[दीवान]तुम्हें पता है....वो लड़की SC है
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Mon Apr 6 01:31:08 IST 2009
वो अपने टिस्स के हॉस्टल(टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ सोशल साइन्सेज,मुंबई)का कमरा
छोड़कर,एनेक्जायटी डिस्ऑर्डर की स्थिति में,एम.फिल् कर रहे एक सीनियर दोस्त के
कमरे में दसों दिनों तक पड़ा रहा। चुपचाप,गुमसुम,बिना किसी को कुछ बताए, बिना
किसी बात पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर किए बगैर...। अगर उसी के शब्दों में कहूं
तो <span style="font-style:italic;">टिस्स में सबसे ज्यादा विजिवल दिखनेवाला
लड़का,ऐसा कैसे कर सकता है, सोचता हूं तो ताजुब्ब होता है। लेकिन इन सबके बीच
ये भी एक सच है कि कभी शराब को नहीं छूनेवाला,सिगरेट को कभी हाथ तक नहीं लगाया
और उस दिन पूरी की पूरी बोतल पी गया, कितना पानी या सोड़ा मिलाया पता नहीं, आठ
सिगरेट एक के बाद एक पी गया, कितनी कश मारी और कितने को फिल्टर तक आने पर भी कश
खींचता रहा, कुच भी याद नहीं। बस इतना याद करता हूं कि अगर मैं ट्रेन से सफर
करने जा रहा हूं और चढ़ने के पहले ही लड़खड़कर गिर जाउं तो मेरी जिंदगी का सबसे
बेहतरीन दिन होगा। मरने की स्थिति में इसके लिए न तो कोई जिम्मेवार होगा औऱ न
ही बच जाने की स्थिति में आत्महत्या के प्रयास में फिर से मौत को दोहराने जैसी
जिंदगी जीनी पड़ेगी। भैय्या, सबकुछ भूल जाने की स्थिति में मैं अब भी इस बात को
याद करता हूं, ऐसे जैसे कि ये मेरे साथ घटित हुआ है या फिर इसका कुछ न कुछ
हिस्सा अभी भी किस्तों में जी रहा हूं।</span> ये एक टिस्स से महीने भर में
सोशल वर्क की डिग्री लेकर दुनिया में समाज बदलने के जज्बे को लेकर संस्थान से
बाहर आनेवाले छात्र का सच है। यह एक उस छात्र का सच है जिसने तीन साल तक मीडिया
की पढ़ाई की, अखबारों में जमकर लिखा, आजतक में 45 दिनों तक आर्थिक खबरें
लिखीं,दिल्ली की समस्याओं पर "जनपथ" जैसे कार्यक्रमों में अपनी रुचि से जाता
रहा...हर बार एक नए विचारों के साथ,एक नयी बहस के साथा और एक नए अंदाज में हमसे
टकराता रहा,घंटों विडियोकॉन टावर के नीचे चार रुपये की मूंगफली पर हमें
दुनियाभर की नसीहतें देता रहा और अंत में कहता आया-<span
style="font-style:italic;"> भैय्या,आप तो मेरे से बड़े हैं,आप बेहतर जानते
हैं। </span>ये उस साथी का सच है जो एक समय में मीडिया के जरिए समाज को बदलने
के लिए नहीं तो कम से कम बेहतर करने के लिए बेचैन रहा और बाद में और अधिक
योगदान देने की नीयत से किसी चैनल में नौकरी करने के बजाय सीधे टिस्स मुंबई चला
गया। वहां जाकर वो लगातार मीडिया के उन माध्यमों पर काम करता रहा, वर्कशॉप में
जाता रहा जो कि कम लागत में लोगों को जागरुक कर सके, कभी सामुदायिक रेडियो को
समझने, एक महीने के लिए अहमदाबाद चला जाता,कभी हैदराबाद तो कभी "सेवा" के लोगों
के साथ वैकल्पिक मीडिया को लेकर प्रोजेक्ट पर काम करने लग जाता। मैं उससे एक ही
बात कह पाता- तुम जितना काम करते हो और वो भी अलग-अलग जगहों पर जाकर,मेरे लिए
तो काम करना तो दूर, सिर्फ वहां चला जाउं तो ही बहुत है। फोन पर तो कम ही लेकिन
ऑनलाइन होने पर एक ही बात कहता- <span style="font-style:italic;">एक बार समाज
को लेकर सोचिेए तो आप भी कर लेंगे।</span> हमेशा भीतर एक आग, कुछ करने की
छटपटाहट,एक ही बात- दिल्ली लौटूंगा भईया,और बेहतर होकर, और जोरदार तरीके। आज वो
बताता है कि उसे लो ब्लडप्रेशर हो गया है और वो दो दिनों तक हॉस्पीटल में भर्ती
रहा। ये टिस्स में पढ़ रहे उस छात्र का सच है जो कल कहीं भी जाएगा तो
बीस-पच्चीस लोगों के लिए गाइडलाइन तय करेगा कि समाज को बेहतर बनाने के लिए क्या
करने चाहिए, जैसा कि संस्थान का दावा है। आज वो देर रात कह रहा है, चैट करते
हुए कितना कहूं,क्या कहूं भइया और फिर उसने फोन ही कर दिया। उखड़ी हुई
आवाज,बार-बार बातों का टूटता क्रम और भीतर से एक डर भी कि कहीं आसपास कोई है तो
नहीं,बात करते हुए अब रो देगा कि तब। भइया, <span
style="font-style:italic;">ऐसी जगहों पर आकर हमारा कितना बड़ा मिथक टूटता
है,हम छोटे शहरों से आकर डीयू में पढ़ते हैं,टिस्स में पढ़ते हैं,मन के भीतर
औऱों से अलग और फिल्टर्ड होने का भाव होता है। हम यहां आकर जातिवाद को खत्म
करना चाहते हैं,सामाजिक भेदभाव को दूर करना चाहते हैं। दुनिया हम जैसे लोगों को
गरियाती है कि मोटी रकम देकर पढ़ने के बाद लोगों के खून चूसकर जमा किए पैसे को
सैलरी के तौर पर लेगा और कहता है कि समाज बदलेंगे। गुस्सा तो बहुत आता रहा कि
लोगों को ऐसा कहने का क्या अधिकार है लेकिन अब लगता है कि लोगों को गरियाने का
पर्याप्त अधिकार है। वो क्यों न गरिआएं, हम किसकी स्थिति सुधारने में लगे हैं।
किसके बीच से जातिवाद खत्म करना चाहते हैं,कौन-सा सामाजिक भेदभाव दूर करना
चाहते हैं, किसके लिए गाइडलाइन तय करने की ट्रेनिंग ले रहे हैं, अपने लिए या
फिर उन गरीबों के लिए, देश की गटर में पैदा होकर दम तोड़नेवालों के लिए जो कल
एनजीओ में जाने पर वो हमारी भाषा तक नहीं समझेंगे।..औऱ हमारे लिए
जाति,भेद,उंच-नीच,ब्राह्मण-राजपूत, सब कुछ पहले से तय भेदभावों के आधार पर चलता
रहेगा। </span> आज मैं खुद एक छोटी-सी पार्टी से लौटा हूं। अजीबों-गरीब अनुभव
के साथ। पीना मेरे लिए न के बराबर ही होता है। सभ्य समाज के बीच लोमेंटलिटी
करार दिए जाने के भय से एक-दो पैग तक पचा लेने की कला सीख ली है। हम बहुत ही
स्वाभाविक तरीके से हाथ में ग्लास लिए बातें कर रहे थे। ये गिलास आपसी रजामंदी
कि आज एक पैग पीना है और बुलाए जानेवाले के सम्मान का परिणाम था। तभी एक ने
हमलोगों के साथ की एक तस्वीर लेनी चाही, बहुत जल्दी से एक लड़की फ्रेम से बाहर
हो आयी, उसे बहुत बुरा लगा कि हम पी रहे थे। हमने दो मिनट में,काला-खट्टा की
तरह पैग खत्म किया और फिर कहा- अब आ जाओ। उसका साफ कहना था- हम जिस चीज का
विरोध करते हैं, हम खुद भी उसमें शामिल क्यों हो जाते हैं। अपनी पुरानी भाषा
में कहूं तो हम दुनियाभर के लोगों के लिए फ्रेम बनाने के पीछे परेशान क्यों
रहते हैं, कभी खुद उस फ्रेम में शामिल क्यों नहीं होना चाहते। उस समय के बाद से
मन में एक अजीब सी छटपटाहट,इसे मैं आत्मग्लानि भी कह लूं जो कि इसके पहले दसों
बार प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक पैग की कला को आजमाने के दौरान नहीं हुई,क्या कहें
कि इस बात को कभी इस चश्में से सोचा ही नहीं। आज बार-बार बेचैन हो रहा हूं। मन
करता है- रो दूं,अपने किए पर,मन करता हूं- हंस दूं अपने उपर। शाबासी दूं, अपने
को कि तुम जो हो,वही दिखना चाहते हो, इसमें गलत नहीं है, कुछ भी गलत नहीं। मैं
और मुन्ना अपनी इस बेचैनी को माल रोड़ पर लिमका पीकर कम करना चाहते हैं, एक-एक
शिप पर,एक-एक बातें। भारी मन से गुजरते हुए...तभी उस फ्रेम से हट जानेवाली
लड़की का एसएमएस आता है- <span style="font-style:italic;">जिनके आंगन में
अमीरी का साजार लगता है,उनका हर ऐब जमाने में हुनर लगता है।..ये(यानी हमने जो
किया) नैतिकता का नहीं, सामाजिक बुराई का सवाल है।</span> उधऱ मुंबई से फोन आता
है- <span style="font-style:italic;">भइया,लोग जाति पूछकर-बताकर जमाने के साथ
कौन-सी थेथरई करते हैं।</span> ये एसएमएस और फोन मानों दोनों हम जैसे लोगों से
पूछ रहे हों,जो हो वो दुनिया को बताकर क्या हो जाएगा, अपने को उघाड़कर रख देने
से क्या साबित करना चाहते हो,ये उत्तर-आधुनिक रवैया सब जगह नहीं चलेगा। ओह,
अपनी बेचैनी में मैं उस लड़के का दर्द तो भूल ही गया, पोस्ट के शीर्षक का क्या
सेंस है, ये भी बताना रह गया, कल लिख दूंगा...जरुर।....
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