[दीवान]सिद्धार्थ- द प्रिजनर : महानगरीय सांचे में ढली नीतिकथा

mihir pandya miyaamihir at gmail.com
Fri Mar 6 00:06:20 IST 2009


From www.mihirpandya.com
Originally published in
Tehelka<http://www.tehelkahindi.com/review/films/216.html>
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बचपन में पंचतंत्र और हितोपदेश की कहानियाँ सुनकर बड़ी हुई हिन्दुस्तान की जनता
के लिए *’सिद्दार्थ, द
प्रिज़नर’*<http://cinefan.osians.com/filmdetails.aspx?id=191>की कहानी
अपरिचित नहीं है. सोने का अंडा देने वाली मुर्गी और व्यापारी की कहानी
के ज़रिये ’लालच बुरी बला है’ का पाठ बचपन में हम सबने सीखा है. इस तरह की
कहानियों को हम नीति कथायें (मोरल टेल) कहते हैं. सिद्दार्थ और मोहन की कहानी
एक ऐसी ही नीति कथा का मल्टीप्लैक्सीय संस्करण है जो अपना रिश्ता ऋग्वेद और
बुद्धनीति से जोड़ती है. फ़िल्म के मुख्य किरदार *रजत
कपूर*<http://www.imdb.com/name/nm0438494/>के नाम ’सिद्दार्थ’ में भी
यही अर्थ-ध्वनि व्यंजित होती है. कहानी की सीख है,
“इच्छाएं ही इंसान के लिए सबसे बड़ा बंधन हैं. इच्छाओं से मुक्ति पाकर ही इंसान
सच्ची आज़ादी पाता है.”

मैंने यह फ़िल्म पिछले साल *’ओशियंस’
<http://cinefan.osians.com/index.aspx>*में देखी थी जहाँ रजत कपूर को इस
फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार
मिला था. ’ओशियंस’ में यह उन हिन्दुस्तानी फ़िल्मों में से एक थी जिसका टिकट
मैंने समारोह शुरु होते ही सबसे पहले खरीदा था. वजह? ऑन पेपर, इस फ़िल्म का मूल
प्लॉट हिन्दी सिनेमा इतिहास में आई थ्रिलर फ़िल्मों में अबतक के सबसे आकर्षक
प्लॉट्स में से एक है. कुछ ही समय पहले जेल से रिहा हुए और अब अपनी ज़िन्दगी नए
सिरे से शुरु करने की कोशिश में लगे लेखक सिद्दार्थ रॉय की नई किताब की इकलौती
पांडुलिपि सायबर कैफ़े चलानेवाले मोहन (सचिन नायक) के रुपयों से भरे ब्रीफ़केस से
बदल जाती है. सिद्दार्थ अपनी किताब को लेकर बैचैन है वहीं मोहन की जान उस पैसों
से भरे ब्रीफ़केस में अटकी है जो अब सिद्दार्थ के पास है. इंसान की इच्छाएं उसे
क्या-क्या नाच नचाती हैं. आगे इस कहानी में प्यार, रोमांच, धोखा, लालच, झूठ और
मौत सभी कुछ है. लेकिन इस चमत्कारिक प्लॉट के बाद भी कुछ है जो अटका रह जाता
है. थ्रिलर होते हुए भी यह फ़िल्म रजत कपूर की ही पिछली फ़िल्म
*मिथ्या*<http://www.imdb.com/title/tt1179782/>की तरह अंत में आपके ऊपर
एक उदासी का साया छोड़ जाती है. शुरुआत में आपको यह
फ़िल्म एक थ्रिलर होने के नाते रफ़्तार में धीमी लग सकती है लेकिन इच्छाओं के
पीछे भागती जिस जिन्दगी की व्यर्थता को दर्शाने की कोशिश फ़िल्म कर रही है उस तक
पहुँचने के लिए यह कारगर हथियार है. जेल से छूटने के बाद सिद्दार्थ की
रिहाइशगाह के शुरुआती सीन मेरे मन में फ़िर कभी न उगने के लिए डूबते सूरज का सा
प्रभाव छोड़ते हैं. मेरे लिए यह फ़िल्म औसत से एक पायदान ऊपर खड़ी है. छोटी सी
कहानी जिसकी चाहत एक बड़ा कैनवास रचकर कुछ बड़ा कहना नहीं. *ओ.
हेनरी*<http://en.wikipedia.org/wiki/O._Henry>और
*मोपांसा* <http://en.wikipedia.org/wiki/Guy_de_Maupassant> की लघु कथाओं की
याद दिलाती यह फ़िल्म सिनेमा हाल से चाहे अनपहचानी ही निकल जाये लेकिन लेकिन
आनेवाले वक़्तों में हमारे घरों में मौजूद और धीरे-धीरे बड़े हो रहे डी.वी.डी.
संग्रह का हिस्सा ज़रूर बनेगी ऐसी मुझे उम्मीद है.

विज्ञापन जगत से सिनेमा में आये प्रयास गुप्ता के लिये सबसे बड़ी तारीफ़ है
’बैंग-ऑन’ कास्टिंग. रजत कपूर को देखकर तो मुझे शुरु से ही लगता रहा है कि वे
तो बने ही लेखक का रोल करने के लिए हैं! वो इस रोल में इतने फ़िट हैं कि आप उनकी
बेहतरीन अदाकारी को नोटिस तक नहीं करते. लेकिन अदाकारी में कमाल किया है अपने
दांतों से पूरे महल को रौशन करते रहे *’हैप्पीडेंट वाइट
फ़ेम’*<http://www.youtube.com/watch?v=HdesIbwOYAA>सचिन नायक ने. सच्चाई,
ईमानदारी, नैतिकता और भौतिक सुख के बीच छिड़ी जंग के
निशान आप उसके चेहरे पर पढ़ सकते हैं. फ़िल्म की उदासी और निस्सहायता उनके किरदार
से ही सबसे बेहतर तरीके से व्यंजित होती है. प्रदीप सागर के रूप में एक बार फिर
हम ’भाई’ का ’दूसरा’ चेहरा देखते हैं और मुझे
*’सत्या’*<http://www.imdb.com/title/tt0195231/>याद आती है. लेकिन
‘सिद्दार्थ’ रामू की ’सत्या’ की तरह बड़े कैनवास वाली
’मैग्नमओपस’ नहीं है. यह ज़िन्दगी की कतरन है, ’स्लाइस ऑफ़ लाइफ़’ जो बात तो छोटी
कहती है लेकिन पूरी साफ़गोई से कहती है.
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