[दीवान]तहलका बेचते हैं सैंडविच ब्ऑय
shashi kant
shashikanthindi at gmail.com
Mon Sep 29 19:07:30 IST 2008
rjdhani ki lalbattiyon par tahalka bechte hain chote-chote bacche- tt bhi
jante hain vineet ji jaise 15 august aur 26 january k aaspass tiranga
bechte hain bacche- desh ki mahila evam bal vikas mantri, varishth
naukarshah aur pardhanmantri evam rastrapati bhi jante hain.vichar
parikarama k liye interview kiya nehru place aur gk-1 men, ndtv ki lalbatti
par. 10 rupay k 2 jhande. kis desh ka jhanda hai? nahin batya.
hum laye hain tufan se kisti nikaal k is desh ko rakhna mere baccho sanbhal
k...................
vineet ji, ye bacche desh ko hi to sanbhal rahe hain, desh inhen bhale n
sanbhale.
jai hind!
shashikant
2008/9/29 vineet kumar <vineetdu at gmail.com>
> जिस मूल्य को लेकर तहलका काम कर रहा है, जिस बात को लेकर वह इलीट लोगों के बीच
> ट्रू जर्नलिज्म का ढोल पीट रहा है, आपको नहीं लगता कि वह औरों से भी घटिया काम
> कर रहा है। अब बताइए तहलका को क्या जरुरत पड़ गयी है कि जहां भी रेडलाइट है
> वहां वह सैंडविच ब्ऑय से मैगजीन बिकवाए। आपको क्या लगता है कि जिस रेडलाइट पर
> ये बच्चे तहलका के इश्यू लेकर आपसे-हमसे घिघियाते फिरते हैं, क्या कभी तरुण
> तेजपाल की नजर नहीं पड़ती होगी। वो तो अपनी एसी गाड़ी से आराम से गुजर जाते
> होंगे.
>
> एक न्यूज एजेंसी में काम करनेवाले मेरे एक साथी ने जब अपनी झल्लाहट मेरे सामने
> रखी तो अचानक से कोई तर्क मेरे दिमाग में नहीं सूझ रहा था कि मैं क्या बोलूं।
> मैं अब तक सिर्फ इतना जानता हूं कि तहलका एक हद तक ट्रू जर्नलिज्म कर रहा है.
> आप तहलका के मुकाबले बाकी के मीडिया हाउस में देख लीजिए- आदिवासी, गुजरात
> नरसंहार में तबाह हुए मुसलमानों, देश के किसानों और हाशिए पर के लोगों की
> कितनी
> नोटिस ली जाती है। मेरा दोस्त अड़ा हुआ था. चलो मान लिया कि वो उन सब की नोटिस
> ले रहा है जिनतक नेता भी इस लोभ से कि वोट मिलेंगे, नहीं पहुंचते, पत्रकारों
> की
> कौन बात करे।
>
> मैंने एक ही बात कही- देखो, मामला ऐसा है कि अब जो भी मीडिया हाउस,संस्थान या
> इन्टल लोग अच्छी बातें कहते और लिखते हैं, वो दरअसल समाज के भले के लिए कह रहे
> हैं, इससे सामाजिक जागरुकता आएगी, ऐसा उनके दिमाग में नहीं होता। यह सब लिखना
> और कहना उनके लिए नॉलेज प्रोड्यूस करना है, विचारों का उत्पादन भर है औऱ वो
> उत्पादन भर के लिए ही जिम्मेदार हैं। मसलन एक पत्रकार भ्रष्टाचार के विरोध में
> देशभक्ति पैदा करने के लिए जिम्मेदार है। उसकी रिपोर्टिंग में कितना
> प्रोफेशनलिज्म हैं कि वह ऑडिएंस के बीच यह भाव पैदा कर सके, उसकी काबलियत बस
> इतने भर से तय होती है कि ऐसा करने में वो किस हद तक सफल हो पाया है। जरुरी
> नहीं है कि वह खुद भी ऐसा ही व्यवहार करे। जो विचार और संदेश वो आंडिएंस को दे
> रहा है, उसे खुद भी मानने के लिए बाध्य नहीं है। अगर वो ऐसा नहीं करता है तो
> उसकी प्रोफेशनलिज्म मारी जाएगी।
>
> प्रोफेशनलिज्म एरा की एक बहुत बड़ी शर्त है कि लोग जिस चीज का उत्पादन कर रहे
> हैं उसको लेकर भावुक न हो जाएं। तुमने देखा है नोएडा और गाजियाबाद के किसी
> फैक्ट्री के मजदूर को कि वह जूते बनाने के बाद उसको लेकर भावुक हो गया हो। ऐसा
> है कि वह अगर नाइकी के जूते बना रहा है तो बाध्य है कि वो भी उसी कंपनी के
> जूते
> पहने ? उसका काम वहीं से खत्म हो जाता है तब वह बिकने लायक जूते बना देता है,
> दैट्स ऑल। फिलहाल अगर इस लिहाज से तहलका के सैंडविच ब्ऑय द्वारा बेचे जाने की
> बात को देखो तो मुझे नहीं लगता कि तुम्हें तरुण तेजपाल पर बहुत गुस्सा
> आएगा।....कहने को तो मुझे जो लगा, मैंने अपने दोस्त को कह दिया लेकिन इसी कड़ी
> में एक बात और याद आ गयी।
>
> मेरे एरिया के तहलका डिस्ट्रीब्यूटर ने बातचीत में एक बार मुझे बताया कि तहलका
> चार लाख से कम के विज्ञापन नहीं लेती है। उसके बताने का भाव कुछ इस तरह से था
> कि वह बाकी के मीडिया हाउस से तहलका को अलग करना चाह रहा हो। मतलब ये कि यह
> कोई
> हिन्दी चैनल नहीं है कि तीस रुपये की चड्डी से लेकर चालीस रुपये के हवाई चप्पल
> तक का विज्ञापन ले ले। तिसपर कि अभी हाथरस के शर्तिया इलाज का विज्ञापन आना
> बाकी है।..तहलका की औकात समझने-समझाने के लिए इतना काफी था।..और वैसे भी किसी
> भी मैगजीन, अखबार और चैनल की हैसियत इसी से बनती ही है कि वह किस-किस मंहगे
> उत्पादों के विज्ञापन जुटा ले रहा है।
>
> अब बारी पत्रकारों को दी जानेवाली सैलरी पर थी। मैंने कहा कि- सुना है, यहां
> काम करनेवालों को मोटी रकम मिलती है। इतनी कि कोई पत्रकार चाहे तो रबर की तरह
> दो-चार महीने में गाड़ी की साइज बढ़ा सकता है। अबकी मेरे दोस्त का पारा और गरम
> हो गया। लीजिए, अब देखिए। दुनियाभर की चीजों पर पैसा खर्च करने के लिए तहलका
> के
> पास पैसा है लेकिन डिस्ट्रीव्यूशन सिस्टम दुरुस्त करने के लिए पैसा नहीं है।
> आप
> सोचिए न कि जिस गरीब और अनाथ बच्चों की अंदर स्टोरी छपी होती है, मोटे
> विज्ञापनों के दम पर एकदम चिकने झकझक कागजों पर, उसे देखकर बच्चों पर क्या
> बितती होगी। मैंने भी जोड़ा- और कभी-कभी तो कवर पेज पर ऐसे ही बच्चों की
> तस्वीरें भी होती है। ट्रू जर्नलिज्म का फंड़ा ही है-देश की एक लाचार तस्वीर।
>
> *नोट- सैंडविच ब्ऑय मार्केटिंग का शब्द है। कम उम्र के बच्चों का ऐसा समुदाय
> जिसे मार्केटिंग एजेंसियां रेडलाइट या फिर भीडभाड़ इलाके में मैगजीन या
> किताबें
> बेचने के लिए पकड़ती है। इसके जरिए माल बेचना आसान होता है। संभव हो इसमें
> कमीशन को लेकर बचत भी ज्यादा होती हो। दिल्ली में तो मैंने कई जगहों पर फूल की
> जगह पाइरेटेड आर्गुमेंटेटिव इडियन, गॉड ऑफ स्माल थिंग्स सहित तहलका, आउटलुक और
> इंडिया टुडे जैसी पत्रिकाएं बच्चों को बेचते हुए देखा है। यहां पर आप मैगजीन
> की
> गुणवत्ता के कारण नहीं, इन बच्चों से पिंड छुड़ाने के लिए खरीदते हैं। आप पाठक
> की हैसियत से नहीं दाता की हैसियत से खरीदते हैं क्योंकि ये बच्चें बेचते नहीं
> लगभग भीख मांगते हैं। अब कोई कहे कि तहलका सहित बाकी पत्रिकाएं भीख मांगने की
> संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं तो ये तो वो ही जानें।*
>
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