[दीवान]मुसलमानों पर जुल्म होता है तो वे लड़ते हैं

reyaz-ul-haque beingred at gmail.com
Wed Apr 29 16:13:07 IST 2009


इस्लामिक विषयों के विद्वान डॉ. असगर अली इंजीनियर से रेयाज उल हक की बातचीत

<http://3.bp.blogspot.com/__ZySD_hi8E4/SfgtMLgIU9I/AAAAAAAAB2s/rXlYH02FQ5U/s1600-h/Engineer_smallPhoto.jpg>‘सेंटर
फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म’ के अध्यक्ष और इस्लामिक विषयों के
विद्वान डॉ. असगर अली इंजीनियर की पहचान मजहबी कट्टरवाद के खिलाफ लगातार लड़ने
वाले शख्स के रुप में है. असगर अली इंजीनियर मानते हैं कि जहां-जहां इस्लाम पर
जुल्म हुआ है, वहां के लोग लड़ाई के लिए खड़े हुए हैं. वे मानते हैं कि
कट्टरपंथ मजहब से नहीं, सोसायटी से पैदा होता है. इनकी राय में भारतीय मुसलमान
इसलिए अतीतजीवी है क्योंकि यहां के 90 प्रतिशत मुसलमान पिछड़े हैं और उनका सारा
संघर्ष दो जून की रोटी के लिए है. इसलिए उनके भीतर भविष्य को लेकर कोई ललक नहीं
है. यहां प्रस्तुत है, डॉ. असगर अली इंजीनियर से की गई बातचीत के अंश.

असगर अली इंजीनियर
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• अगर धर्म के आधार पर देखा जाये तो दुनिया भर में अमरिकी प्रभुत्व के खिलाफ
संघर्ष में इसलामी राष्ट्रों के लोग ही सबसे अगली कतारों में हैं. इसके क्या
कारण देखते हैं आप ?


विश्व के जिन हिस्सों पर जुल्म हो रहा है, वे सारे वही हिस्से हैं, जहां
मुसलमान हैं. आज अमरिकी हमला वियतनाम, कोरिया या चीन पर नहीं हो रहा है. तो
वहां के लोग क्यों लडेंगे अमेरिका के खिलाफ ? फलस्तीन में या इराक में जो कुछ
हो रहा है, उसे भुगतनेवाले तो मुसलमान ही हैं न ? तो लडनेवाले भी मुसलमान ही
होंगे.


• इसके क्या कारण हो सकते हैं कि मुसलमानों को ही टारगेट बनाया जा रहा है?

• • इसलिए कि अमेरिका मध्यपूर्व पर अपना प्रभुत्व बनाये रखना चाहता है. वहां
तेल का भंडार है, जिस पर वह अपना कब्जा जमाना चाहता है. वहां जो भी जुल्म होता
है, उसमें वह इस्राइल की हिमायत करता है. इसके जरिये वह अरबों को दबा कर रखना
चाहता है. इस्राइल अमेरिका की पुलिस चौकी है, जिसके जरिये अमरिकी अरबों पर
कंट्रोल रखना चाहते हैं. जब इस पुलिस चौकी द्वारा फलस्तीन के लोगों पर जुल्म
होता है तो वे लड़ते हैं उनके खिलाफ. इसी तरह अमेरिका इराक पर कब्जा करता है
क्योंकि वहां बेशुमार तेल है. सऊदी अरब के बाद वहां सबसे ज्यादा तेल है. इसलिए
वह वहां अपना कब्जा जमाये रखना चाहता है. तो बदले की कार्रवाई तो होगी ही.

• भारत और शेष विश्व के मुसलिम समाज में एक फर्क दिखता है. पूरी दुनिया के
मुसलिम समाज में ऐसे साम्राज्यवादी जुल्म के खिलाफ हर तरह के संघर्ष चल रहे
हैं. लेकिन भारत के मुसलमान इस साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन में दूर-दूर तक नहीं
दिखते या बहुत कम. वे विरोध जताने के लिए एक साधारण-सा जुलूस तक नहीं निकाल
पाते हैं. ऐसा क्यों ?

• • इसलिए कि किसी जमाने में जब विरोध किया तो उसका रद्दे अमल सख्त हुआ. जैसे
इस्राइल का येरुशेलम पर हमला हुआ था 1968 में, तो मुसलमानों ने बहुत बडा जुलूस
निकाला. उसका बहुत ही बुरा रद्दे अमल हुआ. उस समय जनसंघ ने काफी प्रोपेगेंडा
किया कि मुसलमानों की वफादारी भारत के साथ नहीं है बल्कि मक्का-मदीना के साथ
है, बैतुल मुकस (येरूशेलम) के साथ है. इसका लोगों पर बहुत खराब असर पडा.

इसके अलावा हिंदुस्तान में उस जमाने के मुकाबले में इतनी तबदीलियां आयी हैं कि
मुसलमान खुद दुनिया के भविष्य के बारे में सोचने से ज्यादा यह महसूस करता है कि
उसके अपने भविष्य का क्या होगा. इसलिए वह कश्मीर के भी आंदोलन का खुल कर समर्थन
नहीं करता. आप देखेंगे कि कश्मीर की हिमायत में भी दूसरे राज्यों के मुसलमान
कोई जुलूस नहीं निकालते. अब वे यह समझते हैं कि उनके हक उनके इलाके से जुडे हुए
हैं और उन्हें अपना भविष्य देखना है. इसलिए उनकी वफादारी भी किसी एक पार्टी से
खत्म हो गयी. किसी जमाने में उनकी वफादारी सिर्फ कांग्रेस के साथ थी, लेकिन अब
हालत यह है कि यहां बिहार में कांग्रेस चुनाव लडती भी है तो वह राजद को वोट
देता है. केरल में कम्युनिस्टों को वोट देता है. आंध्र प्रदेश में तेलुगुदेशम
को वोट देता है. जो क्षेत्रीय हित हैं, वे भी इसमें काम करते हैं.

*पूरी यहाँ<http://www.raviwar.com/baatcheet/B20_interview-asgar-ali-engineer-reyaz-ul-haq.shtml>बातचीत
पढिये
*

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REYAZ-UL-HAQUE
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