[दीवान]Fwd: हिन्दी अकादमी की खींचतान

Ravikant ravikant at sarai.net
Mon Aug 10 14:40:24 IST 2009


वाक़ई अच्छा मसाला है, विभास. इसमें वह सब कुछ लिखा है जो मैं इस प्रसंग में अशोक चक्रधर 
की तथाकथित अपात्रता को लेकर महसूस करता रहा हूँ. इसे साझा करने का शुक्रिया.

रविकान्त 

गलियों के दादा

पिछले महीने भर से दिल्ली की साहित्यिक गलियों में घूमने-फिरने वाली
ख़बरों में हिन्दी अकादमी का मसला छाया हुआ है। इस पूरे मामले की
केस-स्žटडी दिल्लीवासी हिन्दी- "साहित्यकारों"की मानसिकता, राजनैतिक-
सांस्कृतिक व्यवहार को समझने के लिये दिलचस्प नुक़्ते सामने रखता है।
मामला शुरू होता है अब तक शालीन, तटस्थ और गंभीर छवि के लिए जानी
जानेवाली अर्चना वर्मा- जो उसी कॉलेज़ में असोशिएट प्रोफ़ेसर हैं जहाँ
दिल्ली की वर्तमान मुख्यमंत्री ने शिक्षा पाई है- के अकादमी की संचालन
समिति से इस्तीफ़े से । उनके इस्तीफ़े की चिट्ठी (जिसकी भाषा एक बार पढ़ कर
समझलेने का दावा करनेवाले माई के लाल कम होंगे)में अकादमी के बदलते माहौल
के प्रति क्षोभ व्यक्त किया गया है। माहौल के बदलने के कारण में अकादमी
की कार्य-प्रणाली पर राजनीति और नौकरशाही के कसते शिकंजे का हवाला दिया
गया है। अपनी इस राय के समर्थन में उन्होंने सिर्फ़ एक तथ्य प्रस्तुत किया
है जिसे वे इस तरह से रखती हैं कि मानो इस कृत्य से पाप का घड़ा भर गया और
उन्हें सुदर्शन चक्र उठाने को बाध्य होना पड़ा।यह तथ्य है अकादमी के
उपाध्यक्ष पद पर अशोक चक्रधर की नियुक्ति।अर्चना वर्मा के चक्र ( जिसकी
"सुदर्शनीयता" पर बहुत सारे लोगों को आपत्ति और उनके निकट के
मानेजानेवाले चंद लोगों को आश्चर्य और दुख हुआ)का निशाना भी चक्रधर महोदय
ही थे।अशोक चक्रधर की नियुक्ति राजनैतिक प्रसाद का परिणाम है इस बात को
लेकर अर्चना वर्मा का आक्रोश तो है पर वह बुनियादी नहीं है उनका मानना यह
जान पड़ता है कि यदि प्रसाद ही देना था तो किसी श्रीकांत वर्मा वरगी
साहित्यकार को दिया जाता, चक्रधर जैसे - उन्होंने जो विशेषण लगाए हैं
उसके बारे में एक अखबार में टिप्पणी थी कि उन "अलंकारों" को सुनकर अशोक
चक्रधर को ख़ुद ही त्याग-पत्र दे देना चाहिए था- को क्यों दिया गया।इसके
अगले दिन ख़बर आई कि विवाद-सम्राट राजेन्द्र यादव, सहारा-पुरुष मंगलेश
डबराल, वीर बालक रामशरण जोशी और राजेन्द्र यादव को प्यार से साहित्य का
डॉन माननेवालों द्वारा 'छोटा राजन' कहे जानेवाले पंकज बिष्ट जैसे कुछ
"साहित्यकारों" ने मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखी है जिसमें अशोक चक्रधर
जैसी(हास्य-कवि होने के कारण) 'नीची' हैसियत के (क्योंकि उनसे ऊँची
हैसियत के कई साहित्यकार दिल्ली में घूम-घूम कर फिर रहे हैं) साहित्यकार
को उपाध्यक्ष बनाने पर गुस्सा जताते हुए धमकी दी गई (अब डॉन धमकी नहीं
देगा तो खाएगा कहाँ से) कि अगर उन्हें नहीं हटाया गया तो वे अकादमी का
बहिष्कार करेंगे, यानी चलने नहीं देंगे।अर्चना वर्मा और राजेन्द्र यादव
एंड गैंग की चिट्ठियों में अशोक चक्रधर के प्रति व्यक्त की गयी घृणा के
अलावा एक और बात समान थी, वह थी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की साहित्यिक
और सांस्कृतिक संवेदनशीलता में व्यक्त की गयी अटूट आस्था जिसकी नोटिस एक
अखबार ने भी ली।
इन लोगों की भावना उस वक़्त कहीं बिला गयी थी जब मुकुन्žद द्विवेदी और
जनार्दन द्विवेदी जैसे लोगों को संवेदनशीला शीलाजी ने उपाध्यक्ष बनाया
था।मुकुन्द द्विवेदी जिनकी पहचान उनके पिता की ग्रन्žथावली के संपादक
होने के अलावा पता नहीं क्या है और जनार्दन द्विवेदी जिनकी साहित्यिक देन
सोनिया गाँधी के भाषण लिखने के अलावा क्या है इसका पता लगाने के लिये कोई
आयोग बिठाया जाना चाहिए, को किसी राजनैतिक चाटुकारिता या पक्षपात, जिसका
आरोप चक्रधर पर है, के कारण उपाध्यक्ष पद नहीं मिला यह तो संभवत: वे
दोनों ख़ुद नहीं मानेंगे।मगर इन मनोनयनों पर किसी साहित्यकार या
प्रगतिशील, जनवादी,जनसंस्कृतिवादी, राष्ट्रवादी,कलावादी, कैसे भी
साहित्यिक संगठन को जरा भी आपत्ति नहीं हुई थी।इनके कार्यकाल के
कार्यक्रमों में सबने उछल-उछलकर भाग लिया था।राजेन्द्र यादव जो साहित्य
में वर्ण-व्यवस्था का विरोध करनेवाले दलित-साहित्य को हिन्दी में खड़ा
करने का दावा करते हैं, साहित्य में विधाओं की नई वर्ण-व्यवस्था कायम कर
रहे हैं। पॉपुलर और एलीट के वर्गीकरण पर खड़ी इस वर्ण-व्यवस्था को छोड़ भी
दें तो यह तथ्य वे सुविधा से भुला देते हैं कि चक्रधर मुक्तिबोध पर किताब
लिखनेवाले और शोध करनेवाले शुरुआती लोगों में हैं,देश-विदेश घूमे हुए
प्रोफ़ेसर हैं।ई० एच० कार की 'व्हाट इज़ हिस्ट्री' जैसी किताब का हिन्दी
में अनुवाद किया है। बाल-साहित्य और नव-साक्षरों के लिये काफ़ी लिखा
हैटेलिविजन के कार्यक्रमों के लिए लिखा है।इन सब बातों से
महत्त्वपूर्ण,हिन्दी भाषा को इंटरनेट की भाषा से जोड़ने की पहल करनेवालों
में साहित्य की दुनिया से पहले लोगों में हैं और उनके इस कार्य की
प्रशंसा माइक्रोसॉफ्ट ने भी की है। आख़िर हिन्दीवाले उन लोगों को श्रेय
देना कब शुरू करेंगे जिन्होंने हिन्दी को साहित्य के 'घेटो' से निकालने
का काम किया है और जिनकी रचनाओं ने हिन्दी के समाज का विस्तार करने में
बड़ी भूमिका निभाई है।हो सकता है चक्रधर ने यह सब पैसे कमाने के लिये किया
हो, पर इससे वे मुकुन्द द्विवेदी, जनार्दन द्विवेदी से 'नीचे' नहीं हो
जाते।
इसके बाद घटनाक्रम का विकास अकादमी के सचिव जो इसी नौकरशाही और राजनीति
के द्वारा सचिव नियुक्त किये गये ज्योतिष जोशी, जिनके जोशी नामकरण और
जनेवि में छात्र परिषद के समर्थन के कई किस्से जनेवि के पूर्व-छात्रों
द्वारा सुने-सुनाये जाते हैं, के इस्तीफ़े से हुआ। उनके इस्तीफ़े को लेकर
सार्वजनिक बयान यह आया कि मौज़ूदा हालात में उनके लिये अकादमी में काम
करना असंभव हो गया था। निजी तौर पर, हालांकि ये बातें भी अख़बारों में आईं
, उन्होंने लोगों को बताया कि उन्हें किसी नौकरशाह ने डाँट पिलाते हुए
उनसे इस्तीफ़ा लिया। उनके इस्तीफ़े के कारणों की जाँच की माँग भी किसी
"साहित्यकार" ने उठाई। इस इस्तीफ़े के बाद घटनाक्रम का विकास और तेज़ी से
हुआ।प्रोफेसर नित्यानन्द तिवारी ने भी, जो पहले अर्चना वर्मा द्वारा
चक्रधर को 'विदूषक' कहे जाने पर आपत्ति जता चुके थे और अशोक चक्रधर के
साथ काम करने में अनापत्ति भी प्रकट कर चुके थे, इस्तीफ़ा दे दिया
।उन्होंने अशोक चक्रधर के एक बयान का हवाला दिया कि चक्रधर जो कि उनके
शिष्य रहे हैं, ने कहीं कहा है कि मैं साहित्य को मनोरंजन की वस्तु मानता
हूँ और ऐसा मानने वालों के नेतृत्व में काम करना उनके लिये मुश्किल है।
(हालांकि चक्रधर ने अपने 'गुरू' के इस्तीफ़े पर खेद प्रकट करते हुए उन्हें
चुनौती भी दी कि वो बताएँ कि ऐसा कहाँ कहा पर)…यहाँ तक घटनाक्रम पिछले
ढर्रे पर ही चला पर प्रो०तिवारी के पत्र में जो दूसरी बात थी उसने
नैरेटिव को डेप्थ एक और आयाम दिया। उन्होंने संकेत किया कि पिछली संचालन
समिति के एकमत निर्णय जो शलाका पुरस्कार के संबंध में था,को मुख्यमंत्री
के आश्वासन के बावज़ूद निरस्त कर दिया जाना इन इस्तीफ़ों के पीछे का कारण
है ।कृष्ण बलदेव वैद को पुरस्कार दिये जाने के समिति के संकल्प के तुरंत
बाद किसी पुरुषोत्तम गोयल नाम के चिरकुट की चिट्ठी सरकारी महकमे में
चक्कर लगाने लगी जिसमें वैद साहब को पोर्नोग्राफिक लेखक ठहराते हुए उनके
एक उपन्यास से अंश छाँट-छाँट कर प्रस्तुत किये गए थे। इसके बाद
पुरस्कारों की घोषणा को स्थगित कर दिया गया और बाद में चुनाव आचार-संहिता
का हवाला देकर बात टाली गई। मुख्यमंत्रीने आश्वासन दिया था कि समिति ने
यदि निर्णय ले लिया है तो यह पुरस्कार दिया जाएगा। आचार-संहिता हटने के
बाद भी पिछली समिति के कार्यकाल में पुरस्कारों की घोषणा नहीं की गईयदि
यह निरस्तीकरण पहले का था तो इस्तीफ़ा पहले ही दे दिया जाना चाहिए था पर
इस निर्णय की ख़बर अब लगी।ख़बर कहाँ से आई पता नहीं, प्रो० तिवारी ने यह
ख़बर संभवत: उसी स्रोत से प्राप्त की जिससे उन्होंने चक्रधर के बयान की
ख़बर प्राप्त की थी क्योंकि चक्रधर के उपाध्यक्ष बनने के बाद न तो अकादमी
की कोई बैठक हुई न ही सरकार की ओर से ऐसी कोई अधिसूचना ही जारी की गयी।
प्रो० तिवारी मिली इन सूचनाओं का कोई ठोस आधार नहीं, स्रोत कोई
'ज्योतिषी' ही होंगे।बहरहाल इसके बाद इस्तीफ़ों और अस्वीकारों की झड़ी लग
गई है। धमकी असर दिखाने लगी है। अब तक प्राप्त ख़बरों में नवीनतम इस्तीफ़ा
चक्रधर के दूसरे गुरू विश्वनाथ त्रिपाठी का है जिन्होंने कारणों की
पुरानी लिस्ट में एक और कारण जोड़ा है- अकादमी द्वारा दिये जानेवाले
साहित्यिक पुरस्कारों की संख्या कम किया जाना। इस निर्णय को पिछली समिति
के समय ही लागू किया गया था।पर विश्वनाथ त्रिपाठी तक यह सूचना पहुँचने
में महीनों लग गए। रेवड़ियों की तरह बाँटे जानेवाले थोड़ी-थोड़ी राशि के
पुरस्कारों की जगह पर सम्मानजनक राशि के कम ही पुरस्कारों को बाँटे जाने
के निर्णय को लेकर इस्तीफ़ा देने में ज़रूर कोई औचित्य होगा।
सवाल इन इस्तीफ़ों की टाइमिंग से है।जो लोग अशोक चक्रधर को काम करने का
मौका देने के पक्ष में थे वे बग़ैर एक भी मीटिंग के इस्तीफ़ा क्यों देने
लगे? क्या एक मीटिंग में जाकर अकादमी की कार्य-शैली और दबावों की बात
उठाकर इस्तीफ़ा देना सही क़दम नहीं होता? पहली मीटिंग तो मुख्यमंत्री के
साथ ही होती है। या यह ख़तरा था कि कहीं मीटिंग के बाद चक्रधर के नेतृत्व
को नकारने का कोई बहाना न मिला तो साहित्यिक वर्ण-व्यवस्था को उलट-पलट
करनेवाले क़दम को बेअसर करनेका मौका कैसे मिलता? आखिर जनार्दन द्विवेदी और
मुकुन्द द्विवेदी जैसे ग़ैर-साहित्यिक लोगों की मौजूदगी में थोक भाव से
लोगों को उपकृत करने की सत्ता जो भोग चुके हैं वो इस सत्ता और वर्चस्व
में किसी और का साझा कैसे होने दें। इसके लिये झूठ,प्वाद और साहित्यिक
माफियाओं की मदद लेनी ही पड़े तो क्या है ? देखें कैसे चला लेते हैं हमारे
बग़ैर अकादमी । अभी और इस्तीफ़े आने बाकी हैं ।अख़बारों के अनुमान के अनुसार
इनमें अजित कुमार, हिमांशु जोशी, भानु भारती,विभास वर्मा और अनवर जमाल के
नाम संभावित हैं।


पुनश्च: अवान्तर कथाओं की तरह कुछ अन्य कथाएँ भी हैं। एक खोजी अख़बार ने
ख़बर निकाली है कि असली कारण राष्ट्रकुल खेलों के अवसर पर करोड़ों की लागत
से होनेवाले अंतर्राष्ट्रीय कवि- सम्मेलन पर दो अशोकों की दावेदारी का
है। एक की दावेदारी इस आइडिया के जनक होने के कारण है तो दूसरे ने
कवि-सम्मेलनों पर अपना पेटेंट पहले से डाल रखा है। दूसरे अशोक ने पहले
अशोक के एजेंट को अकादमी से निकलवा दिया।
दूसरी कथा को इस पूरे प्रसंग में से उभरी एकमात्र तोषदायी घटना के तौर पर
देखा जा सकता है कि वर्चस्व और सत्ता की इस लड़ाई में जनवादी लेखक संघ जो
अब तक वैद जैसे लेखकों को कलावादी और इसी तर्क से प्रतिक्रियावादी मानता
था, उनके पक्ष में उतर आया।

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