[दीवान]वह बेच दी जायेगी अपनी दुधमुंही बेटी के साथ

prakash ray pkray11 at gmail.com
Thu Aug 13 18:58:05 IST 2009


उसकी शादी बचपन में कर दी गयी थी. जब वह बड़ी हुई तो उसने दूसरी शादी की. यह
शादी सभी संबंधित परिवारों की सहमति से हुई थी. उसके पहले पति और उसके परिवार
के लोग भी रज़ामंद थे. उसने एक बच्ची को जन्म दिया जो आज आठ महीने की है.
पति-पत्नी मजदूर हैं और अतिरिक्त आमदनी के लिए गाय का दूध बेचते हैं.
अचानक एक दिन जाति-पंचायत और इलाके के दबंगों को उसकी पहली शादी की याद आयी और
उन्होंने दूसरी शादी को 'अवैध' घोषित कर दिया. पंचों ने फ़ैसला दिया: हर्जाने
में भरी रक़म अदा करो. ऐसा नहीं करने पर ये रक़म उसे और उसकी बेटी की नीलामी से
वसूली जायेगी. रक़म चुकाने तक उसके परिवार को चापाकल से पानी लेने और गाँव की
अन्य सुविधाओं का लाभ उठाने पर प्रतिबन्ध रहेगा. कोई भी उससे दूध नहीं खरीदेगा.
ग्रामीण रोज़गार योजना के तहत भी उसे और उसके परिवार को काम नहीं मिलेगा.
क्षेत्र के विधायक और सांसद (केंद्रीय मंत्री) को गुहार लगायी गयी है. जवाब का
इन्तेज़ार है. प्रशासन ने भी उदासीनता ही दिखाई है अबतक.

एक टीवी पत्रकार उससे पूछती है: मेहराज, तुम इस अन्याय से लड़ोगी या पंचायत का
फ़ैसला मान लोगी?
मेहराज: मरते दम तक मुक़ाबला करुँगी.

गोद में उसकी बच्ची मुस्करा रही है. अवाक् हूँ मैं. अशोक वाजपेयी की एक कविता
याद करता हूँ.

कोई नहीं सुनता पुकार--
सुनती है कान खड़े कर
सीढियों पर चौकन्नी खड़ी बिल्ली,
जिसे ठीक से पता नहीं कि
डर कर भाग जाना चाहिए या
ठिठककर एकटक उस ओर देखना चाहिए।

कोई नहीं सुनता चीख़--
सुनती है खिड़की के बाहर
हरियाये पेड़ पर अचानक आ गई नीली चिड़िया,
जिसे पता नहीं कि यह चीख़ है
या कि आवाज़ों के तुमुल में से एक और आवाज़।

कोई नहीं सुनता प्रार्थना--
सुनती है अपने पालने में लेटी दुधमुंही बच्ची,
जो आदिम अंधेरे से निकलकर उजाले में आने पर
इतनी भौंचक है
कि उसके लिए अभी आवाज़
होने, न होने के बीच का सुनसान है।

प्रकाश
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