[दीवान]200 रुपया सेर जलेबी

Rakesh Singh rakeshjee at gmail.com
Fri May 8 13:29:12 IST 2009


बिल्‍कुल दुरुस्‍त फरमाया ब्रजेश बाबू आपने. एक बार जी पर चढ़ जाने के
बाद मजाल है कि कोई चांदनी चौक जाए और इस भारी-भरकम जलेबी का आस्‍वादन न
करे! लार टपकाउ लिखा है आपने. बधाई स्‍वीकार करें.


शुक्रिया
राकेश

2009/5/7 brajesh kumar jha <jha.brajeshkumar at gmail.com>:
> दरीबा कलां और 200 रुपया सेर जलेबी
>
>
>
> ब्रजेश झा
>
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> चांदनी चौक इलाके में दरीबा कलां के नुक्कड़ पर है, पुरानी जलेबी वाले की
> दुकान। साहब, यह दुकान 138 वर्ष पुरानी है! और इसकी लंबाई-चौड़ाई इतनी भर है कि
> यहां बा-मुश्किल से दो लोग बैठते हैं। जिनमें एक जलेबी तलने का काम करता रहता
> है। दूसरा दुकान की गद्दी संभाले रहता है।
>
>
>
> यहां गर्म-गर्म जलेबी का लुत्फ उठाने वालों को दुकान के बाहर ही खड़ा होना
> पड़ेगा। इसके बावजूद दरीबा कलां डाकघर के निकट स्थित इस दुकान की खूब ख्याति
> है। चांदनी चौक से लौटने पर यार-दोस्त जरूर पूछते हैं- भई, वहां जलेबी खाया या
> नहीं!
>
>
>
> इन दिनों दुकान कैलाश चंद्र जैन की देख-रेख में रफ्तार पकड़े हुए है। घंटा भर
> वहां खड़ा रहा। कैलाश साहब बड़े व्यस्त दिखे। वक्त देखकर तपाक से मेरे पूछने पर
> उन्होंने बताया, “हमारे पुरखे यानी नेम चंद्र जैन ने इस दुकान को खोला था। वह
> सन् 1870-71 का जमाना था । तब से अब तक इस इलाके में कई जरूरी बदलाव हुए।
> लेकिन, यह दुकान अपनी रफ्तार पकड़े हुए है।”
>
>
>
> दुकान की पूरी काया देखने पर मालूम पड़ता है कि यहां भी वक्त के साथ जरूरी
> बदलाव किए गए हैं। रंग-रौगन होते रहे हैं। पर, तंग जगह होने के बावजूद कैलाश जी
> ने कायदे से जगह का इस्तेमान किया है। आस-पास कूड़ा न फैले इसका भी खूब इंतजाम
> है।
>
>
>
> वैसे, यहां की जलेबी थोड़ी महंगी तो है। लेकिन, जिसने भी इसका स्वाद लिया, वह
> इसका मुरीद बन गया। दोबारा अपनी जेब ढ़ीली करने से नहीं हिचकिचाता है। कैलाश
> चंद्र ने बताया, “हमारे यहां दो सौ रुपये प्रति किलोग्राम की दर से जलेबी मिलती
> है। लोग बड़े चाव से जलेबी खाते हैं और अपने परिजनों  के लिए भी लेकर जाते
> हैं।”
>
>
>
> महांगाई के बाबत वे कहते हैं, “ भई महांगी तो है। पर, आज सस्ता ही क्या रह गया
> है जनाब।” कैलाश जी की बातें तब सच मालूम पड़ती हैं, जब डाकघर के नीचे खड़े
> होकर देर तक उनकी दुकान में आने-जाने वालों को गौर से देखाता रहता हूं। चांदनी
> चौके के कई छोटे-बड़े बदलाव की गवाह यह दुकान रोजना सुबह साढ़े आठ बजे
> मेहमानवाजी के लिए तैयार हो जाती है। और रात के साढ़े नौ बजे तक अपनी ही रफ्तार
> से चलती रहती है।
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