उसका एनकाउंटर किया गया।
> इस मान्‍यता का स्रोत क्‍या है ये किसी शिक्षक मित्र को नहीं पता पर ये लोग भी
> इस राय से सहमत लग रहे थे। उनका कहना था कि यदि इंस्‍पेक्‍टर की मौत की घटना
> नहीं होती तो जामिया नगर में हालत विस्‍फोटक थी, वो तो इस मौत ने लोगों के मन
> में शक पैदा किया कि हो सकता है कि एनकाउंटर असली हो, पर तब तक तो वे तमाम
> मीडिया व पु‍लिस की बातों की तुलना में मोहल्‍ले की अफवाहों में ही ज्‍यादा
> यकीन कर रहे थे।
>
> 


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