[दीवान]गार्गी के शोध से-

nisha nigam nisha.nigam1 at gmail.com
Wed Apr 8 20:19:48 IST 2009


गार्गी के शोध पत्र से जुड़े एक टुकड़े को जब मैंने दीवान पर डाला तो मुझे कई
प्रतिक्रियाएं मिलीं। मैं एक-एक कर सबों को जवाब भेज चुकी हूं। इसके बाद मैं
सोचती रही कि क्या करुं! चुप रहती हूं तो पिछला पोस्ट गलत माना जाएगा। इसलिए
मैं सोचती हूं बात साक्ष्यों के आधार पर की जाए।



देश में जितनी हिन्दी न्यूज एजेंसी काम कर रही है, वह अपने अंग्रेजी विंग पर
निर्भर है। वह हिन्दी की सबसे बड़ी एजेंसी भाषा हो या कोई अन्य। यहां कुछ अगल
और दूसरों से बेहतर करने की बात दोहराने वाले, दरअसल भ्रमजाल फैलाए हुए हैं।
एजेंसी में हिन्दी की बेहतरीन कॉपी का भी अंग्रेजी में अनुवाद किया जाता हो,
ऐसी जानकारी तमाम कोशिशों के बाद भी अब तक नहीं मिली है। लेकिन, अंग्रेजी की
कचरा कॉपी भी हिन्दी में बनती है। इन कॉपियों का अनुवाद कर कुछ लोग विनीत जी की
भाषा में तुर्रम खां बनते हैं।



*अब गार्गी के शोध से-*

डेढ़ साल पहले आईएएनएस (हिन्दी) बड़ी सादगी के साथ अस्तित्व में आया था। उस समय
संस्थान से जुड़ी एक पत्रकार ने बताया- शुरू में संपादक समेत कुल 14 पत्रकारों
की उत्साही टीम बनी थी। जल्द ही लखनऊ, बनारस, भोपाल और पटना में हिन्दी सर्विस
के कुल छह संवाददाता रखे गए थे।



इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि संस्थान की हिन्दी को एक मजबूत व स्वायत्त
इकाई के रूप में खड़ा करने की योजना रही होगी। निश्चित रूप से यह एक हिम्मत की
बात थी।



उक्त पत्रकार के मुताबिक चार से पांच महिनों के भीतर हिन्दी में रोजाना 100 से
अधिक स्टोरी भेजी जाती थी, जिसमें हिन्दी में तैयार होने वाली कॉपी कम से कम 20
प्रतिशत तक होता था। तब हिन्दी में तैयार होने वाली special स्टोरी की भी अच्छी
संख्या होती थी। अब स्थिति बदली है। गत सात-आठ महिनों से आउट स्टेशन में तीन
संवाददाता रह गए हैं। वैसे, स्टोरी की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।



उन्होंने एक मजेदार बात यह बताई कि हिन्दी सर्विस को वर्ष 2008 के अंत तक 20 से
21 लोग छोड़ चुके हैं। हालांकि, इस पर वरिष्ठ लोगों की अलग-अलग राय है।
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